रविवार, 2 जून 2019

जयशंकर प्रसाद की कहानियों की समीक्षा

                                                     
पुरस्कार
प्रसाद की कहानियों में देशप्रेम, ऐतिहासिकता और मानव संघर्ष आदि का वर्णन हमें दिखाई देता है। पुरस्कार कहानी प्रेम और मुक्ति चेतना का विकास करके लिखी गई कहानी है। कहानी की शुरआत कोशल के प्रसिद्ध परम्परागत उत्सव से होती है, जिसमें राजा किसी भी कृषक की जमीन को बोने के लिए चुनता है और उसे उपहार स्वरूप स्वर्ण मुद्रा देता है। इस वर्ष  मधूलिका की जमीन ली जाती है। मधूलिका वीर सेनापति सिंहमित्र की कन्या होती है। राजा बड़ा खुश होता है क्योंकि सिंहमित्र ने मगध के साथ युद्ध में विजय दिलाई थी। लेकिन मधूलिका राजा का उपहार लेना स्वीकार नहीं करती और अपनी भूमि पर काम करना चाहती है। इन सभी बातों को दूर खड़ा कोशल का राजकुमार अरूण देख रहा था। मधूलिका को दूसरी जगह भूमि दे दी जाती है और वहीं पर अपना गुजर बसर करती है। इसी दौरान उसका परिचय अरूण से होता है, वह नहीं जानती यह युवक कौन है और किस उद्देश्य से मेरे पास आया है।
अरूण राजा से मधूलिका की जमीन वापस दिलाने की बात भी कहता है। दोनों ही युवा है मधूलिका अरूण के बीच प्रेम हो जाता है। लेकिन दोनों ही मर्यादा में रहते हैं। मधूलिका को धीरे-धीरे अरूण की वास्तविकता का पता चल जाता है कि वह मगध पर आक्रमण कर उसे अपना गुलाम बनाना चाहता है और अपनी हार का बदला लेना चाहता है। मधूलिका भी वीर स्वर्गीय सिंहमित्र की कन्या थी। उसने प्रेम से बड़ा देशप्रेम सोचा और अरूण को सेना के हाथों पकड़वा देती है। अरूण को प्राण दंड़ दिया जाता है। वीर कन्या मधूलिका की बड़ी जय जयकार होती है। राजा ने पुरस्कार देने के बारे में पूछा तो मधूलिका ने कहा- मुझे कुछ न चाहिए। अरूण हँस पड़ा। राजा ने कहा- नहीं मैं तुझे अवश्य दूंगा। माँग ले। मधूलिका कहती है- तो मुझे भी प्राण दण्ड मिल। -कहती वह बन्दी अरूण के पास जा खड़ी होती हुई।
1.       देशप्रेम
2.       ऐतिहासिकता
3.       मानव संघर्ष
4.       मुक्ति चेतना
5.       सच्चा प्रेम (अधूरा प्रेम)

6.       नारी जीवन




                                                आकाशदीप

कहानीकार के रूप में भी जयशंकर प्रसाद मानव-मन की भावनाओं को चित्रित करने में सफल रहे हैं। इनकी कहानी आकाशदीप भी इस भावना से अलग नहीं है। नाटककार होने के नाते, वे कहानी में भी कई बार नाटक का पुट भर देते थे, इस कहानी में भी प्रसाद बड़े ही नाटकीय ढंग से भाव तथा अनुभूतियों को साकार बनाने का सफल प्रयास किया है। बुद्धगुप्त को जलदस्यु और चम्पा को बंदिनी कहकर प्रसाद ने पाठक को उस मूल संवेदना के साथ जोडा़ है जिससे पता चलता है कि मानव के आचरण और व्यवहार को प्रेम तथा त्याग के रास्ते पर चलाकर काफी बदला जा सकता है। आकाशदीप कहानी प्रेमकथा होते हुए भी इसमें उससे ऊपर उठकर सेवाभाव और मानव प्रेम है। कहानी की नायिका चंपा आजीवन भूले-भटके नाविकों को राह दिखाने और दस्यु बुद्धगुप्त की याद में ऊँचे स्तंभ पर दीप जलाती रहती है।
कहानी में दिखाया गया है कि प्रेम किस प्रकार कर्म पर विजय प्राप्त कर लेता है। जलदस्यु बुद्धगुप्त को दुर्दान्त बनाने में परिस्थितियों की अहम भूमिका थी अन्यथा वह भी क्षत्रिय था। अब जलपोतों को लूटना और विरोध करने वालें की नृशंस हत्या कर देना, उसका कर्म बन चुका था। चम्पा अपनी माँ की मृत्यु के बाद अपने पिता के साथ पोत पर ही अपने पिता से साथ रहने लगी जिसका उसने बार-बार उल्लेख भी किया है। ''पिता इसी मणिभद्र के यहाँ प्रहरी का काम करते थे। माता का स्वर्गवास हो जाने पर मैं भी पिता के साथ नाव पर ही रहने लगी। आठ वर्ष से समुद्र ही मेरा घर है।'' एक बार जलदस्युओं ने उसके पिता के जलपोत पर हमला किया। अन्य प्रहरियों के साथ उसके पिता भी हत्या हो जाती है।
मणिभद्र की कुदृष्टि चम्पा पर पड़ती है और वह उसे बन्दी बना लेता है। उसी जहाज पर बन्दी बुद्धगुप्त भी था जो मौका लगते ही चतरुाई से बन्धनमुक्त हो जाते हैं। जैसे ही चम्पा बुद्धगुप्त को देखती है तो समझ जाती है यही जलदस्यु मेरे पिता की मौत का कारण है। बुद्धगुप्त से घृणा करने लगती है।  इस बीच उनकी नाव एक सुनसान द्वीप से जा टकराती है। बुद्धगुप्त उस द्वीप का नाम चम्पाद्वीप रख देता है और चम्पा को समझाता है कि वह उसके पिता की मौत का कारण नहीं है। इससे चम्पा के प्रेम में और वृद्धि होती है। बुद्धगुप्त चाहता है कि परिणय के बाद दोनों स्वदेश वापस लौटें। लेकिन चम्पा इंकार कर देती है और बताती है कि वह संसार से विरक्त हो चुकी है।
एक दिन जब वह नीले समुन्द्र में जलते दीपों की परछाईं और उनकी चमक देखती है तो उसे अपनी माँ की याद आ जाती है। वह बुद्धगुप्त को जलते दीपक के सम्बन्ध में बताती है कि इसमें किसी के आने की उम्मीद भरी हुई है। चम्पा कहती है कि जब मेरे पिता समुन्द्र में जाया करते थे तो मेरी माँ ऊंचे खंभे पर दीपक जलाकर बांधा करती थी जिससे संदेश मिलता था कि कोई घर पर इंतजार कर रहा है इसलिए मैं भी निरन्तर आकाश के छितराये तारों की चमक समुन्द्र-जल में देखती हूँ।
वह बुद्धगुप्त का प्यार छोडऩे के लिए तैयार हो जाती है लेकिन द्वीप के लोगों का विकास करने के लिए अपनी कृतव्य-भावना पर अडिग रहती है। साथ ही कहानीकार प्रसाद ने द्वीप-निवासियों द्वारा उसके प्रति श्रद्धा एवं विश्वास का भाव दिखाकर उसे उत्साहित करने का प्रयास किया है।

कहानी के अंत में प्रसाद द्वारा कहे गए वाक्य ने कहानी की मूल संवेदना को स्पष्ट करने प्रयास किया है- 'यह कितनी ही शताब्दियों पहले की कथा है। चम्पा आजीवन उस द्वीप-स्तम्भ में आलोक जलाती ही रही। किन्तु उसके बाद भी बहतु दिन, द्वीपनिवासी, उस माया-ममता और स्नेह-सेवा की देवी की समाधि-सदृश उसकी पूजा करते थे।एक दिन काल के कठोर हाथों ने उसे भी अपनी चंचलता से गिरा दिया।' कहानी अपने व्यापक कलेवर में राष्ट्रप्रेम, मानवीय प्रेम, सच्ची सेवा भावना, त्याग, करूणा आदि न जाने कितने ही गुणों को अपने में समाये हुए है। 

