शनिवार, 28 मार्च 2020

अकहानी


अकहानी    

निश्चित रूप से स्वतंत्रता के पश्चात बदलते हुए परिवेश में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक मान्यताओं में परिवर्तन आया है, जिसके कारण मूल्यों का विघटन हुआ है पुराने मूल्य टूट रहे हैं और नए मूल्यों ने करवट ली है। जिससे स्त्री-पुरूष दोनों के लिए नये क्षेत्र खुल गए हैं। उसे अपनी अस्मिता को खोजना और उसे सुरक्षित रखने के लिए कठिन प्रयासों की जरूरत है, जिसका रूप साहित्यकारों के कथा साहित्य में स्पष्ट रूप से देखने को मिलता है। विचार किया जाए तो अकहानी अकविता जैसे शब्द के आने के कारण ही गद्य साहित्य में अकहानी का आविर्भाव हुआ। कुछ विचारकों का मानना है कि अकहानी की प्रेरणा पश्चिम के एंटी स्टोरीसे हिंदी में आई है। इस बात को समझाते हुए डॉ. श्रीनिवास शर्मा लिखते हैं कि, 'साठोत्तरी काल में अकहानी का आन्दोलन चला। यह आन्दोलन पश्चिम के एण्टी स्टोरी आन्दोलन से प्रभावित रहा।'[1] अकहानी के प्रमुख हस्ताक्षरों में दूधनाथ सिंह, ज्ञान रंजन, रवीन्द्र कालिया, भीमसेन त्यागी, विश्वेश्वर, गंगाप्रसाद विमल, महेन्द्र भल्ला, रमेश बक्षी, श्रीकांत वर्मा आदि प्रमुख हैं। डॉ. श्रीनिवास शर्मा लिखते हैं कि, 'अकहानी को जन्म देने वाले लेखक वे हैं जो स्वतंत्रता के बाद होश सँभालने लगे थे। लोकतंत्र की विद्रूपता, युवा वर्ग की बौखलाहट, तरह-तरह के आन्दोलन से त्रस्त जनमानस नये तेवर लेकर आया।'[2]
 अकहानी के प्रबल समर्थक गंगा प्रसाद विमल ने अकहानी को अभारतीय कहने वालों को अज्ञान का आग्रह भोहीकहा है। उन्होंने इसे अपरिभाषेय स्वीकारा। डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय के मतानुसार, 'अ-कहानी के संबंध में डॉ गंगाप्रसाद विमल का कथन है, वस्तुतः एक अलग आधार पर यदि निष्पक्ष होकर विश्लेषण किया जाए तो  हमें ज्ञात होगा कि लगभग सभी समकालीन रचनाएँ पूर्व-रचनाएओं का विकास या विरोध न होकर एक नई तरह की कथा-रचनाएँ हैं, जिन्हें सामान्य शब्दों में कथा-रचनाएँ भी नहीं कहा जाना चाहिए इसीलिए उन्हें अ-कहानी कहा जाता है।'[3] वास्तव में अकहानी में सामाजिक संघर्षों से संबंधित विषयों को ग्रहण न करके यौन प्रसंगों अर्थात् सेक्स को ही कहानी का विषय बनाया है। जिसे इनकी इन कहानियों में देखा जा सकता है, उदाहरण के लिए दूधनाथ सिंह - रीछ’, गंगाप्रसाद विमल - विध्वंस’, ज्ञान रंजन - छलांग’, कृष्ण बलदेव वैद - त्रिकोणआदि हैं।
 इतना ही नहीं इसमें सभी मूल्यों का निषेध करते हुए साहित्यिक मूल्य को भी अस्वीकार कर दिया है। लेकिन यह जरूरी भी नहीं है कि इस दौर के सभी लेखकों ने ऐसा किया है। यहाँ यह जरूर कहा जा सकता है कि यथार्थ बोध या विसंगति को अपना केन्द्र बिन्दु बना लिया है। डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय जी लिखते हैं कि, 'अ-कहानी किसी तरह के मूल्यों की रक्षा करती हुई या आग्रह रखती हुई नहीं चलती है। उसके लिए पुराने मूल्यों का टूटना भी कोई महत्त्वपूर्ण बात नहीं है।'