शुक्रवार, 17 मई 2019

ग्रियर्सन



ग्रियर्सन
जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन (1851-1941) अंग्रेजों के जमाने में "इंडियन सिविल सर्विस" के कर्मचारी थे। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में, उनका स्थान अमर है। सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन "लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया" के प्रणेता के रूप में उभर आए। नव्य भारतीय आर्यभाषाओं के अध्ययन की दृष्टि से उन्हें बीम्सभांडारकर और हार्नली के समकक्ष रखा जा सकता है।
ग्रियर्सन का जन्म डब्लिन के निकट हुआ था। उनके पिता आयरलैंड में क्वींस प्रिंटर थे। 1868 से डब्लिन में ही उन्होंने संस्कृत और हिंदुस्तानी का अध्ययन प्रारंभ कर दिया था। बीज़ (Bee's) स्कूल श्यूजबरी, ट्रिनटी कालेज, डब्लिन और केंब्रिज तथा हले (Halle) (जर्मनी) में शिक्षा ग्रहण कर 1873 में वे इंडियन सिविल सर्विस के कर्मचारी के रूप में बंगाल आए और प्रारंभ से ही भारतीय आर्य तथा अन्य भारतीय भाषाओं के अध्ययन की ओर रुचि प्रकट की।
1880 में इंस्पेक्टर ऑव स्कूल्स, बिहार और 1869 तक पटना के ऐडिशनल कमिश्नर और औपियम एज़ेंट, बिहार के रूप में उन्होंने कार्य किया। सरकारी कामों से छुट्टी पाने के बाद वे अपना अतिरिक्त समय संस्कृतप्राकृत, पुरानी हिंदी, बिहारी और बंगला भाषाओं और साहित्यों के अध्ययन में लगाते थे।
इनकी ख्याति का प्रधान स्तंभ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया ही है। इनका सर्वे 21 जिल्दों में है और उसमें भारत की 179 भाषाओं और 544 बोलियों का सविस्तार सर्वेक्षण है। साथ ही भाषाविज्ञान और व्याकरण संबंधी सामग्री से भी वह पूर्ण है। ग्रियर्सन कृत सर्वे अपने ढंग का एक विशिष्ट ग्रंथ है। ग्रियर्सन कृत सर्वे ही एक ऐसा पहला ग्रंथ है जिसमें दैनिक जीवन में बोली जानेवाली भाषाओं और बोलियों तथा मानचित्र का दिग्दर्शन प्राप्त होता है।
इन्हें सरकार की ओर से 1894 में सी.आई.ई. और 1912 में "सर" की उपाधि दी गई। 1894 में उन्होंने हले से पी.एच.डी. और 1902 में ट्रिनिटी कालेज डब्लिन से डी.लिट्. की उपाधियाँ प्राप्त कीं। वे रॉयल एशियाटिक सोसायटी के भी सदस्य थे। उनकी मृत्यु 1941 में हुई।
ग्रियर्सन ने सर्वाधिक महत्व के तीन कार्य किए -
1. लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया (भारतीय भाषाओं का सर्वेक्षण)
2. द मॉडर्न वर्नाक्यूलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान
3. तुलसीदास का वैज्ञानिक अध्ययन
ग्रियर्सन ने (लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ इंडिया) भारतीय भाषाओं के सर्वेक्षण का कार्य 1888 ई. से आरंभ 1903 में समाप्त किया। इसकी भूमिका में ग्रियर्सन ने लिखा है - It is a comparative Vocabulary of 168 selected words. in about 368 different languages and dialects. …gramophone records are available in this Country and in Paris.