गुण्डा

बीसवीं सदी की शुरुआत में जब भारतवर्ष में अग्रेंजी हुकूमत के खिलाफ आवाज बुलंद की जा रही थी, उस समय लगभग सभी लेखक और कवि अपने शब्दों में क्रांति भर कर लोगों को जागरूक करने का काम कर रहे थे। इन जोशीली कविताओं और कहानियों को पढ़कर लोगों के अंदर राष्ट्रवाद की भावना ओत-प्रोत होने लगती थी। इसी दौर में छायावाद और राष्ट्रवाद को एक सूत्र में बांधते हुए आम जनमानस के दिलों में जयशंकर प्रसाद अपनी अमिट छाप छोड़ी। इसी दौर में लिखी  उनकी एक कहानी है गुण्डा' । विचार करें तो गुण्डा एक नकारात्मक शब्द है लेकिन इस रचना में गुण्डा का एक सकारात्मक किरदार है, जिसका नाम है नन्हकू सिंहगुण्डा' कहानी में उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ चल रहे संघर्षों को दर्शाया है। जयशंकर प्रसाद ने उस वक्त अपने लेखनी की ताकत दिखाई जब देश गुलामी की जंजीरों में जकड़ा था। उस समय लोग ठीक से लिख नहीं पाते थे, ऐसे समय में प्रसाद ने भारत के गौरवशाली इतिहास की परंपरा का वर्णन करते हुए लोगों को देश प्रेम से जोड़ा। जयशंकर प्रसाद की कहानी गुण्डाहिन्दी की श्रेष्ठ कहानियों में स्थान रखती है। इस कहानी की कथा वाराणसी के तत्कालीन परिवेश पर आधारित है। ईसा की अठारहवी शती के अन्तिम भाग में समस्त न्याय आरै विद्यावाद को शस्त्र-बल के समक्ष परास्त होते देख एक नवीन सम्पद्राय वर्ग को प्रसाद ने उल्लेख किया है, जिन्हें कांशी के लागे गुण्डासमझते हैं। उनका धर्म वीरता था जिसका प्रदर्शन वे अन्याय, अत्याचार के विरुद्ध निर्बल और असहाय की रक्षा करते थे। ऐसे ही एक पात्र नन्हकू सिहं का इस कहानी में जिक्र है, जो काशी के प्रतिष्ठित जमीदांर बाबू निरजंन सिहं का वीर पत्रु है। जीवन के किसी अलभ्य अभिलाषाके पूर्ण न  होने पर वह मानसिक चाटे से घायल हो जाता है, परन्तु स्वाभिमान के साथ निभर्य हाकेर अपने साथियों को लकेर काशी की गलियों में घमूता रहता है। वहीं की एक तवायफ की लडक़ी - दलुरी को नन्हकू और राजमाता पन्ना के प्रेम का पता होता है। लेकिन वह कहीं भी बताती नहीं है। पन्ना अपने पत्रु राजा चतेसिहं के साथ काशी के आतंक पूर्ण भय और सन्नाटे के माहौल में कैद कर ली गई है। जब दुलारी के माध्यम से नन्हकू सिंह को इस बात की जानकारी मिलती है, तो उसका मन अधीर हो उठता है। वह अपनी जान पर खेलकर अपने साथियों के साथ उन्हें उस कैद से आजाद करने के लिए निकल पडत़ा है। वहाँ पहुँचकर वह अपने प्रयास में सफल हाता है। वह स्वयं खडा़ होकर अविचलित भाव से तलवार चलाता हुआ दुश्मन से राजमाता आरै राजपरिवार की रक्षा करता हुआ अपने प्राणों की आहुति दे देता है। कहानी प्रेम, त्याग, देशभक्ति, राष्ट्रवाद आदि सभी गुणों से भरी हुई है।

बेड़ी
जयशंकर प्रसाद की कहानियों में प्रेम, विश्वास, राष्ट्रभक्ति आदि कितने ही गुण दिखाई देते हैं। लेकिन इन सब बातों से परे प्रसाद की कहानियों में बालमन, बाल-मनोविज्ञान, बालचेष्टा आदि बालक को केन्द्र में रखकर कितने ही पक्ष दिखाई देते हैं। बेड़ी प्रसाद की ऐसी ही कहानी है, जिसमें अंधे पिता की सेवा, पुत्र द्वारा पिता की बातों को मानना तथा  उनका कर्तव्य पालन, बचपन छोड़ पारिवारिक जिम्मेदारी निभाना आदि कितने ही पक्ष कहानी में उभरकर आए हैं।
लेखक सड़क पर भीख माँगते अंधे व्यक्ति को देखता है उसके साथ उसकी लाठी पकड़े एक लड़का दिखाई देता है। कुछ दिनों बाद अंधा अकेला दिखाई देता है, बात जानने पर पता चलता है कि लड़का घर छोड़कर भाग गया और भीक्षा में मिलने वाले पैसे से कुछ पैसे बचाकर रख लेता था, उन पैसों को भी ले उड़ा। लेकिन फिर सड़क पर एक दिन अंधा और उसके साथ लड़का दिखाई देता है, जानने के बाद पता चलता है कि वह भागा नहीं था, बल्कि बाबा कि सेवा के लिए काम ढूँढने के लिए शहर गया था सो वापस आ गया। लेकिन अबकी बार बच्चा न भागे इसके लिए अंधे ने बच्चे के पैरों में बेड़ी बाँध दी है, जिससे उसे चलने में तकलीफ भी होती है। उसी समय सड़क पार करते समय एक तेज गति से आती कार बच्चे से टकराई, बच्चा दौड़ न सका, क्योंकि पैरों में बेड़ी बँधी थी। मूक दर्शक भीड़ कह रही थी, हत्य़ारे ने बेड़ी पहना दी है, नहीं तो क्यों चोट खाता! बुड्ढे ने कहा- काट दो बेड़ी बाबा, मुझे न चाहिए। और मैंने हत्बुद्धि होकर देखा कि बालक के प्राण-पखेरू अपनी बेड़ी काट चुके थे।


छोटा जादूगर
बाल साहित्य के रूप में छोटा जादूगर एक सफल रचना है। उसी को यहाँ अपनी दृष्टि से देखने का प्रयत्न कर रहा हूँ। माना जाए तो इस बाल साहित्य में जयशंकर खुद एक पात्र हैं, जो उस बालमन को पढने का प्रयत्न कर रहे हैं। छोटा जादूगर प्रसाद की ऐसी ही कहानी है, जिसमें बीमार माँ की सेवा, पुत्र द्वारा माँ की बातों को मानना तथा उनका कर्तव्य पालन, बचपन छोड़ पारिवारिक जिम्मेदारी निभाना आदि कितने ही पक्ष कहानी में उभरकर आए हैं। कहानी के आरंभ में ही प्रसाद सारी घटना को खोलकर रख देते हैं कि यह बालक जादूगर कैसे बना, ''मनुष्यों की भीड़ से जाड़े की सन्ध्या भी वहाँ गर्म हो रही थी। हम दोनों शरबत पीकर निशाना लगाने चले। राह में ही उससे पूछा-‘‘तुम्हारे और कौन हैं?’’ खिला-पिला कर पहले जयशंकर प्रसाद उसका विशवास जीतते हैं, इसके बाद अपनी इस जिज्ञासा को शांत करते हैं कि यह लड़का यहाँ अकेले क्यों आया है? उसे शांत करने में वे सफल हो जाते हैं. वे उससे पूछते हैं कि – ‘‘माँ और बाबूजी.’’,‘‘उन्होंने तुमको यहाँ आने के लिए मना नहीं किया?’’,‘‘बाबूजी जेल में है.’’,‘‘क्यों?’’,‘‘देश के लिए।’’-वह गर्व से बोला.,‘‘और तुम्हारी माँ?’’,‘‘वह बीमार है.’’,‘‘और तुम तमाशा देख रहे हो?’’ उसके मुँह पर तिरस्कार की हँसी फूट पड़ी. उसने कहा-‘‘तमाशा देखने नहीं, दिखाने निकला हूँ। कुछ पैसे ले जाऊँगा, तो माँ को पथ्य दूँगा। मुझे शरबत न पिलाकर आपने मेरा खेल देखकर मुझे कुछ दे दिया होता, तो मुझे अधिक प्रसन्नता होती।’’
कहानी अपने छोटे से कलेवर में बहुत सारे प्रश्नों को एक साथ लेकर चलती नज़र आती है। कहानी के केन्द्र में बालक है लेकिन लेखक का उद्देश्य उससे बहुत ऊपर दिखाई पड़ता है। यहाँ जाति, धर्म से ऊपर देश को दिखाया गया है। इस संवाद के माध्यम से सारी बात खुलकर सामने आ जाती है।
मैंने पूछा-‘‘कौन?’’,‘‘मैं हूँ छोटा जादूगर।’’और अंतत: उस छोटा जादूगर को इस विश्व का सबसे बड़ा जादूगर अपना जादू दिखा देता है। उसके जादू से उसकी माँ की साँसे थम सी जाती हैं। माँ और पुत्र की ममता का वह नज़ारा बहुत दर्दनाक था। पर बड़े लोग इस हकीकत को जानते हैं कि बड़ा जादूगर पूरे जीवन अपना जादू दिखाते हुए, उस पात्र का अंत भी कर देता है।
कहानी देशभक्ति, बालमन, पारिवारिक स्थिति, माता-पिता सेवा, आर्थिक कमजोरी और राष्ट्र की स्थिति को दिखाती नज़र आती है। कहानी में जयशंकर प्रसाद ने एक निराश्रित बालक के बालमन को पढने में सफलता प्राप्त की है। कहानी को पढ़ते हुए या तो हम अपने बचपन में खो जाते हैं, या अपने आस-पास में खेलते हुए बच्चों के वातावरण में। यही प्रसाद की सफलता का मापदंड है। कहानी के छोटे-छोटे संवाद कौतुहल पैदा करते हैं और पाठक के सामने रोचक ढंग से उजागर हो जाते हैं।