[4] एक तर्क यह भी है कि अकहानी से जुड़े सभी कहानीकारों को सर्वाधिक सफलता संबंध भाव की स्थितियों को उभारने में मिली हैं। साथ ही नैतिक वर्जनाओं और निषेधों के प्रति दृष्टि बहुत आक्रामक रही है। जहाँ इनकी कहानियों में पुराने मूल्यों के अस्वीकारने और बिगड़े हुए आपसी संबंधों के यथार्थ चित्रण में हैं, वहीं सेक्स केन्द्रित कहानी होने के कारण अकहानी न तो व्यापक बन सकी अर्थात् जन सामान्य तक अपनी जगह बना पाई और न अधिक प्रामाणिक। जीवन की बुनियादी सच्चाईयों की अवहेलना करने से अकहानी लंबे समय तक अपना आस्तीत्व नहीं बना सकी। डॉ. श्रीनिवास शर्मा लिखते है कि, 'अकहानी से उनका मतलब यह है कि इस कहानी में वे सारी विशेषताएँ छोड़ दी गयी हैं जो अब तक कहानी में थीं। वैसे तो अकहानी भी कहानी है पर वह अपने से पिछली कहानियों की विशेषताओं से मुक्त है।'[5]


[1] हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल, डॉ. श्रीनिवास शर्मा, पेज-46
[2]  हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल, डॉ. श्रीनिवास शर्मा, पेज-46
[3]  स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, पेज-57
[4]  स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, पेज-57
[5]  हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल, डॉ. श्रीनिवास शर्मा, पेज-46

हिंदी कहानी की विकास यात्रा


हिंदी कहानी की विकास यात्रा
कहानी व्यक्ति की कल्पना, उत्सुकता एवं जिज्ञासा के विस्तार के लिए होती है। कहानी हमारे मस्तिष्क में शब्द भंडार, कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता का विकास करती है। विचार करें तो कहानियाँ पढ़ने से हमें अन्य लोगों के अनुभवों में प्रवेश करने का मौका मिलता है। इससे हमें कौन, कहाँ और कैसे लिखता है? आदि कितने ही प्रश्नों को जानने का मौका मिलता है। हीलिंग द माइंड थ्रू द पावन ऑफ स्टोरी में डॉ. लुइस मेहल मेडरोना कहती हैं- 'कहानियों के जरिए दिमाग बाहरी दुनिया का नक्शा तैयार करता है। बार-बार एक ही तरह की कहानी से दिमाग उसी नक्शे के अनुसार प्रतिक्रिया देने लगता है।' कहानी शब्दजाल नहीं, बल्कि कहानीकार का जीवन-दर्शन कराता है। कहानी विधा में समय के साथ परिवर्तन हुआ है और होता रहेगा, क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कहानियों के विषय समाज, देशभक्ति, लोकसेवा, प्रेम, जासूसी आदि कितने ही रहे हैं। हर एक कहानीकार इन विषयों को अपने हिसाब से दिखाता और समझाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के अनुसार, 'इसमें कोई संदेह नहीं कि उपन्यास और छोटी कहानी दोनों के ढाँचे हमने पश्चिम से लिये हैं। हैं भी ये ढाँचे बड़े सुंदर। हम समझते हैं कि ढाँचों तक ही रहना चाहिए। पश्चिम में भिन्न-भिन्न दृष्टियों से किये हुए उनके वर्गीकरण, उनके संबंध में निरूपित तरह-तरह के सिद्धांत कहानियों का हमारे वर्तमान हिंदी साहित्य में इतनी अनेकरूपता के साथ विकास हुआ है कि उनके संबंध में हम अपने कुछ स्वतंत्र सिद्धांत स्थिर कर सकते हैं, अपने ढंग पर उनके भेद-उपभेद निरूपित कर सकते हैं।' विचार करें तो हिंदी कहानी का यह दौर यूरोप से विकसित होकर अंग्रेजी और बंगला के माध्यम से बीसवीं शताब्दी में भारत आया। डॉ. रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार, 'कहानी का हिंदी साहित्य में आविर्भाव बीसवीं शती के आरंभ में होता है, साहित्यिक पत्रकारिता के उद्य के साथ।'