इसमें भारतीय भाषाओं, उप-भाषाओं और बोलियों के उदाहरण संकलित हैं। जिसमें तिब्बती, चीनी, बर्मी और ईरानी भाषा परिवार को भी सम्मिलित किया गया है। उन भाषाओं की सूची जिनके ग्रामोफोन रेकार्ड इस देश में तथा पेरिस में उपलब्ध है। भारतीय आर्य भाषाओं के इतिहास का सबसे अधिक प्रामाणिक तथा क्रमबद्ध वर्णन इस भूमिका में सुगमता से मिल सकता है। ग्रियर्सन लिखते हैं - Finish a work extending over thirty years. that after writing this Preface, the pen will be laid down. ...I plead guilty to a vain boast whom I claim that what has been done in it for India has been done for no other country in the world.  मैथिल कोकिल विद्यापति की 'कीर्तिलता' और 'कीर्तिपताका' नामक दो ग्रंथों का परिचय साहित्य जगत को करवाने वाले ग्रियर्सन ही थे।
ग्रियर्सन ठेठ हिंदुस्तानी को साहित्यिक उर्दू तथा हिंदी की जननी मानते थे। इतिहास को लिखते समय उन्होंने शिवसिंहसरोज को आधार माना जिसका उल्लेख शुक्ल जी ने भी किया है। ग्रियर्सन की यह मान्यता थी कि - 'मैं इसको एक ऐसे सामग्री संग्रह के रूप में ही भेंट कर रहा हूँ जो नींव का काम दे सके।' जिनके लेखकों का नाम हम जानते तक नहीं किंतु वे जनता के हृदयों में जीवित वाणी बनकर बचे हुए हैं क्योंकि उन्होंने जन की सत्य और सुंदर की भावना को प्रभावित किया।
इस हिंदी प्रेमी अँग्रेज का 90 वर्ष की आयु में 8 मार्च 1941 ई. को निधन हो गया।
सर्वेक्षण कार्य प्रारंभ
  • ग्रियर्सन की ख्याति का प्रधान स्तंभ लिंग्विस्टिक सर्वे ऑफ़ इंडिया ही है। 1885 में प्राच्य विद्याविशारदों की अंतर्राष्ट्रीय कांग्रेस ने 'विएना अधिवेशनमें भारतवर्ष के भाषा सर्वेक्षण की आवश्यकता का अनुभव करते हुए भारत सरकार का ध्यान इस ओर आकृष्ट किया। फलत: भारत सरकार ने 1888 में ग्रियर्सन की अध्यक्षता में सर्वेक्षण कार्य प्रारंभ किया।
  • 1888 से 1903 तक उन्होंने इस कार्य के लिये सामग्री संकलित की।
  • 1902 में नौकरी से अवकाश ग्रहण करने के पश्चात 1903 में जब उन्होंने भारत छोड़ा सर्वे के विभिन्न खंड क्रमश: प्रकाशित होने लगे।
  • ग्रियर्सन का सर्वेक्षण 21 जिल्दों में है और उसमें भारत की 179 भाषाओं और 544 बोलियों का सविस्तार सर्वेक्षण है। साथ ही भाषाविज्ञान और व्याकरण संबंधी सामग्री से भी वह पूर्ण है।
महत्वपूर्ण कार्य
  • भाषा- सर्वेक्षण नामक यह ग्रंथ साहित्यभाषा तथा उसके इतिहास के लिए एक अनुपम सन्दर्भ ग्रंथ है।
  • इसके अतिरिक्त इनकी एक पुस्तक मॉडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ़ नॉर्दर्न हिन्दुस्तान भी हैजिसका प्रकाशन सन् 1889 ई. में हुआ। 1906 ई. में पिशाच भाषा तथा 1911 में कश्मीरी पर भी इनके प्रामाणिक ग्रंथ निकले। 1924 में 4 भागों में इनका कश्मीरी कोश प्रकाशित हुआ।