विरामचिह्न


विरामचिह्न कहानी भारतीय गाँवों में फैले जातिवाद को दिखाती है। लेखक ने कहानी में बड़े ही मर्मस्पर्शी तरीके से इसमें जातिवाद, ऊँच-नीच, वृद्ध समस्या, ग्रामीण जीवन, रीति-रिवाज, मंदिर में अछूतों के प्रवेश पर रोक आदि कितनी ही समस्याओं को एक साथ उजागर किया है। कहानी अपने छोटे से कलेवर में बंधी हुई है। मंदिर के बाहर एक गरीब अछूत बुढ़िया फल बेच रही होती है लेकिन कोई उसके फल नहीं खरीदता है। तीन दिन से न तो उसके फल बिके है और न ही तीन दिन से उसने कुछ खाया है वह अपने सड़े से एक केले को उठाती है और मंदिर के बाहर से ही भगवान की ओर उसे अर्पण करके खा लेती है, क्योंकि निम्न जाति को मंदिर में प्रवेश नहीं दिया जाता था।
बुढ़िया का बेटा राधे जवान है और तेज स्वभाव का है, वह माँ से कहता है सभी घर चले गए तू यहाँ क्यों बैठी है। जब खाने को ही नहीं है तो देवता का क्या करना। बुढ़िया जैसे ही घर पहुँचती है तो वहाँ मंदिर का पुजारी, महंत जी के जमादार कुंज ने बुढ़िया को आवाज लगाई और बताया कि कल तेरा बेटा कुछ अछूतों को लेकर मंदिर में प्रवेश करना चाहता है, उसे समझा देना वह ऐसा ना करे वरना परिणाम अच्छा न होगा। यह कहकर वह चला गया। बुँढ़िया ने राधे को समझाया की वह ऐसा ना करे लेकिन राधे मानने वाला नहीं था। अगले दिन मंदिर के बाहर ऊँच वर्ग के लोग और निम्न जाति के लोग जो राधे के साथ आए थे आमने-सामने हो गये। राधे जैसे ही मंदिर में जाने के लिए आगे बढ़ा किसी ने राधे के सिर पर करारी चोट दी। राधे वहीं गिर पड़ा बाकि लोग भाग गये। पुलिसा आयी लेकिन कुछ नहीं हुआ। बुढ़िया यह सब देख रही थी। राधे का शव देहलीज के समीप रख दिया गया। बुढ़िया ने देहलीज पर सिर झुकाया पर वह सिर उठा न सकी। मंदिर में घुसनेवाले अछूतों के आगे बुढ़िया विरामचिह्न सी पड़ी थी।
 महात्मा गांधी जी ने अछूतोद्धार आंदोलन चलाया था और उन्हें हरिजन कहा। इससे उनमें आत्मसम्मान की भावना जाग उठी। उन्होंने समझ लिया कि मंदिर में प्रवेश कर भगवान की मूर्ति के दर्शन करना उनका अधिकार है। इसी विषय को लेकर प्रसाद जी ने शायद इस कहानी की रचना कर दी थी। कहानी में दलित विमर्श, जातिगत भेद भाव, आस्था और विश्वास, वृद्ध समस्या, ऊँच-नीच का भेद भाव आदि कितने ही विषयों पर प्रकाश डाला गया है।



स्वाभिमान


प्रसाद कहानी कला में मँजे हुए कलाकार कहे जा सकते हैं। उन्होंने हर एक विषय पर अपने लेखनी चलाई और समाज को जागृत किया। स्वाभिमान कहानी वृद्ध समस्या, स्त्री विमर्श, आत्मसम्मान, गरीबी, ग्रामीण रहन-सहन आदि कितने ही विषय एक साथ लेकर हमारे सामने आती है। कहानी में बुढ़िया के साथ उसकी बेटी भी दिखाई गई है, जो काम करती है लेकिन बुढ़िया को यह पसंद नहीं है कि बेटी की कमाई खाऊँ। वह जिस किसी से भी मिलती काम के लिए कहती। बाबू रामनाथ ने बुढ़िया को दुकान पर काम के लिए रख लिया। बुढिया झाड़ू लगाती और बिखरे सामान को ठीक जगह पर रखती, लाल मिरच फटकनी पड़ती आदि काम करती। कुछ समय तो ऐसे ही बिता लेकिन जैसे-जैसे समय बिता उसका शरीर अब जवाब देने लगा। बाबू रामनाथ ने उसे पेंशन देने की कही और घर पर रहने की सलाह दी। यह सब सुनकर बुढ़िया के स्वाभिमान को ठेस लगी और पेंशन लेने से पहले ही अक्षयलोक को पहुँच गयी। बाबू रामनाथ ने पेंशन का पैसा उसके दाह-कर्म में लगा दिया।

कहानी वृद्ध समस्या, स्त्री विमर्श, स्वाभिमानी जीवन, गरीबी का चित्रण, सामाजिक सरोकार, रीति-रिवाज और परंपरा आदि कितने ही विषयों पर प्रकाश डालती है।

जीने का मंत्र − 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' कहानी संग्रह



