सोमवार, 23 सितंबर 2013

हंसना जरुरी है।


हंसना जरुरी है।
डॉ. नीरज भारद्वाज
टेलीविजन  पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रम धीरे-धीरे अपना दायरा बढाने में सफल होते नजर आ रहे हैं। जिस दौर में भारतीय टेलीविजन ने शुरुआत की थी उस समय उसके पास सिर्फ एक ही चैनल था और वह था दूरदर्शन जिसे डीडी-1 के नाम से जाना जाता रहा है। फिर डीडी-2 और उसके बाद निजी चैनलों का दौर आ गया। धीरे-धीरे तकनीक बढी और टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों की संख्या में भी बढोत्तरी होनी शुरु हो गई।
टेलीविजन पर पहले सामाजिक कार्यक्रमों से शुरुआत हुई। फिर मनोरंजन के सभी प्रकार के कार्यक्रम टीवी चैनलों पर दिखाई देने लगे। आज टेलीविजन पर लगभग हर एक सोच से जुडे व्यक्ति के मतलब के कार्यक्रम आते हैं। टीवी ने महिला, पुरुष, बच्चा, युवा सभी को सभी के आयु और वर्ग के कार्यक्रम दिये हैं। अब कोई व्यक्ति यह नहीं कह सकता की टीवी पर ऐसा कार्यक्रम नहीं आता, बल्कि कई बार तो हमारी सोच से परे हट कर ऐसा कार्यक्रम हमारे सामने आ जाता है, जिस की कल्पना करना भी संभव नहीं था। लोगों को खाना बनाना, घुमने फिरने के स्थान बताना, बच्चों को पढना, कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर इनाम जितना, हंसी-मजाक, देश-विदेश की सारी जानकारी आदि आज टीवी कार्यक्रमों के माध्यम से ली जा सकती है या ये कहें कि वे यह सभी जानकारी दे रहे हैं।
आज के भागते दौडते समय में लोगों के पास समय की कमी है और ऐसे में यदि कोई आपसे हंसी मजाक की बातें करता है तो यह समझों कि वह हमारे लिए वरदान बन जाती है। टीवी पर हंसी मजाक के कार्यक्रमों का आना लगा ही रहता है। देख भाई देख धारावाहिक में शेखर सुमन और उस कार्यक्रम में दिखाए गए  परिवार ने टीवी की दुनिया में हंसी मजाक का जो उदाहरण रखा। वह अपने में एक यादगार पल रहे होंगे। जसपाल भट्टी द्वारा बनाए गए हंसी मजाक के कितने ही कार्यक्रम टीवी पर लोकप्रिय हुए। समय बदला और फिर हंसी को लेकर रिएयल्टी-शो सामने आए। विचार किया जाए तो हंसी मजाक का दौर टीवी पर सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा है। अब पिछले कुछ दिनों से क्लर्स चैनल पर कपिल की कॉमेडी ने सभी कार्यक्रमों को पछाड दिया है। कपिल के द्वारा कहे जाने वाला शब्द बाबा जी का ठल्लू अपने आप में एक अलग ही उदाहरण है। कपिल अपने आप में एक ऐसा उदाहरण बन गया है कि टेलीविजन पर हंसी कि दुनिया की चर्चा हो और उसका नाम न आए तो गलत होगा।
वास्तव में हंसी हमारे जीवन में बडा महत्व रखती है और जो व्यक्ति चाहे कैसे भी करके हमे तो पल की खुशी देता है तो वह हमारे लिए उस समय भगवान ही होता है, क्योंकि गम देने के लिए यह समाज कम नहीं है। रोज सुबह उठते ही नई समस्या जन्म ले लेती है, मंहगाई की मार, बेरोजगारी की लंबी लाईन, राशन दफ्तर में लाईन आदि कितने ही पल हमारी खुशी को खा जाते हैं। इसीलिए हंसते- हंसते यदि यह जीवन कट जाता है तो इससे अच्छी बात क्या होगी। आप सभी टीवी पर हंसाने वाले नायक-नायिकाओं का बहुत-बहुत धन्यवाद, जो आप सभी इस समाज को दे रहे हो, वह वास्तव में ही समाज का एक बहुत बडा कार्य है। साधु संत यदि धर्मग्रंथों की बात करते हैं तो आप उनसे कम नहीं हो, क्योंकि समाज के बहुत से पहलु होते हैं। जिसका ख्याल रखना हम सभी की जिम्मेदारी है।