  • ग्रियर्सन का भाषा सम्बन्धी वर्गीकरण भले ही उचित न हो पर महत्वपूर्ण अवश्य है। उनकी दृष्टि में हिन्दीहिन्दुस्तानी का ही एक रूप है। हिन्दुस्तानी को उन्होंने मूल भाषा माना है। इसकी परिणति वे उर्दू में मानते हैं।
  • ग्रियर्सन के भाषा-सर्वेक्षण में विभिन्न बोलियों के उदाहरण तो है किंतु अरबी - फारसी शब्दों की संख्या नगण्य है। वे ठेठ हिन्दुस्तानी को साहित्यिक उर्दू तथा हिन्दी की जननी मानते हैं। 11जिल्दों में सभी भारतीय भाषाओं एवं बोलियों का उदाहरण एवं उनका व्याकरण दे देना ग्रियर्सन के अमरत्व के लिए पर्याप्त है।
  • ग्रियर्सन की सुविस्तृत भूमिका उनके श्रेष्ठ पांडित्य का उत्कृष्ट प्रमाण है।
·         1873 और 1869 के कार्यकाल में ग्रियर्सन ने अपने महत्वपूर्ण खोज कार्य किए।
·         उत्तरी बंगाल के लोकगीत, कविता और रंगपुर की बँगला बोली - जर्नल ऑव दि एशियाटिक सोसायटी ऑव बंगाल, 1877
·         राजा गोपीचंद की कथा; वही, 1878,
·         मैथिली ग्रामर (1880)
·         सेवेन ग्रामर्स आव दि डायलेक्ट्स ऑव दि बिहारी लैंग्वेज (1883-1887)
·         इंट्रोडक्शन टु दि मैथिली लैंग्वेज;
·         ए हैंड बुक टु दि कैथी कैरेक्टर,
·         बिहार पेजेंट लाइफ,
·         बीइग डेस्क्रिप्टिव कैटेलाग ऑव दि सराउंडिंग्ज ऑव दि वर्नाक्युलर्स, जर्नल ऑव दि जर्मन ओरिएंटल सोसाइटी (1895-96),
·         कश्मीरी व्याकरण और कोश,
·         कश्मीरी मैनुएल,
·         पद्मावती का संपादन (1902) महामहोपाध्याय सुधाकर द्विवेदी की सहकारिता में,
·         बिहारीकृत सतसई (लल्लूलालकृत टीका सहित) का संपादन,
·         नोट्स ऑन तुलसीदास,
·         दि माडर्न वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑव हिंदुस्तान (1889)
·         आदि उनकी कुछ महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं।
 हिंदी साहित्य का पहला काल विभाजन करने का श्रेय भी इन्ही को जाता है।








गिलक्राइस्ट



गिलक्राइस्ट

जॉन बार्थविक गिलक्राइस्ट (जून 1759 – 1841) का जन्म एडिनबरा में हुआ था। उन्होंने एडिनबरा के जार्ज हेरियट्स अस्पताल में चिकित्सा संबंधी शिक्षा ग्रहण की। चिकित्सीय शिक्षा प्राप्त कर वे अप्रैल 1783 को ईस्ट इंडिया कंपनी में एक चिकित्सक के रूप में कलकत्ता भारत आए। जहाँ 21 अक्टूबर सन् 1794 को सर्जन का पद दिया गया। तब तक शासन कार्य फारसी में होता था। जॉन गिलक्राइस्ट ने फारसी के स्थान पर शासनकार्य को हिंदुस्तानी के माध्यम से चलाने की बात सोची। वे स्वयं अध्ययन करते रहे और दूसरों को भी इस बात के लिए प्रेरणा देते रहे। गिलक्रिस्टईस्ट इंडिया कम्पनी के कर्मचारी एवं भाषाविद थे। कलकत्ता के फोर्ट विलियम्स कॉलेज में इन्होने हिंदुस्तानी भाषा की पुस्तकें तैयार कराने का कार्य किया।