जीने का मंत्र 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' कहानी संग्रह
अमेरिका की भव्य और पावन धरती पर लगभग 25 वर्षों से रह रहीं, भारतीय मेधा और राष्ट्रीय चेतना की संवाहिका श्रीमती नीलू गुप्ता जी किसी परिचय की मोहताज नहीं हैं। प्रवासी साहित्यकार जिस प्रकार का लेखन कर रहे हैं, निश्चित रूप से सराहनीय हैं। आज के दौर में स्त्री-विमर्श, दलित-विमर्श, किन्नर-विमर्श, अल्पसंख्यक-विमर्श आदि विषयों से भरी चेतना साहित्य में देखने को मिलती है। ऐसे समय में जहाँ तनाव, बिखराव, अलगाव, एकाकीपन, पर-पुरूष संबंध आदि की चर्चा हो रही हो, तब एक संजीवनी की तरह जुड़ने-जोड़ने, नकारात्मकता में सकारात्मक की दृष्टि दे, ऐसी साहित्यकार, ऐसी लेखिका बहुत समय के उपरान्त देखने को मिली हैं। प्रेमचंद के आदर्शोन्मुखी यथार्थवाद की दृष्टि उनके कहानी संग्रह 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' में देखने को मिलती है।
      उनकी कहानी संग्रह का नाम 'सर्वे भवन्तु सुखिनः' भारतीय संस्कृति की आत्मा है। वह परिवार को विशाल रूप में अर्थात् वसुधैव कुटुम्बकम् के रूप में देखती हैं। यही कारण है कि वह 'जियो और जीने दो', 'सबका साथ सबका विकास' के मंत्र को धारण किए हुए, दिन-रात कार्य करते हुए नज़र आती हैं। उनकी हर कहानी में मानवता का पाठ सिखाती-समझाती, आगे-बढ़ने और चैन से जीवन जीने को प्रेरित करती लेखिका अप्रत्यक्ष रूप से झाँकती नज़र आयेंगी। उनकी कहानियाँ मात्र आदर्शवाद से प्रेरित नहीं हैं। अमेरिका के नियम-कायदे और लेखिका की मददगार की भूमिका का पुट देखने को मिलता है। वे असामान्य स्थिति में धैर्य के साथ समाधान ढूँढती-बताती नज़र आती हैं। यथार्थ की घटनाएँ तभी सकारात्मक रूप में जोड़ने-मिलने में परिवर्तित हो जाती हैं। वास्तव में यही जीवन का मूल-मंत्र है, गीता का सार है, पुराणों का आधार है। जिसे भौतिकवादी युग में हम भूलते जा रहे हैं और अपना जीवन असंतुलित, अशांत, मशीन सा बना रहे हैं। विश्वास की जगह अविश्वास, प्रेम की जगह घृणा, नफ़रत, रागद्वेष को अपना रहे हैं, फिर अकेले होने का विलाप कर रहे हैं।
      'सर्वे भवन्तु सुखिनः' इस संग्रह की पहली कहानी है। नीना और रीता की मित्रता को दर्शाती, यह कहानी यथार्थ से जुड़ी है। हिंदी समिति की गोष्ठी की दोनों सदस्या एक दूसरे की मदद करती नज़र आती हैं। एक वर्ष पूर्व ही पति के देहांत के उपरांत, बेटी के पति के देहान्त से दुखी रीता नीना को बड़ी बहन सी समझती है। वह बेटी के पास रहने लगती है, एक वर्ष बाद अपनी बेटी को अपने पास बुला लेती है। इस प्रकार रीता को अपनी मित्र-मंडली और राखी को माँ का साथ मिल जाता है। दोनों  खुशहाल जीवन जीते हुए, अपने अपने कर्म में प्रवृत्त थे, तभी दीवाली के दिन लकड़ी के मकान में आग लग जाने के कारण घर और सामान जल कर राख हो जाता है। रीता भी जल जाती है। मित्रों द्वारा की गयी, तुरंत कार्यवाही से रीता को कपड़े, मकान किराए पर रहने और एक साल में नए मकान बनाने का कार्यक्रम इंश्योरेंस कंपनी ने कर दिया। रीता भी ठीक हो जाती है। दूसरों का भला करने वाले कभी दुखी नहीं होते। 'जिंदगी ज़िदादिली का नाम है। जिंदगी जीना तो कोई रीता से सीखे।' (पृष्ठ-29)  हर समस्या में समाधान खोजने वाले ही सफल व्यक्ति कहलाते हैं।
      'पराधीन सुख सपनेहु नाहीं' लेखिका की मित्र सुधा के जीवन को दर्शाती, यह कहानी पुत्र-बहू के आर्थिक उन्नति के साथ बदलते व्यवहार को दर्शाती है। पुत्र-बहू के ताने-बाने से व्यथित सुधा अपने दूसरे बेटे के पास भारत आने का सोचती है। लेखिका की सूझ-बूझ से उसे सीनियर होने के कारण काउंटी से कम दामों पर मकान मिल जाता है और वह आराम से रहने लगती है। लेखिका यह बताना चाहती है कि यदि आप अमेरिका के कायदे कानून भली भाँति जानते हैं, तो आपको पराधीन रहने की जरूरत नहीं। यथार्थ घटना पर आधारित 'अमेरिका में नाइन वन वन' कहानी बच्चों के ऊपर किसी भी प्रकार के दबाव और मारने के कानून को दर्शाती है। अमेरिका की स्वतंत्र, उदारवादी सोच के कारण बच्चों तक को मुक्त वातावरण दिया जाता है। मालती और नरेश अपने पोते को पढ़ने, शरारत न करने से रोकते हैं। पोता नरेश के थप्पड़ मार देने से किस प्रकार नाइन वन वन नम्बर मिला कर पुलिस को बुला लेता है। भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति की टकराहट को दिखाकर पाश्चात्य देश में उनके नियमों से चलने की सीख, यह कहानी देती है।
      'माँ का त्याग' कमल और भीम पत्नी-पति के रिश्ते में सासु माता रमा पर तानें-बानों का कहर बरसाती, कमल हर बात में तुम्हारी माँ को यह नहीं आता, वह नहीं आता। अपनी माँ की तारीफ करती हुई कमला रमा को घर छोड़ने पर मजबूर कर देती है। माँ अपने बेटे को अपने कारण जलील होता देखकर दुखी होती है, तभी उसकी सहेली अचला उसी तरह सताई गई औरत, उसे फ्लोरिडा के  'शांतिनिकेतन' संस्था में ले जाती है। माँ इसलिए खुश थी कि अब उसका बेटा खुश है। रमा का बेटा भीम जब भी वहाँ आता, अपनी माँ को देखकर खुश होता, उसकी दैनिक चर्या कितनी अच्छी है। माँ कहती है- 'आपस में तुम दोनों खुश रहना, तुम्हारी खुशी में तुम्हारी माँ भी खुश है, मेरी बिलकुल चिंता मत करना।' (पृष्ठ-47) नकारात्मक, तनावग्रस्त जीवन में समाधान ढूँढकर जीवन जीना ही जीवन है।
      'बहू बेटी से बढ़कर' कहानी मधु और रागिनी के सास-बहू के संबंधों को दर्शाती है। रागिनी अपनी सास को अपनी माँ से बढ़कर मानती है। मधु भी अपनी बहू को बेटी से बढ़कर मानती है। समाज में क्या हो रहा है, कौन दुर्व्यवहार कर रहा है। इसे छोड़ सद्भावना से संबंधों को चलाने की सीख यह कहानी देती है। रागिनी 'छज्जू के चौबारे' पर मधु के जन्मदिन पर कहती है- 'मम्मी के अनुसार बेटी हमें जितनी प्यारी होती है, बहू हमें उससे भी अधिक प्यारी होनी चाहिए। बहू हमारे घर की शान और मर्यादा है। बहू और सास का रिश्ता, माँ बेटी से बढ़कर होता है।' (पृष्ठ-53) मधु भी कहती है- ''मुझे तुम्हारी जैसी बेटी पर गर्व है।....आप अपनी आँखो का नूर अपनी आँखों में बसाकर रखें, बहू ही आपकी असली बेटी है और आपके वृद्धावस्था की लाठी है।'' (पृष्ठ-54)