मंगलवार, 17 सितंबर 2013

नई पीढ़ी की फिल्में और हम


नई पीढ़ी की फिल्में और हम
डॉ. नीरज भारद्वाज
आज का समाज जितनी तेजी से बदल रहा है। इसकी कल्पना शायद ही किसी न की होगी। मानव मूल्यों के विघटन के इस दौर में हर एक चीज बिकाऊ नजर आने लगी। हमारी हंसी -मजाक, रोना आदि सभी बाजार की गिरफ्त में आ गए हैं। व्यक्ति भी एक व्यापार बन गया है। बच्चा पैदा करने के कितने पैसे लगेंगे या लेगी। बच्चा पालने के कितने पैसे। किराए पर कोख लेना नया फंडा शुरु हुआ है। फिगर खराब न हो तो पति किसी दूसरी औरत के साथ संबंध बनाकर उससे बच्चा पैदा कर सकता है, पति-पत्नि दोनों खुश है। यह सभी ड्रामा पढकर देखकर बहुत अजीब सा लगता है। शादी की तो मानों जरुरत ही नहीं रही है। लोग कहते हैं सोच बदलों, क्या ऐसी सोच के साथ समाज में रहना होगा। संबंध किसी ओर के साथ बनाओं रहों किसी ओर के साथ, बच्चा किसी से पैदा करो, लालन-पालन करे कोई ओर। शुद्ध विचारों का तो इस आधुनिक समाज ने दिवाला ही निकाल दिया है। रोमांस शुद्ध देशी हो गया है, प्यार के बीच केवल चद्दर रह गई है। चोली और सैक्सी गीतों का जमाना ही पुराना हो गया है। इस सारी सामाजिक प्रक्रिया को बदलने में फिल्मों की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रही है। देश दुनिया घुमने के बाद अब बहुत सी  फिल्में केलव नग्नता ही परोसती है और कहते हैं समय की यही मांग है।

एक समय था जब फिल्में लोगों का आदर्श होती थी। लेकिन धीरे-धीरे समय की मांग और बदलते सामाजिक परिवेश के चलते फिल्में भी अपने मूल से हटकर केवल और केवल पैसे कमाने का एक साधन बन गई है। आज फिल्म के सुपर हिट होने का कारण दर्शक नहीं, बल्कि करोडों रुपया का बिजनेस है। पुरानी पीढी के लोगों से बात करने पर पता चलता है कि कैसे फिल्में खुलती चली गई और जुम्मन दृश्य से आज हॉट सीन तथा उससे भी आगे बढ गई है। पुरानी फिल्मों में यदि किसी जुम्मन दृश्य को दिखाना होता था तो फूलों को मिलाकर संदेश दे दिया जाता था। लेकिन वर्तमान में तो नायक-नायिका दुकान से कॉडम खरीदने उट-पटांक डॉयलाग करते दिखाई दे जाते हैं, साथ ही कुछ दृश्य तो हद ही पार कर गए हैं। किसी से बात करें तो कहते हैं कि इसमें बुराई ही क्या है लोगों को नई जानकारी मिल रही है। आज फिल्म रिलीज करने से पहले यह बात कहनी पडती है कि यह फिल्म परिवार के देखने के लायक है और इस फिल्म में हॉट सीन की भरमार है। जबकि पुरानी फिल्मों को इतना कुछ संदेश नहीं देना पडता था। विचार करे और जाने तो यही सभी कुछ आधुनिकता है तो फिर आने वाला समय कैसा होगा इसकी कल्पना करके साहित्यिक मन उदास होता चला जाता है।€ 

रविवार, 15 सितंबर 2013

हिंसा नहीं साथ चाहिए


हिंसा नहीं साथ चाहिए
डॉ. नीरज भारद्वाज

धर्म, आस्था, राजनैतिक हानि-लाभ, साम्प्रदायिकता आदि के नाम पर यह देश कब तक ऐसे दंगों को सहता रहेगा। यह सवाल बार-बार जहन में उठता है और दब जाता है। आखिर यह हिंसा कब रुकेगी। कितने ही साहित्यकार और मेरे लेखक मित्र ऐसे विषयों पर लिख चुके हैं। लेकिन लोगों की समझ पता नहीं किस दिशा की ओर है। एक बार विभाजन का तांडव देख चुके देशवासी क्या फिर ऐसा ही करने जा रहे हैं। ऐसी हिंसाओं में कितनी ही माताओं के लाल, कितनी ही सुगानों के सुहाग और कितनी ही बहनों के भाई जाने अनजाने भगवान को प्यारे हो जाते हैं। क्या देशवासियों को कोई फर्क नहीं पडता। यदि हिंसा, हत्या और जोर-जबरदस्ती किसी भी चीज का समाधान होता तो आज पूरे विश्व में जंगल राज होता। लेकिन जिस तरीके से भारतीय जनता अपना आपा खोकर ऐसी हिंसाओं को जन्म देती है तो यह बडे ही शर्म की बात है। यदि देश का कोई भी शहीद स्वतंत्रता सैनानी जीवित होता और हमारे इस दंगे आचरण को देखता तो वह अपने किये हुए पर जरुर पछताता, क्योंकि उसने ऐसा सोचा भी नहीं होगा।
     उत्तर प्रदेश में हुई हिंसा देश के लिए शर्मसार कर देने वाली घटना है। सभी राजनैतिक दल हिंसा को देख रहे हैं, मरते लोगों पर राजनीति कर रहे हैं। यह समय देशवासियों को समझाने उन्हें एकजुट रहने के लिए कहने का है। एक तरफ तो देश सीरिया के हमले को गलत बता रहा है, वहीं दूसरी ओर अपने ही देश में, जो हो रहा है क्या यह सीरिया से कम है। रुपये का दिवाला निकल चुका है, राजनीति ठंडे बस्ते में पडी है, राजनेता मौके की तलाश में है, जनता मर रही है, ब्यान बाजी जारी है। एक ओर संदेश आने वाला है, जांच कमेटी बैठा दी गई है, लोग शांति बनाए रखे।
     पत्रकारिता और पत्रकार लोगों को समझाने और उन्हें सही खबर दिखाने का प्रयास करती है। लेकिन पत्रकारों पर जानलेना हमला करके उन्हें भी नहीं छोडा जा रहा है। हिंसा में हमारा एक पत्रकार साथी सत्य से अवगत कराता-कराता दुनिया ही छोड गया। इसका जिम्मेदार कौन है। ऐसे हाल को देख शहीद देशभक्त गणेश शंकर विद्यार्थी जी याद आ गए।
     यदि समय रहते सभी कुछ ठीक नहीं हुआ और धर्म या आस्था के नाम पर ऐसे ही दंगे होते रहे, तो वह दिन दूर नहीं कि हम अपनी आने वाली पीढी के लिए केवल और केवल हिंसा ही छोड जायेगें। हमारा देशवासियों से एक ही निवेदन है कि वह ऐसी हिंसाओं को रोके और यदि कहीं सूत्रों से पता चलता भी है, तो उसे रोकने का प्रयास करें। सच्चे अर्थों में यही देशभक्ति है। मित्रों माला का हर एक मोती अपना स्थान रखता है और माला में से एक मोती निकल जाए तो उसकी भरपाई कोई नहीं कर सकता है।   



बुधवार, 21 अगस्त 2013

भाषाः अर्थ और परिभाषा


भाषाः अर्थ और परिभाषा

     भाषा की मूलभूत इकाई ध्वनि है। इसके संयोजन से भाषा का निर्माण होता है, और व्यक्ति अपने अनुभवों की अभिव्यक्ति करता है। ध्वनियों के संयोजन से शब्द का निर्माण, और शब्दों की व्यवस्था से वाक्य का निर्माण होता है। वाक्य ही भाषा को आस्तित्व प्रदान करते हैं।