[1]  समझ या ज्ञान की दृष्टि से समझे तो हमारी प्राचीन कहानी एवं आधुनिक कहानी के स्वरूप में बड़ा अंतर दिखलाई पड़ता है। प्राचीन कहानी अलग-अलग लोक कथाओं पर आधारित है, जो हमारे वैदिक और लौकिक ग्रंथों या साहित्य से आधारित है। रामस्वरूप चतुर्वेदी के अनुसार, 'कहानी हर रूप में उपन्यास से पुरानी विधा है। गीत और कहानी मानव सभ्यता से साक्षरता-काल के पहले से जुड़े हुए हैं, यद्यपि दोनों के लक्ष्य कुछ भिन्न रहे हैं।'[2] जहाँ तक आधुनिक कहानी की बात है आधुनिक कहानी वह सामान्य जन के जीवन से संबंधित लौकिक यथार्थवादी, विचारात्मक धरती के सुख तक सीमित है।  
हिंदी की प्रथम कहानी किसे माना जाए इस विषय को लेकर विद्वानों के बीच मतभेद है। लगभग दर्जन भर कहानियाँ प्रथम कहानी की होड़ में खड़ी होती दिखलाई पड़ती हैं। वर्ष 1803 में प्रकाश में आने वाली प्रथम कहानी रानी केतकी की कहानी को कहा जाता  है इसे उदयभान चरित भी कहा जाता है। इस कहानी के लेखक इंशा अल्ला खां हैं। डॉ. गुलाब राय के मतानुसार, 'रानी केतकी की कहानी इस उद्देश्य से लिखी गई थी कि उसमें हिन्दवी छुट और किसी बोली का पुट न मिले।'[3] लेकिन जो भी हो कुछ साहित्यकार इसे ही पहली कहानी का श्रेय देते हैं। रानी केतनी की कहानीके पश्चात् राजा शिव प्रसाद सितारे हिंद द्वारा रचित राजा भोज का सपना, भारतेंहु हरिश्चन्द्र द्वारा रचित अद्भुत अपूर्व स्वप्नका उल्लेख किया जा सकता है जिसमें कहानी की सी रोचकता विद्यमान है। इतना ही नहीं विद्वानों के अलग-अलग विचारों के कारण कुछ विद्वान किशोरीलाल गोस्वामी द्वारा रचित इन्दुमतीको प्रथम कहानी मानने पर बल देते है। डॉ. श्रीनिवास शर्मा के अनुसार, 'बहुत से विद्वान किशोरीलाल गोस्वामी को हिंदी का पहला कहानीकार मानते हैं और उनकी इन्दुमती को पहली कहानी। यह सन् 1887 में लिखी गई थी और 1900 में प्रकाशित हुई थी।'[4] आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने आधुनिक ढंग की कहानियों का आरंभ सरस्वती पत्रिकाके प्रकाशन काल से स्वीकारा है। सरस्वतीमें प्रकाशित कहानियाँ इस प्रकार हैं-
1.       इंदुमती - किशोरी लाल गोस्वामी (1900 ई.)
2.      गुलबहार - किशोरी लाल गोस्वामी (1902 ई.)
3.      प्लेग की चुडैल - मास्टर भगवान दास (1902 ई.)
4.      ग्यारह वर्ष का समय - राम चन्द्र शुक्ल (1903 ई.)
5.      पंडित और पंडितानी - गिरजादत्त बाजपेयी (1903 ई.)
6.      दुलाई वाली - बंग महिला (1907 ई.)'[5]
इस दृष्टि से प्रथम कहानीकार किशोरी लाल गोस्वामी तथा प्रथम कहानी इंदुमतीप्रमाणित होती है। इंदुमतीकी चर्चा प्रायः प्रत्येक समीक्षक ने की है। रामचन्द्र शुक्ल इंदुमतीको ही प्रथम कहानी मानते हैं। रामचन्द्र शुक्ल ने लिखा है, 'यदि इंदुमतीकिसी बंगला कहानी की छाया नहीं है तो हिंदी की यही पहली मौलिक कहानी ठहरती है इसके उपरांत ग्यारह वर्ष का समयऔर दुलाईवालीका नंबर आता है।'[6]



[1] . हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, पेज- 144.