'सूझबूझ' कहानी में आशा और दीपक का खुशहाल परिवार बेटे समीर की सहेली नीलम की बेटी ऋचा से विवाह होना। बेटे-बहू का दूरी के अन्तराल के कारण अलग रहना। आशा को व्यथित करता है। सामाजिक संस्थाओं में कार्य करने पर भी अकेलेपन की पीड़ा उसे दुखी कर देती है। उसके जन्म दिन पर बेटे-बहू की तरफ से डॉगी को उपहार में देना, जादू की पुड़िया का काम कर जाता है। अमेरिका, यूरोप में अकेलेपन की यही जादुई पुड़िया जीवन दान देती है। परिवार में खुशियाँ लौट आती हैं।
'पराये भी अपने' कहानी में खुशहाल मालती और दीपक की आप बीती है। बेटे विपुल को डॉक्टर बनाया और डॉक्टर लड़की से विवाह भी करवाया। शादी के दो महीने बाद ही विपुल अपनी पत्नी के साथ स्टैनफर्ड अस्पताल के फ्लैट में रहना चाहता है। पोती तन्वी की देखरेख सासू माता की बजाए नैनी से बहू करवाती है। बहुत कम मिलने जाती है। आशा के पड़ोस में आए नए दम्पति नीना और अशोक की बेटी अनिशा को दादी-बाबा और उन दोनों को माँ-बाप मिल गए। अनिशा के जन्म दिन पर चारू और विपुल भी आते हैं। नीना कहती है-'आपको ऐसे दम्पति से मिलाना चाहती हूँ, जो हमारे माता-पिता से भी बढ़कर हैं। हमारी अनिशा की देखभाल जी जान से करते हैं।' (पृष्ठ-68) नीना के रोने पर चारू और विपुल का हृदय परिवर्तन हो जाता है, पूरा परिवार मिल जाता है।
'राधा का स्वाभिमान' कहानी राधा और महेश के संबंधों को दर्शाती है। महेश का संबंध राधा की सहेली अरूणा से हो जाता है। राधा को महेश स्वयं बता देता है कि अब वह अरूणा के साथ रहेगा। उसी समय से राधा अपनी बेटी रीमी के साथ एक नौकरी की तैयारी करती है और अच्छे पद पर पहुँच जाती है। समाचारपत्र में महेश की मृत्यु की घटना सुनकर वह रोती नहीं। 'अरे राधा! तुम्हारे लिए तो महेश उसी दिन मर गया था, जिस दिन उसने तुम्हारे साथ विश्वासघात किया था।'(पृष्ठ-76) आज की सजग नारी का स्वाभिमान इस कहानी में दिखाई पड़ता है। 'तमन्ना' कहानी में तमन्ना और मीता दो सहेलियों के माध्यम से एकाकी जीवन जीने वाले स्त्री-पुरूष को जोड़ने का कार्य किया गया है। तमन्ना के पिता राजीव पत्नी की मृत्यु के उपरान्त अकेले बेटी के साथ रह रहे थे। उधर मीता की माता नलिनी पति की मृत्यु के बाद भारत में अकेली रहकर बेटी को पाल रही थी। मीता की माँ जब तमन्ना के घर पहुँचती है,  तो राजीव उसे देखकर हैरान हो जाता है। वह उससे शादी करना चाहता था, लेकिन जातिगत कारणों से विवाह नहीं हो सका। दोनों अपूर्ण लोगों को मिलाकर संपूर्ण करने का कार्य उनकी पुत्रियाँ करती हैं, 'थोड़ी सी सूझबूझ से दो अधूरे परिवार एक हो गए।'(पृष्ठ-85)
'जायें तो जायें कहाँ' कहानी में शान्ता और मोहन जैसे लोगों के दर्द को बयाँ किया है, जो अपना सब कुछ बलिदान करके अपनी संतानोँ को आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करते हैं। रोहन अमेरिका में पढ़ने जाता है और वहाँ अच्छी नौकरी पाकर अपने माता-पिता को अपने पास बुलाता है। रोहन अमेरिका में ही शादी और एक पुत्र के होने की सूचना, माता-पिता को मिलने पर देता है। बच्चों के लिए घर बेचकर जाना और उनसे मिली उपेक्षा के यथार्थ को यह कहानी दर्शाती है। बहू और बेटे की उपेक्षा से तंग आकर शांता और मोहन को नए तरीके से जीवन यापन भारत में आकर करना पड़ता है। लिफाफे में रखे डॉलरों की मोटी रकम माता-पिता के ऋण को चुकाने का भाव है। वापस पत्र लिखकर वे कहते हैं 'निस्वार्थ प्यार तो प्यार माँगता है, धन नहीं। हम अपनी खुशी से तुम्हारा दिया हुआ यह पैसा अपने पोते अंशुल के लिए दादा-दादी की ओर से उपहार स्वरूप भेज रहे हैं।'(पृष्ठ-96) यह पत्र पढ़कर रोहन को अपनी भूल का एहसास हुआ और वह माता-पिता की पचासवीं शादी की साल गिरह पर भारत आकर उनके नए मकान के कागजात उन्हें सौंपता है और माता-पिता के गले लगा। पति-पत्नी और पोते का जीवन खिल उठा।
'स्वतंत्र वातावरण में घुटन' यह कहानी युवाओं में मादक पदार्थों के बढ़ते प्रयोग से हुई बर्बादी को दर्शाती है। सुजाता का पुत्र अपनी पत्नी और स्वयं को गोली मार देता है। मादक पदार्थों का सेवन, खुली छूट का परिणाम यह कहानी दर्शाती है। 'स्वप्न हुए साकार' दो सहेलियों के प्रेम और दाम्पत्य जीवन की सुखद घटनाओं की यथार्थ कहानी है। 'प्यार का बदलता रंग' कहानी आभा और गिरीश के बदलते प्यार को दर्शाती है। प्रेम-विवाह करने वाले गिरीश का मन अमेरिका में किस प्रकार भ्रमित होता है। आभा अकेली 'मैत्रेयी' एक नान प्रॉफिट संस्था से जुड़कर अपना केस लड़ती है और ग्रीन कार्ड बनवाती है 'जब तक उसे काम नहीं मिलेगा, गिरीश कोर्ट के फैसले के अनुसार उसका पूरा रहने का, खाने का खर्चा देगा।'(पृष्ठ-119) इस प्रकार उसका जीवन सुखमय बन जाता है। 'अनोखा उपहार' कहानी अपने-अपने माता-पिता के साथ-साथ दूसरे के माता-पिता का सम्मान करने से दाम्पत्य जीवन कैसे सुखद होता है, यह दर्शाती है। अनिशा के जन्मदिन पर पराग द्वारा दी गई पार्टी में अनिशा अपने सास-ससुर को अपने माता-पिता से बढ़कर बताती है, केक काटते समय उपहार स्वरूप अनिशा के माता-पिता को वहाँ बुलाकर पराग एक अच्छे पति की भूमिका अदा करता है।
इन सभी कहानियों को आधार बनाकर देखा जाए, तो श्रीमती नीलू गुप्ता जी की कहानियाँ देशकाल की सीमाओँ से परे, जाति-धर्म के बंधनों से मुक्त, राजनीतिक गलियारो से अलग, केवल मनसा, वाचा, कर्मणा की भावना से ग्रस्त विश्व बंधुत्व की भावना को संजोए हुए हैं। उनकी सामाजिक सेवा-साधना की परछाई, उनके साहित्य में स्पष्ट दिखलाई पड़ती है। संवेदना की दृष्टि से कहानियों की सीख मात्र उपदेशात्मक न होकर, कहानी के घटनाक्रम में सही बैठती है। विदेशी कलेवर में भारतीयता कूट-कूट कर भरी हुई है। कहानी का मूल तत्व जिज्ञासा पाठक को अंत तक बाँधे रखता है। पात्रों की सीमा कहानी को बिखरने नहीं देती है। भाषा की दृष्टि से कहानियाँ सहज, सरल, सरस हैं, मुहावरों का प्रयोग भी यदा-कदा देखने को मिलता है। पाश्चात्य परिवेश को दर्शाती और भारतीय संस्कृति का बोध कराती, ये कहानियाँ छात्रों को पाठ्यक्रम में पढ़ानी चाहिएँ। समस्या से समाधान की ओर, अंधेरे में उजाले की किरण और सत्यम् शिवम् सुन्दरम् के बोध से रची, यह रचना निश्चित रूप से हिंदी साहित्य की अमूल्य निधि होगी। ऐसी रचनाएँ मानव-मूल्यों की रक्षा करती हैं और नकारात्मक, तनावग्रस्त, एकाकीपन में जीवन जीने की कला सिखाती हैं।