1.     इंग्लिश-हिन्दुस्तानी डिक्शनरी, कलकत्ता (1787)

2.     हिन्दुस्तानी ग्रामर (1796)

गिलक्राइस्ट का महत्व इस दृष्टि से बहुत अधिक है कि शिक्षा माध्यम के रूप में इन्होंने हिन्दी का महत्व पहचाना। माक्विस बेलेज़ली ने अपने गर्वनर जनरल के कार्यकाल (1798-1805) में अंग्रेज प्रशासकों तथा कर्मचारियों को प्रशिक्षित करने तथा उन्हें भारतीय भाषाओं से परिचित कराने के लिए कलकत्ता में 4 मई सन् 1800 0 को फोर्ट विलियम कॉलेज की स्थापना की। सन् 1800 में कालेज के हिन्दुस्तानी विभाग के अध्यक्ष के रूप में गिलक्राइस्ट को नियुक्त किया गया। आप ईस्ट इंडिया कम्पनी में सहायक सर्जन नियुक्त होकर आए थे। उत्तरी भारत के कई स्थानों में रहकर इन्होंने भारतीय भाषाओं का ज्ञान प्राप्त किया।
सन् 1800 में ही गिलक्राइस्ट के सहायक के रूप में लल्लूलाल की नियुक्ति सर्टिफिकेट मुंशी के पद पर हुई। गिलक्राइस्ट ने हिन्दी में पाठ्य पुस्तकें तैयार कराने की दिशा में प्रयास किया। जिस समय फोर्ट विलियम कॉलेज की ओर से उर्दू और हिन्दी गद्य की पुस्तकें लिखने की व्यवस्था हुई उसके पहले हिन्दी खड़ी बोली में गद्य की कई पुस्तकें लिखी जा चुकी थीं। (हिंदी साहित्य का इतिहास, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पृष्ठ, 301)
1860 में फोर्ट विलियम कॉलेज (कलकत्ता) के हिन्दी उर्दू अध्यापक जान गिलक्राइस्ट ने देशी भाषा की गद्य पुस्तकें तैयार कराने की व्यवस्था की तब उन्होंने उर्दू और हिन्दी दोनों के लिए अलग अलग प्रबंध किया। इसका मतलब यही है कि उन्होंने उर्दू से स्वतंत्र हिन्दी खड़ी बोली का अस्तित्व भाषा के रूप में पाया। फोर्ट विलियम कॉलेज के आश्रय में लल्लूलालजी गुजराती ने खड़ी बोली के गद्य में 'प्रेमसागर' और सदल मिश्र ने 'नासिकेतोपाख्यान' लिखा। अत: खड़ी बोली गद्य को एक साथ आगे बढ़ानेवाले चार महानुभाव हुए हैं , मुंशी सदासुख लाल, सैयद इंशाअल्ला खाँ, लल्लूलाल और सदल मिश्र। ये चारों लेखक संवत् 1860 के आसपास हुए। (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ,301)
गिलक्राइस्ट ने भारत में बहुप्रयुक्त भाषा रूप को खड़ी बोली' की संज्ञा से अभिहित किया। खड़ी बोली' को अपने भारत की खालिस या खरी बोली माना है। गिलक्राइस्ट ने इसको प्योर स्टर्लिंग' माना तथा अपने कोश में Sterling का अर्थ किया है - Standard, Genuine. इसी भाषा रूप में गिलक्राइस्ट ने लल्लूलाल को लिखने का निर्देश प्रदान किया। लल्लूलाल ने अपने ग्रन्थ प्रेमसागर' की भूमिका में लिखा है:-‘‘ श्रीयुत गुनगाहक गुनियन-सुखदायक जान गिलकिरिस्त महाशय की आज्ञा से सम्वत् 1860 (अर्थात् सन् 1803) में श्री लल्लू जी लाल कवि ब्राह्मन गुजराती सहस्र अवदीच आगरे वाले ने जिसका सार ले, यामिनी भाषा छोड़, दिल्ली आगरे की खड़ी बोली में कह, नाम प्रेमसागर' धरा।'' संवत् 1860 में कलकत्ता के फोर्टविलियम कॉलेज के अध्यापक जान गिलक्राइस्ट के आदेश से इन्होंने खड़ी बोली गद्य में 'प्रेमसागर' लिखा जिसमें भागवत दशमस्कंध की कथा वर्णन की गई है। (हिंदी साहित्य का इतिहास, पृष्ठ,304)