ध्वनि             शब्द           वाक्य           भाषा

इस प्रकार भाषा शब्दों का संयोजित रूप है, जो किसी व्यक्ति समाज या राष्ट्र के संस्कारों से निधरित होती है और समाज में परस्पर विचार-विर्मश का एक सशक्त साध्न बनती है। भाषा के द्वारा ही समाज, समूह अथवा राष्ट्र की सभी सांस्कृतिक, सामाजिक और धर्मिक व्यवस्था स्पष्ट होती चली जाती हैं।

मनुष्य अपने भावों विचारों एवं अनुभूतियों को भली-भांति केवल ध्वनि संकेतों के माध्यम से ही अभिव्यक्त करता है। संकेतों को अशाब्दिक भाषा और ध्वनि संकेतों को शाब्दिक भाषा कहते हैं। भाषा के माध्यम से ही एक व्यक्ति अपने विचार, कल्पना व चिंतन को एक दूसरे तक पहुंचाता है। ‘भाषा’ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत की ‘भाष्’ धतु से माना जाती है, जिसका शाब्दिक अर्थ है - व्यक्त वाणी या बोलना। भाषा के कारण ही मनुष्य इस जीवन जगत में सर्वश्रेष्ठ प्राणी है। भाषा ही हर एक व्यक्ति तथा देश की पहचान होती है और उस देश की सभ्यता, संस्कति और संस्कार उनकी भाषा में प्रतिबिंबित होते हैं। डाॅ बाबूराम सक्सेना ने बडे़ ही सरल शब्दों में भाषा शब्द के अभिप्राय को स्पष्ट करते हुए लिखा है, भाषा शब्द का प्रयोग कभी व्यापक अर्थ में होता है तो कभी संकुचित। विचार किया जाए तो भाषा जिस सांस्कतिक विरासत में पफलती-पफूलती है वह उस विरासत को पीढ़ी-दर-पीढ़ी पहुंचाने का कार्य भी करती है। भाषा का उद्गम ही मनुष्य वेफ विकास का सूचक है। भाषा का विकास समयानुसार होता रहा है और युगीन स्थितियों से संचालित होकर भाषा निरंतर नया और सरल रूप धारण करती रही है।



भारतीय विद्वानों के अनुसार भाषा की परिभाषाः



महर्षि पतांजलि के मतानुसार, व्यक्ता वाचि वर्णों येषां ते इमे व्यक्तवाचः कहने का भाव है कि वर्णों में व्यक्त होने वाली वाणी ही भाषा है।

भर्तृहरि वेफ अनुसार, भाषा यथार्थ को गढ़ती है ;यानी पहले से ही मौजूद किसी यथार्थ को महज उद्घाटित भर नहीं करतीद्ध

आचार्य दंडी वेफ अनुसार,  फ्यह सृष्टि अंध्कार में डूब गई होती, यदि भाषा रूपी प्रकाश का अभ्युदय न हुआ होता ।,

कामता प्रसाद गुरू के अनुसार, भाषा वह साध्न है जिसके दवारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भांति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकता है।

भोलानाथ तिवारी के अनुसार, भाषा उच्चारण-अवयवों से उच्चारित स्वेच्छाचारी ध्वनि प्रतीकों की वह अवस्था है जिसके दवारा एक समाज के लोग आपस में भावों और विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।

बाबूराम सक्सेना के अनुसार, भाषा से तात्पर्य, विचारों एवं भावों का व्यक्तिकरण प्रमुख रूप से श्रोत, ग्राहय ध्वनि चिह्नों से प्रमाणित होता है। 

सुमित्रानंदन पंत के अनुसार, भाषा संसार का नादमय चित्रा है, ध्वनिमय स्वरूप है, यह विश्व की  हृदयतंत्राी की झंकार है, जिनके स्वर में अभिव्यक्ति होती है।



पाश्चात्य विद्वानों के अनुसार भाषा की परिभाषाः



मैक्स मूलर के अनुसार, भाषा और कुछ नहीं, केवल मानव की चतुर बुदध् िदवारा आविष्कृत एक ऐसा उपाय है, जिसकी सहायता से हम अपने विचार सुगमता और तत्परता से प्रकट कर सकते हैं।