डॉ. सुधांशु कुमार शुक्ला
आई.सी.सी.आर.
चेयर हिंदी,
वार्सा यूनिवर्सिटी,
वार्सा पोलैंड
+48579125129

टूटते रिश्ते मरते शब्द


शनिवार, 18 मई 2019

मन्नू भंडारी की कहानियों की समीक्षा


                                     त्रिशंकु

त्रिशंकु कहानी में माँ और बेटी के संबंधो, शिक्षा, प्रेम, उदारता, कठोरता, नई-पुरानी सोच, बदलते मानव मूल्यों, रिश्तों की समझ, पारिवारिक जिम्मेदारी, स्त्री विमर्श और अंतःद्वंद्व की कहानी है। कहानी में बेटी (तनु) अपने पड़ोस में रहने आये लड़के शेखर से प्रेम की कहानी है। माँ पहले तो तनु के द्वारा ही शेखर को घर पर चाय के लिए स्वयं बुलवाती है। पुरानी रूढियों को तोड़ती नज़र आती है। लेकिन जब तनु और शेखर दोनों करीब आने लगते हैं, तो माँ उनके रिश्ते को स्वीकरा नहीं करना चाहती है और कहती है- 'बड़े हो जाओ तो प्रेम भी करना और शादी भी। मैं तो वैसे भी तुम्हारे लिए लड़का ढूँढने वाली नहीं हूँ।' कहानी के अंत में तनु कहती है- 'इन ममी से लड़ा भी कैसे जाए, जो एक पल नाना होकर जीती है तो एक पल ममी होकर।'
कहानी अपने व्यापक कलेवर में संबंधो की दुनिया को दिखाती है। स्त्री विमर्श या ये कहें कि स्त्री के कई रूपों का लेखिका ने वर्णन किया है- माँ, बेटी, पत्नी, गृहणी, प्रेमिक, आदर्श पड़ोसी आदि का। प्रमुख दो पात्रो यानि माँ और बेटी के माध्यम से स्त्री चित्रण किया गया है। कहानी को प्रेम कहानी, माँ-बेटी के रिश्ते की कहानी, मध्यवर्गीय समाज की कहानी आदि कहा जा सकता है। कहानी ने सभी बिंदुओं को छुआ है, मूल रूप से कहानी दो पीढियों के बीच समाज के द्वंद्व को प्रकट करती है।
मैं हार गई

       मैं हार गई कहानी लेखिका के विचारों का द्वंद्व है। यह बिना नायक-नायिका के सीधे विचारात्मक पहलु को लेकर लिखी गई है। इसे कहानी कहना या विबंध कहना विचारकों की सोच और अभिव्यक्ति का तरीका है। इसमें लेखिका अपनी कलम से दो नायकों के चरित्र को खड़ा करती है और उसमें रंग भरती है। पहले प्रकार के चरित्र में वह निर्धन वर्ग के नायक को खड़ा करना चाहती है। जो राष्ट्र में क्रान्ति ला सके और राजनीति में परिवर्तन ला सके। जनता की सभी बातों को ठीक से समझ सके और उसे पूरा करने का प्रयास करे। लेकिन वह नायक अपने ही घर की व्यवस्था में फंसकर रह जाता है, तो राष्ट्र को क्या चलायेगा। इसी बात को लेखिका ने उकेरा है और कहती है- 'जानते हो, मैं तुम्हारी स्रष्ठा हूँ, तुम्हारी विधाता।' लेकिन नायक पर उसका कोई प्रभाव नहीं पड़ता और वह बीमार बहन का इलाज कराने के लिए शहर गया, लोगों से कर्ज माँगा, मिन्नते की, अंत मं चोरी करने लगा। यही नायक का अंत भी है।
       दूसरे पक्ष में लेखिका ऐसे नायक को खड़ा करती है जो उच्च घरे का समृद्ध समुदाय का, सर्व सुविधा भोगी, धनवान वर्ग में पला-बड़ा। लेकिन वह भी आदर्शों पर खरा नहीं तरा उसके अंदर शराब, जुआ, औरतखोर, वेश्यागामी न जाने कितने ही अवगुण निकल आए। उसे भी लेखिका कहती है-'जानते हो, मैं तुम्हारी स्रष्ठा हूँ, तुम्हारी विधाता।' लेकिन नायक पर कोई फर्क नहीं पड़ता है। नायक कहता है- 'यह उम्र दुनिया की रंगीनी और घर की अमीरी! बिना लुत्फ उठाए यों ही जवानी क्यों बर्बाद की जाए

       अंत में लेखिका लिखती है- 'मैं हार गई, बुरी तरह हार गई।' कहानी अपने छोटे से कलेवर में देश की भ्रष्ट राजनीति, भ्रष्टाचार,  बेरोजगारी, गरीबी, स्वास्थ्य आदि सभी मुद्दों पर एक साथ व्यंग्य करती चलती है। कहानी में निम्न और उच्च वर्ग के मानव मूल्यों को लेखिका ने दो नायकों के माध्यम से हमारे सामने रखा है। वहीं नवीन और प्राचीन मूल्यों के बीच की टकराहट को भी दिखाया गया है। लेखिका परिवर्तन चाहती है, लेकिन समाज का कोई भी वर्ग बदलाव तो चाहता है पर अपनी कुर्बानी नहीं देना चाहता। यह कहानी वहीं उलझ कर रह जाती है।

मजबूरी

मजबूरी पारिवारीक कहानी है, जिसमें माँ, बेटा, सास, बहू, पोता आदि के अंदर की कसमकस है। कहानी के केन्द्र में बेटू नाम का पात्र रहता है, जो अपनी दादी के पास रहता है। गाँव में अकेली रह रही माँ का इकलौता बेटा रामेश्वर अपनी पत्नी रमा और दो बेटों ( जिसमें बड़े का नाम बेटू है) के साथ मुंबई शहर में नौकरी करता है और वहीं पर रहता है। लेकिन वह कभी-कभी माँ से मिलने अपने गाँव आ जाता है। माँ अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए अपने बड़े पोते बेटू को अपने पास रखना चाहती है, आखिरकार रमा और रामेश्वर बेटू को गाँव में माँ के पास छोड़ भी देते हैं पर परिणाम इसके विरूद्ध होता है। बेटू गाँव के आवारा बच्चे के साथ खेलता है, पढ़ने-लिखने में उसका मन नहीं लगता है, वह हर समय घर से बाहर रहता है। वह पढ़ने की बजाए खेलता रहता है। वह अब सामान्य से परे दिखाई देता है। दो वर्ष बाद रमा ने बेटू को देखा तो वह बेटू को वापस अपने साथ ले जाने का निर्णय लेती है और ले भी जाती है।
कहानी अपने छोटे से कलेवर में पलायनवाद को दिखाती है, कैसे रोजी रोटी कमाने के लिए ग्रामीण लोग शहरों की ओर जा रहे हैं। इससे गाँव तो खाली हो ही रहे हैं, बल्ति शहरों पर भी अत्याधिक मानव बोझ बढ़ रहा है। दूसरा इससे गाँव में अकेले रह रहे बूजुर्गो (वृद्धों) को समस्या आती है। सास बहू जब अलग-अलग रह रही तो उनके बीच तालमेल नहीं बन पता है कहानी का एक पक्ष यह भी है। कहानी में माँ-बेटे के प्यार को दिखाया गया है, जो दो पीढ़ियों के माध्यम से हमारे सामने आता है। कहानी बच्चों के लालन-पालन को भी दिखाती है। कहानी में जीवन मूल्यों को दिखाया गया है। कहानी त्याग, समर्पण और बदलते मानव मूल्यों को दिखाती है।

                                     कमरे कमरा और कमरे

       यह लेखिका की आत्मकथा शैली में लिखी कही कही जा सकती है। इसमें नीलू जो घर पर पूरा काम सँभालती है और उसे व्यवस्थित करती रहती है। घर में पाँच कमरे थे उन सभी का काम वही करती है। नूलू ने एम.ए. प्रथम श्रेणी से पास किया और विश्वविद्यालय में दूसरा स्थान प्राप्त किया। इस का जश्न घर पर ही हुआ। अब पीएच.डी.(शोध) कार्य के लिए तथा नौकरी के लिए दिल्ली आना पड़ा। अब कॉलेज में नौकरी मिली तो उसका जीवन पाँच कमरों की बजाए एक कमरे में सीमित रह गया। पीएच.डी.(शोध) पूरी कर नीलू ने अपने माता-पिता का सपना साकार किया।
       कहानी नारी शिक्षा, उसके पारिवारीक जीवन, स्वतंत्र सोच, आगे बढ़ने की सार्थकता आदि कितने ही छोटे बड़े उद्देश्यों के साथ आगे बढ़ती है। कहानी के केन्द्र में मध्यवर्गीय परिवार की व्यवस्था और उसमें लड़कियों के जीवन पर प्रकाश डालती है। कहानी शोध और उसकी महत्ता को दिखाती है। कहानी पिता-पुत्री के बीच प्रेम, विश्वास, त्याग, समर्पण और सामाजिक सरोकार को उजागर करती दिखाई देती है।