हिन्दी भाषा और फ़ारसी लिपि का घालमेल फोर्ट विलियम कॉलेज (1800-54) की देन थी। फोर्ट विलियम कॉलेज के हिन्दुस्तानी विभाग के सर्वप्रथम अध्यक्ष जॉन गिलक्राइस्ट थे। उनके अनुसार हिन्दुस्तानी की तीन शैलियाँ थींदरबारी या फ़ारसी शैली, हिन्दुस्तानी शैली, हिन्दवी शैली। गिलक्राइस्ट फ़ारसी शैली को दुरूह तथा हिन्दवी शैली को गँवारू मानते थे। इसलिए उन्होंने हिन्दुस्तानी शैली को प्राथमिकता दी। उन्होंने हिन्दुस्तानी के जिस रूप को बढ़ावा दिया, उसका मूलाधार तो हिन्दी ही था, किन्तु उसमें अरबीफ़ारसी शब्दों की बहुलता थी और वह फ़ारसी लिपि में लिखी जाती थी। गिलक्राइस्ट ने हिन्दुस्तानी के नाम पर असल में उर्दू का ही प्रचार किया।

गार्सां द तासी



'गार्सां द तासी'
हिंदुओं में राजा शिवप्रसाद अंग्रेजों के उसी ढंग के कृपापात्र थे जिस ढंग से सर सैयद अहमद। अत: हिन्दी की रक्षा के लिए उन्हें खड़ा होना पड़ा और वे बराबर इस संबंध में प्रयत्नशील रहे। इससे हिन्दी उर्दू का झगड़ा बीसों वर्ष तक ये कहें की भारतेंदु के समय तक  चलता रहा। हिन्दी उर्दू के झगड़े में तासी का नाम भी जानना जरूरी है। यहाँ उनके जीवन पर प्रकाश डालना जरूरी है।
तासी के इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐंदूई ऐ ऐंदूस्तानी- इस ग्रंथ के दो संस्करण प्रकाशित है एक 1839 में दूसरा 1847 में हुआ। इसमें 738 कवियों और लेखकों की जीवनियाँ और ग्रंथों का उल्लेख है। इसके भूमिका में 16 और कुल 630 पृष्ठ हैं। 'गार्सां द तासी' एक फ्रांसीसी विद्वान थे जो पेरिस में हिंदुस्तानी या उर्दू के अध्यापक थे। डॉ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय ने इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐंदूई ऐ ऐंदूस्तानी पुस्तक का अनुवाद किया। उसकी भूमिका में वे लिखते हैं कि तासी का जीवन संबंधी विवरण उपलब्ध न हो सका। इस समय उन्ही के उल्लेखानुसार केवल इतना ही कहा जा सकता है कि वे फ्रांस के एक राजकीय और विशेष स्कूल में जीवित पूर्वी भाषाओं के प्रोफेसर रहे। इसके साथ ही उन्होंने अनेक संस्थाओं के नाम भी लिखे हैं, जिनसे वो जुड़े रहे। तासी को स्टार ऑव दि साउथ पोल  की उपाधियाँ भी प्राप्त थी। आचार्य शुक्ल के मतानुसार, 'गार्सां द तासी' एक फ्रांसीसी विद्वान थे जो पेरिस में हिंदुस्तानी या उर्दू के अध्यापक थे। उन्होंने संवत् 1896 में 'हिंदुस्तानी साहित्य का इतिहास' लिखा था जिसमें उर्दू के कवियों के साथ हिन्दी के भी कुछ विद्वान कवियों का उल्लेख था। डॉ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय जी लिखते हैं कि, प्रेमसागर को तासी काफी महत्त्व देते थे और उसका उन्होंने जिस प्रकार विश्लेषण किया है, उससे उनके कट्टर ईसाई होने का प्रमाण मिलता है।