प्लेटो के अनुसार, विचार आत्मा की मूक या ध्वनि-हीन बातचीत है, पर वही जब ध्वनि के रूप में होठों दवारा प्रकट होती है, तो उसे भाषा कहते हैं।

पियाजे वेफ अनुसार, भाषा अन्य संज्ञानात्मक तंत्रों की भांति परिवेश वेफ साथ अंतःक्रिया वेफ माध्यम से ही विकसित होती है।

क्रोंच के अनुसार, भाषा अभिव्यक्ति की दृष्टि से उच्चरित एवं सीमित ध्वनियों का संगठन है।

चाॅम्स्की वेफ अनुसार, भाषिक क्षमता जन्मजात ही होती है, वरना भाषिक व्यवस्था को सीखने की प्रक्रिया संभव ही नहीं हो सकती। वे मानते हैं कि, भाषा सीखे जाने वेफ काम में, वैज्ञानिक पड़ताल भी साथ-साथ चलती रहती है।

व्योगोत्स्की वेफ अनुसार, बच्चे की भाषा समाज वेफ साथ संपर्क का ही परिणाम है, साथ ही बच्चा अपनी भाषा वेफ विकास वेफ दौरान दो तरह की बोली बोलता हैः पहली आत्मवेफंद्रित और दूसरी सामाजिक।

स्वीट के अनुसार, ध्वन्यात्मक शब्दों के दवारा विचारों को प्रकट करना ही भाषा है।



     भारतीय और पाश्चात्य विद्वानों की भाषा की परिभाषाओं को जानने के बाद कहा जा सकता है कि भाषा वाक-प्रतिकों की एक व्यवस्था है। वाक-प्रतिक अनेक प्रकार के होने के कारण भाषा भी अनेक प्रकार की होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो भाषा ध्वनि संकेतों का प्रयोग होता है, जो रूढ़ एवं परंपरागत होते हैं। 

मंगलवार, 30 जुलाई 2013


मित्रो यह उत्तर पुस्तिका अनुमानित है।

Paper-II (Hindi, Part-IV Ans.)
JP-2
91 (4. हम) 92 (1. प्रश्नवाचक)    93 (1. शारीरिक) 94 (4)    95 (4)   
96 (2)    97 (4)    98 (3)    99 (-)    100 (2)   101 (4)
102 (1. पुण्य)   103 (2)   104 (1)   105 (4)   106 (1)   107 (4)
108 (3)   109 (1)   110 (4)   111 (3)   112 (1)   113 (2)
114 (2)   115 (1)   116 (4)   117 (2)   118 (4)   119 (1) 120(-)
(Hindi, Part-V Ans.)
121 (-)   122 (4 दंडित)   123 (4)   124 (1)   125 (4)   126 (1)
127 (3)   128 (2)   129 (1)   130 (4)   131 (3)   132 (1)
133 (4)   134 (2)   135 (1)   136 (4)   137 (-)   138 (-)
139 (1)   140 (-)   141 (3)   142 (1 या 3)   143 (2) 144(-)
146 (2)      147 (-)        148 (-)        149 (-)        150 (2).




मित्रों यह  उत्तर पुस्तिका अनुमानित है।

Paper-II (Hindi, Part-IV Ans.)
JP-2
91 (4. हम) 92 (1. प्रश्नवाचक)    93 (1. शारीरिक) 94 (4)    95 (4)   
96 (2)    97 (4)    98 (3)    99 (-)    100 (2)   101 (4)
102 (1. पुण्य)   103 (2)   104 (1)   105 (4)   106 (1)   107 (4)
108 (3)   109 (1)   110 (4)   111 (3)   112 (1)   113 (2)
114 (2)   115 (1)   116 (4)   117 (2)   118 (4)   119 (1) 120(-)
(Hindi, Part-V Ans.)
121 (-)   122 (4 दंडित)   123 (4)   124 (1)   125 (4)   126 (1)
127 (3)   128 (2)   129 (1)   130 (4)   131 (3)   132 (1)
133 (4)   134 (2)   135 (1)   136 (4)   137 (-)   138 (-)
139 (1)   140 (-)   141 (3)   142 (1 या 3)   143 (2) 144(-)
146 (2)      147 (-)        148 (-)        149 (-)        150 (2).


शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

पत्रकारिता जनून है


पत्रकारिता जनून है
                                                      डॉ. नीरज भारद्वाज
पत्रकारिता के अर्थ की बात करें तो पत्रकारिता को  अंग्रेंजी में जर्नलिज्म कहते है, जो जर्नल शब्द से निकला है] जिसका शाब्दिक अर्थ दैनिक है अर्थात्  दिन&प्रतिदिन के क्रिया&कलापों] सरकारी] सावर्जनिक बैठकों का विवरण जर्नल कहलाता है लेकिन शाब्दिक अर्थ जो भी हो पत्रकारिता यदि जनून है तो पत्रकार जनूनी है, पत्रकारिता जंग है तो पत्रकार जंगी है, पत्रकारिता सच्चाई है तो पत्रकार उस सच्चाई को उदघाटित करने वाला सत् चरित्र पुरुष है, पत्रकारिता राह है तो पत्रकार उस राह का एक राहगीर है, पत्रकारिता देश का आईना है तो पत्रकार सच्चा देशभक्त है, जो उस आईने पर धूल नहीं जमने देता है। पत्रकारिता और पत्रकार आखिर है क्या यह सवाल कई बार सामने आया तो यह सब लिखने को मन किया। डॉ. शंकरदयाल शर्मा लिखते हैं किपत्रकारिता एक पेशा नहीं है, बल्कि यह तो जनता की सेवा का माध्यम है पत्रकारों को केवल घटनाओं का विवरण ही पेश नहीं करना चाहिए, आम जनता के सामने उसका विश्लेषण भी करना चाहिए पत्रकारों पर लोकतांत्रिक परम्पराओं की रक्षा करने और शांति एवं भाईचारा बनाए रखने की भी जिम्मेदारी आती है आधुनिक समय मे पत्रकारों ने अपने निरंतर प्रयासों से पत्रकारिता को एक नई ऊँचाई और गंभीरता दी है । इस दृष्टि से पत्रकारिता यदि समसामयिक घटना&चक्र का शीघ्रता में लिखा गया इतिहास है तो पत्रकार उस इतिहास को लिखने वाला एक सफल इतिहासकार है। प्रो. अंजन कुमार बनर्जी के शब्दों में कहें तोपत्रकारिता पूरे विश्व की ऐसी देन है जो सबमें दूर दृष्टि प्रदान करती है
 पत्रकारिता ज्ञान और विचारों को शब्दों तथा चित्रों के रूप में दूसरे तक पहुंचाना है। पत्रकारिता की उत्पत्ति समाज में जनचेतना और जागृति के लिए मानी जाती है।  पत्रकारिता  लोगों के बीच संवाद कायम करती है और पत्रकार उस संवाद को नई रोशनी देता है। पत्रकारिता सामाजिक, सांस्कृतिक एवं राजनीतिक चेतना की अग्रदूत बनकर जनकल्याण और विश्वबंधुत्व एवं भ्रातृत्व की भावना को विकसित करने का सशक्त माध्यम है। पत्रकारिता देश, समाज तथा लोगों को जीने की कला सिखाती है। विचार किया जाए तो हमारे चारों ओर होने वाली सभी घटनाएं पत्रकारिता के अंग है और हम जाने-अजाने पत्रकारिता करते रहते हैं, जरुरत है तो सिर्फ उसे पहचानने की। वास्तव में भारत में पत्रकारिता की कहानी भारतीय राष्ट्रीयता के विकास की कहानी है और दोनों की विकास भूमियां एक दूसरे की सहायक रही हैं। यदि पत्रकारिता को राष्ट्रीयता ने उजागर किया है तो पत्रकारिता ने भी राष्ट्रीयता को उज्वलित कर राष्ट्रीयता के विकास की अनुकूल भूमि तैयार की। पत्रकारिता  साहित्य की भाँति समाज में चलने वाली गतिविधियों एवं हलचलों का दर्पण है।