अकेली
अकेली कहानी में एक ऐसी नारी सोमा बुआ का वर्णन है, जिसके पुत्र की मृत्यु के पश्चात उसका पति हरिद्वार में रहने लगता है। साल में केवल एक महीने वह घर आता है। बुआ अकेली रहती है और पड़ोस के लोगों के सहारे अपना जीवन यापन करती है। जबकि उसके पति को उनका किसी के घर आना-जाना पसंद नहीं है।
कहानी में भारतीय समाज के पड़ोस क्लचर तथा उसकी व्यवस्था को दिखाया गाय है। बुआ आस-पड़ोस में सभी के घऱ शादी में, जन्मदिन आदि कार्यक्रमों में जाती है और लोग उसका आदर सत्कार भी करते हैं। कहानी रिश्ते नातों और हमारे समाज में जीवन की व्यवस्था को उजागर भी करते हैं। लेकिन व्यवस्था इससे अलग भी है अपने ही लोग बुआ को नहीं बुलाते हैं जबकि वह पूरी व्यवस्था के साथ सामान सजाये रखती है। पैसा घर पर न होने के बावजूद वह अपने गहनों को बेचकर रिश्ते निभाने का काम करती है लेकिन अपने ही रिश्तेदार उसे नहीं निभा पाते हैं।
कहानी टूटते मानव-मूल्यों, वृद्ध समस्या, स्त्री विमर्श, सामाजिक व्यवस्था, वृद्ध स्नेह, पड़ोस क्लचर आदि कितने ही बिन्दुओं को अपने में समेटे हुए है।

सोमा बुआ बुढ़िया परित्यक्ता और अकेली है। बुढ़िया सोमा बुआ पिछले बीस वर्षों से अकेली रहती हैं। उनका इकलौता जवान बेटा हरखु समय से पहले ही चल बसा। उनके पति पुत्र वियोग का सदमा सह न सके तथा घर छोड़ कर तीर्थवासी हो गये। सोमा बुआ के सन्यासी पति साल में एक महीना घर आते हैं। बुआ को अपना जीवन पड़ोस वालों के भरोसे ही काटना पड़ता है। दूसरों के घर के सुख-दुख के सभी कार्यक्रमों में वह दम टूटने तक यों काम करती हैं, मानो वह अपने ही घर में काम कर रही हो। जब बुआ के पति घर पर होते हैं तब बुआ का अन्य घरों में सक्रिय बना रहना बंद हो जाता है। तब उनकी जीभ ही सक्रिय हो उठती है। पड़ोसन राधा के समक्ष बुआ मन का गुबार निकालती है राधा के यह पूछने पर कि सन्यासी महाराज क्यों बिगड़ पड़े? बुआ बोल पड़ती है कि उनका औरों के घर आना जाना उनके पति को नहीं सुहाता। पति का स्नेहहीन व्यवहार तथा बुआ के पास पड़ोस से बिन बुलाये निभाए जाने वाले व्यवहारों पर पति द्वारा लगाया जाने वाला अंकुश उन्हें कष्ट देता है। पति से होने वाली कहा सुनी पर बुआ रोने लगती है। वे राधा से कहती हैं कि, “ये तो हरिद्वार रहते हैं, मुझे तो सबसे निभानी पड़ती है। मेरा अपना हरखू होता और उसके घर काम होता तो क्या मैं बुलावे के भरोसे बैठी रहती। मेरे लिए जैसा हरखू वैसा किशोरीलाल। आज हरखू नहीं है इसी से दूसरे को देख देखकर मन भरमाती रहती हूं।दरअसल सोमा बुआ अपने अकेलेपन को दूर करने के लिए सबसे जुड़ना चाहती है इसलिए बिन बुलाये ही सबके घर जाकर काम में जुट जाती हैं। जैसे- अमरक के बिखरे हुए कल रह-रहकर धूप में चमक जाते हैं ठीक वैसे ही जैसे किसी को भी गली में घुसता देख बुआ का चेहरा चमक उठता है। मन के बहलने प्रसंगों को वह तलाश थी रहती है। कहीं थोड़ी देर के लिए दिल बहल जाता है तो कहीं फिर से गहरी चोट मिल जाती है।


जिन दिनों उनके पति आये हुए होते है उसी समय सोमा बुआ के दूर के रिश्ते में किसी का ब्याह पड़ जाता है। बुआ की आदत को जानते हुए उनके पति साफ निर्देश देते हैं कि जब तक उनके घर से न्योता न आये सोम बुआ वहाँ नहीं जाएँगी। उनकी विधवा ननद उनके जख्मों पर नमक छिड़कते हुए झूठ ही कहती है कि निमंत्रण की लिस्ट में बुआ का भी नाम है बुआ न्योते का इंतजार करती है साथ ही मन में न्योते की प्रसन्नता लिए ब्याह में भेंट देने के जुगाड़ में भी लग जाती है वे लोग पैसे वाले हैं साथ ही दूर के रिश्तेदार भी। यूँ तो सामाजिक बंधन बनाना मर्दों का काम है, किन्तु सोमाबुआ मर्द वाली होकर भी बेमर्द की है इसलिए व्याह में भेट देने के लिए अपने मरे हुए बेटे की एकमात्र निशानी सोने की अँगूठीबेचवाकर पड़ोसन राधा से चांदी की सिंदूरदानी तथा साड़ी- ब्लाउज का इंतजाम करवाती हैं। अपने हाथों में लाल-हरी चूड़ियां पहन कर पहन कर जाने वाली साड़ी को पीले रंग मांड कर बुआ पाँच बजे के मुहूर्त के निमंत्रण का इंतजार करने लगती है। सात बज जाते हैं किन्तु निमत्रण न आने पर वह दु:खी हो जाती है। इतनी तैयारियों के साथ पल पल निमंत्रण के इंतजार के बाद बुआ को विश्वास ही नहीं होता कि सात कैसे बज सकते है जबकि मुहूर्त पांच बजे का था।सोम बुआ को व्याह का बुलावा नहीं आया था। ऐसे ही उन्हें किसी के घर से बुलावा नहीं आता फिर भी बुआ बन बुलाये ही चली जाती।
सयानी बुआ

सयानी बुआ अपने छोटे से कलेवर में गृहणी की अनुशासन प्रियता और घर में चीजों को व्यवस्थित रूप से रखने तथा उनके सदुपयोग को लेकर लिखी गई कहानी है। कहानी में बुआ रिश्तों से ज्यादा चीजों को तवज्जो देती हैं और उसके इस बरताव के कारण घर में तनाब का माहौल बना रहता है।
       बुआ की बेटी अन्नू बीमार है, जिसे ठीक होने के लिए डॉक्टर के अनुसार पहाडो पर रहना होगा। वहाँ रहने की सभी हिदायतें दी गई, लेकिन एक दिन बुआ के पास पत्र आता है कि तुम्हारे द्वारा दिए गए 50रू वारे से के दो प्याले दूट गए पर अन्नू अच्छी है। कहानी के अंत तक आते-आते बुआ वस्तुओं से अधिक अब रिश्तों से बंधना चाहती है। यही कहानी में दिखाया गया है।
       कहानी में रिश्तों की दुनिया, एक गृहणी की अनुशासन प्रियता, माँ-बेटी के संबंधों का सच तथा एक महिला के बहुत से रूपों को दिखाया गया है। इतना ही नहीं कहानी में आधुनिक परिवारों की व्यवस्था को भी दिखाया गया है। पति के कहानी में गौण पात्र के रूप में दिखाया गया है। कहानी के केंद्र में सयानी बुआ और उसकी बेटी अन्नू ही रहती है।