तासी ने हिंदी कवियों का परिचय देने के लिए भक्तमाल का सहारा लिया था, वह पढ़ने के लिए फोर्ट विलियम कॉलेज के पुस्तकालय का सहारा लेते थे। डॉ लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय जी के मतानुसार- तासी द्वारा भक्तमाल से लिए गए अवतरणों का फ्रेंच से हिन्दी में अनुवाद करते समय मैंने छप्पय सर्वत्र और कुछ अन्य उपयुक्त अंश मूल भक्तमाल से ही ले लिए हैं। वे आगे लिखते है कि तासी ने हिन्दी उर्दू के मूल ग्रन्थों का अवलोकन करने के साथ साथ भारतीय तथा यूरोपीय विद्वानों द्वारा निर्मित संदर्भ ग्रन्थों का आश्रय भी ग्रहण किया था। इन सभी ग्रन्थों का उल्लेख उन्होनें साहित्य के इतिहास की भूमिका में किया गया है उदाहरण के लिए नाभादास का भक्तमाल, कृष्णानन्द व्यासदेव का राग कल्पद्रुम आदि।
तासी के समय भारत में अंग्रेजी शासन रहा और कुछ राज्यों में मुसलमान बादशाह थे। बादशाह सदा से एक हिन्दी सेक्रेटरी, जो हिन्दीनवीस कहलाता था और एक फारसी सेक्रेटरी, जिसको फारसीनवीस कहते थे, रखा करते थे। जिससे उनकी आज्ञाएँ दोनों भाषाओं में लिखी जायँ। इस प्रकार विचार करें तो भारत की शासन व्यवस्था आदिकाल से ही द्विभाषिक नीति के साथ चली है। अंग्रेज सरकार पश्चिमोत्तार प्रदेश में हिंदू जनता के लिए प्राय: सरकारी कानूनों का नागरी अक्षरों में हिन्दी अनुवाद भी उर्दू कानूनी पुस्तकों के साथ देती है। तासी के व्याख्यानों से पता लगता है कि उर्दू के अदालती भाषा नियत हो जाने पर कुछ दिन सीधी भाषा और नागरी अक्षरों में भी कानूनों और सरकारी आज्ञाओं के हिन्दी अनुवाद छपते रहे। जान पड़ता है कि उर्दू के पक्षपातियों का जोर जब बढ़ा तब उनका छपना एकदम बंद हो गया। जैसा कि अभी कह आए हैं राजा शिवप्रसाद और भारतेंदु के समय तक हिन्दी-उर्दू का झगड़ा चलता रहा। आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के अनुसार, ''ग्रार्सां द तासी ने संवत् 1909 के आसपास हिन्दी और उर्दू दोनों का रहना आवश्यक समझा था और कभी कहा था कि, यद्यपि मैं खुद उर्दू का बड़ा भारी पक्षपाती हूँ, लेकिन मेरे विचार में हिन्दी को विभाषा या बोली कहना उचित नहीं। '' आचार्य शुक्ल लिखते हैं कि, 'ग्रार्सां द तासी आगे चलकर, मजहबी कट्टरपन की प्रेरणा से, सर सैयद अहमद की भरपेट तारीफ करके हिन्दी के संबंध में फरमाते हैं इस वक्त हिन्दी की हैसियत भी एक बोली (डायलेक्ट) की सी रह गई है, जो हर गाँव में अलग अलग ढंग से बोली जाती है।' तासी के उर्दू के प्रेम के विषय में शुक्ल लिखते हैं कि, 'संवत् 1927 के अपने व्याख्यान में गार्सां द तासी ने साफ खोलकर कहामैं सैयद अहमद खाँ जैसे विख्यात मुसलमान विद्वान की तारीफ में और ज्यादा नहीं कहना चाहता हूँ। उर्दू भाषा और मुसलमानों के साथ मेरा जो लगाव है वह कोई छिपी हुई बात नहीं है।'