[2]  हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास, रामस्वरूप चतुर्वेदी, पेज- 144.
[3] हिन्दी साहित्य का सुबोध इतिहास, डॉ. गुलाब राय, पेज-182
[4] हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल, डॉ. श्रीनिवास शर्मा, पेज-34
[5] हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुकल, पेज-359-360 (प्रकाशक- प्रकाशन संस्थान, नई दिल्ली)
[6]  हिंदी साहित्य का इतिहास, रामचंद्र शुक्ल, पेज- 360.

रविवार, 16 फ़रवरी 2020

विदेशी साहित्यकार और साहित्य चेतना



विदेशी साहित्यकार और साहित्य चेतना
कलम ही साहित्य का रूप धारण करती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास में लिखा भी है कि, हर एक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चितवृत्तयों का वर्णन होता है। महावीर प्रसाद द्विवेदी ने भी कहा है कि साहित्य समाज का दर्पण होता है। विचार करें तो हर एक देश के युग परिवर्तन में कलम की ताकत को कभी भुलाया नहीं जा सकता है। देशी-विदेशी सभी स्थितियों में कलम ने परिवर्तन कर समाज को जागृत कर नया रास्ता दिखाया है। मैजिनी के साहित्य ने इटली को नवजीवन प्रदान किया। गांधी जी लिखते हैं कि, 'मैजिनी के अरमान अलग थे। मैजिनी जैसा सोचता था वैसा इटली में नहीं हुआ। मैजिनी ने मनुष्य-जाति के कर्तव्य के बारे में लिखते हुए यह बताता है कि हर एक को स्वराज भोगना सीख लेना चाहिए। यह बात उसके लिए सपने जैसी रही।'[1]
फ्रांस के मार्स लेब्लांक जासूसी उपन्यास लिखने में विश्व विख्यात हैं। फ्रांस की लेखिका जार्ज सैन्ड ने सौ के लगभग उपन्यास लिखें, कहते हैं जब भी वह कलम उठाती थी लिखने बैठ जाती थी और एक उपन्यास की रचना हो जाती थी। फ्रेंच लेखक Guy de Maupassant की कहानी The Diamond Necklace (1884) चर्चित रही है। इसी का आधार हिंदी का लोकप्रिय उपन्यासकार प्रेमचंद का उपन्यास गबन रहा है।
रूसी लेखक लियो टालस्ताय (1828-1910) के 'वार एंड पीस' उपन्यास को दुनिया का सबसे सुंदर और बड़ा उपन्यास माना जाता है। इनकी कहानियों का विश्व के कई देशों में अनुवाद हुआ है, हिंदी में प्रेमचंद ने इनकी एक कहानी का अनुवाद प्रेम में परमेश्वर नाम से किया है। इस कहानी में मूरत नाम के एक व्यक्ति की कहानी को दिखाया गया है। मूरत की पत्नी और बच्चे मर जाते हैं, एक लड़का तो 20 वर्ष की अवस्था में मरता है। इस घचना से खिनन होकर मूरत का भगवान से विश्वास हट जाता है। लेकिन उसका एक मित्र उसे भगवत मार्ग पर ही चलने की सलाह देता है। धीरे-धीरे मूरत का भगवान का भजन करने लगता है और हर एक काम उसी का समझकर करता है। एक दिन भगवान उसे स्वप्न में दर्शन देते हैं और कहते हैं कि मैं तुमसे मिलने आऊँगा। लेकिन वह नहीं आते पर जब स्वप्न में भगवान उसे बताते हैं कि मैं तेरे द्वार पर बूढ़ा भिक्षूक बनकर आया, मैं एक गरीब औरत और उसके बच्चे के रूप में आया आदि। तुमने उन सभी की सेवा की यही मुझसे मिलन है। मूरत मन ही मन खुश हुआ और भगवत भजन में फिर लग गया। अंतोन चेखव (1860-1904) ने अपनी कहानियों से समाज को जागृति दी। इनकी कहानी अन्याय का विरोध में दिखाया गया है कि जूलिया जो कि आया का काम करती है, जहाँ वह पहले काम करती थी। उसका मालिक उसको वेतन नहीं देता था। अब भी वह जिस घर में काम करती है, तो मालिक उसका सारा वेतन महीने भर काम करते हुए जूलिया ने जो नुकसान किया है, उसमें काट लेता है। जूलिया मालिक का मुंह देखती रह जाता है। लेकिन मालिक उसे समझाते हुए पूरा वेतन दे देता है कि अन्याय के विरूध जरूर आवाज उठानी चाहिए। तुम केवल मेरी ओर देख रही थी, बोल कुछ भी नहीं रही थी। गोर्की के उपन्यास 'मदर' ने भी समाज और देश को नई सोच के साथ आगे बढ़ाया। रूस के इन साहित्यकारों ने ही वहाँ की जनता में एक नया जोश पैदा किया।
अमेरिकन लेखक मार्क ट्वेन के बारे में कहा जाता है कि कल्पना शून्य उपन्यास लिखने के लिए और अपने पात्रों के साथ न्याय करने के लिए जैसा पात्र होता था, उसी का व्यवहार अपने जीवन में करते थे। वह पात्र के अनुसार कितनी बार रेल-ट्राम में बिना टिकट सफर करने वाले चित्त की क्या दशा होती है, उसे जानते और फिर पात्रानुसार लिखते थे। इनका उपन्यास Innocents Abroad  उच्च कोटी का है। मार्क ट्वेन ने 13 वर्ष की अवस्था में ही स्कूल छोड़ दिया था। ट्वेन Mississippi के आस-पास का वर्णन अपनी कहानियों उपन्यासों में करते हैं। वहीं पर वह नौकरी भी करते थें। सन् 1876 में इनका उपन्यास The Adventures of Tom Sawyer भी उसी के आस-पास के वातावरण पर लिखी है। इसमें टॉम एक अनाथ लड़का होता है, जिसे पोली नामक महिला अपने घर पर ले जाती है। पोली का अपना पुत्र सीड टॉम की उम्र का है। लेकिन टॉम घर का कोई काम नहीं करता है। आवारा घुमता रहता है और अंत में घर से भाग भी जाता है। वह चोरी और लूट का ही काम करता है। अंत में लेखक हैक के माध्यम से कहता भी है कि, Tell me, who’s going to be Robin Hood, Tom? इस बात से एक बात स्पष्ट हो जाती है कि Howard Pyle ने पहले अपने उपन्यास में रोबिन हुड चरित्र को खड़ा किया। इसी उपन्यास से यशपाल की कहानी कुत्ते की पूँछ याद आती है, जिसमें नायक-नायिका एक अनाथ गरीब बालक को अपने घर ले आते हैं, जिसका नाम हरूआ अर्थात् हरीश होता है। नायक-नायिका का भी पुत्र होता है। पहले हरुआ घर के लोगों की तरह रहता है। लेकिन धीरे-धीरे वह कामचोरी करता है पर इस कहानी में वह चोर या फिर लूटेरा नहीं बनता है।
 Howard Pyle अमेरिका के रहने वाले थे, लेकिन The Adventures of Robin Hood (1883) पुस्तक में इंगलैंड के नॉटिंघम में रोबिन हूड के चरित्र को दुनिया के सामने लाकर खड़ा कर दिया। वह धनी लोगों को लूटता था और गरीबों में बाँटता था। वह गरीबों का मसिहा था। इन्होंने Otto of the silver Hand (1888) को भी लिखा। साथ ही Men of Iron पर फिल्म भी बनी, जिसका नाम था The Black Shield of Falworth  रोबट फरोस्ट (1864-1973) भी अमेरिका के साहित्य में अपना अलग ही स्थान है, इनकी कविता Stopping by Woods on a Snowy Evening महत्वपूर्ण है। जिसमें जंगल से जाते हुए कवि ने जंगल की सुंदरता का वर्णन किया है। अमेरिकन लेखक H.P. Lovecraft की होरर कहानी The outsider लोकप्रिय रही। विषय के अनुसार हिंदी कहानीकार मालती जोशी ने 'आउटसाइडर' कहानी लिखी। लेकिन इनकी कहानी पारिवारिक जीवन पर आधारित है। अमेरिकन लेखिका केटी