अलगाव

यह कहानी अपने छोटे से कलेवर में ग्रामीण पृष्ठभूमि को लेकर आगे बढ़ती है। महिला चिंतन से दूर इस कहानी में जातिगत भेदभाव, राजनैतिक भ्रष्टाचार, पुलिस का लापरवाही, ग्रामीण समाज का चित्रण, अनपढ़ गाँव वाले और आपसी लड़ाई-भगड़े को दिखाती नज़र आती है। इतना ही नहीं कहानी में उच्च वर्ग और निम्न वर्ग के बीच का संघर्ष होने के साथ-साथ अधिकार के लिए लड़ता मरता इंसान दिखाया गया है।
       कहानी की शुरूआत  कहानी के नायक बिसेसर की मौत के साथ होती है। कहानी  में बिसेसर को 28 वर्ष का पढ़ा लिखा लड़का दिखाया गया है। जिसकी दो संतान हैं, एक बड़ी बिटिया और एक बेटा (सिधेसर) जो आठवीं कक्षा में पढ़ता है। गाँव में ही स्कूल खोलकर बच्चों को पढ़ाता है। लेकिन इस देश में राजनैतिक भ्रटाचार के चलते दलित और गरीब को पढ़ाना भी एक अपराध हो। जिसके चलते बिसेसर को चार साल की सजा होती है और अब जेल से छूटकर आया तो देखा गाँव के हरिजन टोले की तीन झोपड़ियों में आग लगा दी गई थी। लोग जिंदी ही जल गए थे। क्योंकि सवा महीने बाद मध्यावधि चुनाव थे। हरिजन टोले पर हुए अत्याचार को ही न्याय दिलाने के लिए बिसेसर लड़ाई लड़ रहा था। इसी कारण उसकी हत्या हुई और लोग हत्या के पीछे जोगेसर साहू का नाम बताते हैं। पूरी न्यायिक जाँच होती है। पुलिस आती है, लेकिकन ढाक के वही तीन पात और अंत में बिसेसर की हत्या नहीं जहर खाकर आत्महत्या बता दी गई।
       आलोचना-
       कहानी में बिसेसर 28 वर्ष का दिखाया गया है। बड़ी बिटिया है और लड़का आठवीं में पढ़ता है, माना जाए तो क्या बिसेसर 13 या 14 वर्ष का पिता बन गया था। यह बात ठीक नहीं है, लेखिका इस पक्ष पर ध्यान नहीं दे पाई। इतना ही नहीं स्वतंत्रता के बाद बाल विवाह करना अपराध है और लेखिका इसे जाने-अनजाने उद्घाटित कर रही है। दूसरा कहानी में जोगेसर साहू पर बिसेसर की हत्या करने का शक है, लेकिन कहानी में जोगेसर साहू पर प्रकाश ही नहीं डाला गया है। कहानी की भाषा से राज्य या प्रांत का पता नहीं चलता कि घटना कहाँ की स्थिति को लेकर लिखी गई है।

दो कलाकार

दो कलाकार दो सहेलियों की कहानी है, जो 6 वर्ष तक एक साथ हॉस्टल में रहती हैं। अरूणा (रूनी) और चित्रा की मित्रता हॉस्टल में प्रसिद्ध है। अरूणा का स्वभाव गरीबों की मदद करना, उन्हें पढ़ाना उनके लिए नए-नए विचारों से सोचना दिखाया गया है। वहीं दूसरी ओर चित्रा बड़े घराने की इकलौती बेटी है उसे चित्रकारी करना पसंद है, यही उसका जनून भी है।
हॉस्टल से निकलने से पहले के क्षण को लेखिका ने बड़े ही मार्मिक तरीके से दिखाया है, चित्रा को घर जाना है, हॉस्टल के बाहर खड़ी है। लेकिन चित्रा मरी भिखारिन और उसके शरीर से चिपकर रोते दो बच्चों की तस्वीर बनाती है। इसी तस्वीर से वह देश-विदेश में लोकप्रियता भी प्राप्त करती है। विदेश में रहती है, जब स्वदेश लौटती है तो अरूणा से अपनी चित्र प्रदर्शनी में मिलती है। अरूणा के साथ दो बच्चों को देख हैरान होती है और उससे सभी कुछ जानना चाहती है। अरूणा बताती है और उस भिखारिन के फोटो पर अँगुली रखकर कहती है, ये ही वे दोनों बच्चे हैं। चित्रा के शब्द शायद उसके विचारों में ही खो गए। यही कहानी का अंत है।

कहानी में मित्रता, संवेदनशीलता, मानव सेवा, महत्वाकांक्षा, ऊँचा उठने की होड़, बदलते मानव मूल्य, उच्च वर्ग और निम्न वर्ग का भेद, बदलती सोच को दिखाया गया है। कहानी का सबसे संवेदनशील संवाद- कागज पर इन निर्जीव चित्रों को बनाने की बाजए दो-चार की जिंदगी क्यों नहीं बना देती? तेरे पास सामर्थ्य है, साधन हैं। 

केलॉग



केलॉग
सैमुएल केलॉग का जन्म 06 सितंबर, 1839 में, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के न्यूयार्क के लाँग आइलैण्ड में क्योकू नामक स्थान में एक गिरजा-भवन (परोहिताश्रम) में हुआ। उनके पिता का नाम पादरी सैमुएल तथा माता का नाम मेरी पी हेनरी था। बचपन में शारीरिक रूप से कमजोर होने के कारण उन्हें विद्यालय नहीं भेजा गया और शिक्षा दिक्षा घर पर ही हुई, माँ ही उनकी प्रथम गुरू रही वही उन्हें सिखाती थी। बाद में लॉग आइलैण्ड के विलियम्स कॉलेज से उन्होंने मैट्रिक पास किया और कॉलेज में भरती हो गया।
       कॉलेज में भी स्वास्थ्य बिगड जाने कारण कॉलेज फिर से छोड़ना पड़ा लेकिन वह घर पर अध्ययन करते रहे। दो वर्ष बाद स्वास्थ्य लाभ हो जाने पर उन्होंने प्रिंसटन नामक कॉलेज में प्रवेश लिया और तीन वर्ष के कठिन अध्ययन के बाद उसी कॉलेज से बी.ए. की परीक्षा उच्च श्रेणी में पास की साथ ही कक्षा में प्रथम भी रहे। इसके बाद वे प्रिंसटन सेमिनरी में भर्ती हो गये और वही उन्होंने पादरी की दीक्षा प्राप्त की। सन् 1864 के अमेरिकन प्रेसबिटेरियन मिशन के पादरी अभिषिक्त हुए। उसी वर्ष के मई महीने में मेरी अन्टोनिएट नामक महिला से उनका
विवाह सम्पन्न हुआ। विवाह के बाद केलॉग और उनकी पत्नी दोनों ही भारत आ गये। 1864 के दिसंबर महीने में बोस्टन से एक माल-जहाज पर दोनों ने यात्रा आरंभ की। उनकी गणना के अनुसार करीब तीन महीने में उनका जहाज भारत पहुँचा था। केलॉग ईसाई धर्म के प्रचार के लिए भारत में आए थे। उनका बहुत सा समय प्रयाग में बीता था।
केलॉग की पुस्तक का नाम था ए ग्रामर आफ द हिन्दी लैंग्वेज, इसका पहला संस्करण 1874 में प्रकाशित हुआ था। केलॉग ने अपने प्रथम संस्करण के समय लल्लूलाल के प्रेमसागर के उदाहरण लिए, लेकिन दूसरे संस्करण में राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा प्रस्तुत अभिज्ञान शाकुंतलम् की सहायता ली। केलॉग जिस समय हिन्दी व्याकरण लिख रहे थे, यूरोप के कुछ विद्वान भारत में बोली जानेवाली आर्य-परिवार की भाषाओं का अध्ययन कर चुके थे। केलॉग ने अपने समकालीन तथा पूर्ववर्ती विद्वानों को पढ़ा, जो इस प्रकार हैं-बीम्स, हार्नली, पिनकाट, प्लेट्स और ग्रियर्सन आदि। इतना ही नहीं अपनी पुस्तक हिंदी व्याकरण में इनकी चर्चा भी हुई है। केलॉग के अनुसार- 'परिनिष्ठित हिंदी का टकसालीपन प्रवाह और सामर्थ्य का मूल स्रोत बोलियाँ ही है। बोलियों से संबंध-विच्छेद करके स्तरीय हिंदी जीवन शक्ति से वंचित हो जाएगी।' (हिन्दी व्याकरण, केलॉग, अनुवाद- डॉ. श्रीराम शर्मा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृष्ठ- 10-11)
केलॉग ने अपने व्याकरण में जो जानकारी दी है, उसके आधार पर कहा जा सकता है कि ये बोलियाँ सभी बातों में बहुत साम्य रखती हैं। केलॉग के अनुसार यह भी सत्य है कि हिन्दुओं के घरों में कहीं भी उर्दू का प्रयोग नहीं होता। इतना ही नहीं केलॉग ने तुलसीदास के रामचरित मानस में प्रयुक्त भाषा पर लेखक ने विशेष ध्यान दिया। कबीर और सूर की रचनाओं से भी उन्होंने लाभ उठाया।  (हिन्दी व्याकरण, केलॉग, अनुवाद- डॉ. श्रीराम शर्मा, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, प्रयाग, पृष्ठ- 10-11)