हिन्दी की रक्षा के लिए उन्हें उर्दू के पक्षपातियों से उसी प्रकार लड़ना पड़ता था जिस प्रकार यहाँ राजा शिवप्रसाद को। विद्या की उन्नति के लिए लाहौर में 'अंजुमन लाहौर' नाम की एक सभा स्थापित थी। संवत् 1923 के उसके एक अधिावेशन में किसी सैयद हादी हुसैन खाँ ने एक व्याख्यान देकर उर्दू को ही देश में प्रचलित होने के योग्य कहा, उस सभा की दूसरी बैठक में नवीनबाबू ने खाँ साहब के व्याख्यान का पूरा खंडन करते हुए कहाउर्दू के प्रचलित होने से देशवासियों को कोई लाभ न होगा क्योंकि वह भाषा खास मुसलमानों की है। उसमें मुसलमानों ने व्यर्थ बहुत से अरबी फारसी के शब्द भर दिए हैं। पद्य या छंदोबद्ध रचना के भी उर्दू उपयुक्त नहीं। हिंदुओं का यहर् कत्ताव्य है कि ये अपनी परंपरागत भाषा की उन्नति करते चलें। उर्दू में आशिकी कविता के अतिरिक्त किसी गंभीर विषय को व्यक्त करने की शक्ति ही नहीं है। नवीन बाबू के इस व्याख्यान की खबर पाकर इसलामी तहबीज के पुराने हामी, हिन्दी के पक्के दुश्मन गार्सां द तासी फ्रांस में बैठे बैठे बहुत झल्लाए और अपने एक प्रवचन में उन्होंने बड़े जोश के साथ हिन्दी का विरोध और उर्दू का पक्षमंडन किया तथा नवीन बाबू को कट्टर हिंदू कहा।
जब जहाँ कहीं हिन्दी का नाम लिया जाता तब तासी बड़े बुरे ढंग से विरोध में कुछ न कुछ इस तरह की बातें कहता। सर सैयद अहमद का अंगरेज अधिकारियों पर कितना प्रभाव था, यह पहले कहा जा चुका है। संवत् 1925 में इस प्रांत के शिक्षा विभाग के अधयक्ष हैवेल साहब ने अपनी यह राय जाहिर की कि यह अधिक अच्छा होता यदि हिंदू बच्चों को उर्दू सिखाई जाती न कि एक ऐसी 'बोली' में विचार प्रकट करने का अभ्यास कराया जाता जिसे अंत में एक दिन उर्दू के सामने सिर झुकाना पड़ेगा। 
इस राय को गार्सां द तासी ने बड़ी खुशी के साथ अपने प्रवचन में शामिल किया। इसी प्रकार इलाहाबाद इंस्टीटयूट के एक अधिावेशन में (संवत् 1925) जब यह विवाद हुआ था कि 'देसी जबान' हिन्दी को मानें या उर्दू को, तब हिन्दी के पक्ष में कई वक्ता उठकर बोले थे। गार्सां द तासी ने हिन्दी के पक्ष में बोलने वालों का उपहास किया था। उसी काल में इंडियन डेली न्यूज के एक लेख में हिन्दी प्रचलित किए जाने की आवश्यकता दिखाई गई थी। उसका भी जवाब देने तासी साहब खड़े हुए थे। 'अवध अखबार' में जब एक बार हिन्दी के पक्ष में लेख छपा था तब भी उन्होंने उसके संपादक की राय का जिक्र करते हुए हिन्दी को एक 'भद्दी बोली' कहा था जिसके अक्षर भी देखने में सुडौल नहीं लगते।