चोपिन (1850-1904) ने अपनी कहानी The Story of an hour में रेल दुर्घटना का वर्णन किया है। जिसमें लुजी मलाड़ के पति ब्रेंटली मलाड का निधन होने की खबर घर पर पहुँचती है। इसी बात को वह सत्य मान लेती है। लेकिन ब्रंटली मलाड उस स्थल से दूर होता है और कुछ दिनों बाद जब वह घर वापस लौटता है ति पत्नी उसे देख खुश होती है, जिससे उसको दिल का दौरा पड़ जाता है और मर जाती है। कवि और दार्शनिक (1803-1882) ने अपनी कविता द रोहडोरा (The Rhodora) में रोहडोरा के फूल की विशेषता का वर्णन किया है। यह फूल नार्थ अमेरिका के पूर्वी हिस्से में पाया जाता है। विचार करें तो हिंदी कविता में भी फूलों को लेकर कितनी ही कविताएँ लिखी गई हैं। निराला ने तो जूही की कली को लेकर कविता लिखी है आदि।
जर्मन महाकवि गेटे ने लिखा है- 'साहित्य का पतन राष्ट्र के पतन का द्योतक है।' कालाईल का कथन है- 'साहित्य विश्व का रहस्य-प्रकाश है।' विलियम शेक्सपियर ने अपने जीवन का आरंभ एक अभिनेता और लेखक के रूप में किया। अपने अंतिम समय में उन्होंने दुःखात-सुखान्तक नाटकों का लेखन किया था, जिनमें कुछ रोमांचक नाटक भी थे। इनके हैमलेट, ऑथेलो, किंग लेअर, मैकबेथ आदि महत्वपूर्ण है। कहा यह भी जाता है कि शेक्सपीयर ने अपने कई नाटकों की रचना इटलियन उपन्यासों के ही आधार पर की है। The Merchant of venice में लेखक शेक्सपीयर ने इटली के विवाह और संस्कृति का वर्णन किया है। इसमें लेखक विवाह के समय ऋण की समस्या को उजागर करता है। विचार करें तो भारतीय कितनी ही कहानियों में विवाह के समय ऋण की समस्या उजागर होती है। हिंदी में हरिऔध ने वेनिस का बांका नाम से एक उपन्यास भी लिखा है।
 अंग्रेजी कवि सर फिलिप सिडनी का कथन था कि, 'अपनी निगाह अपने हृदय में डालो और जो कुछ देखो, लिखो।' अंग्रेजी उपन्यासकार थैकर के विषय में लिखा गया है कि वह संध्या समय नदी के तट पर बैठकर अपने प्लाट (उपन्यास) सोचा करते थे। इंगलैंड के रचनाकार फ्रान्सिस बेकन के विषय में कहा जाता है कि वह सदैव ऐसे लोगों से जिज्ञासा करता रहता था, जो किसी विषय में उससे अधिक ज्ञान रखते थे। अंग्रेजी उपन्यासकार चार्ल्स डिकन्स (1812-1870) के विषय में लिखा गया है कि, 'जब यह किसी नए उपन्यास की कल्पना करते थे, तो महीनों तक अपने कमरे में बंद कर विचार-मग्न पड़े रहते थे, न किसी से मिलते थे, न कहीं सैर करने ही जाते थे।' इनके दर्जन भर उपन्यास थे। Oliver twist, A Christmas carol, Nicholas nickleby, David copperfield आदि रचनाओं को लिखा।  इनकी पिकविक पेपर्स हास्य रस प्रधान अमर कृति कही जा सकती है। कहते हैं कि पिकविक का नाम एक शिकार गाड़ी के मुसाफिरों की जबान से डिकन्स के कान में आया।
जॉनथन स्विफ्ट आयरलैंड का रहने वाला था और उसने 'गुलिवर की यात्रा' (1726) लिखकर साहित्य की दुनिया के सामने सोचने, समझने और कल्पना को एक नई दिशा दे दी।
जब हम हिंदी साहित्य और उसके विकास की बात करते हैं तो हमें हिंदी के विद्वानों के साथ-साथ विदेशी विद्वानों के सहयोग को भी नहीं भूलना चाहिए। इन्होंने समय-समय पर अपनी लेखनी और सच्ची साहित्य सेवा से हिंदी के विकास में अपना योगदान दिया है। 'गार्सां द तासी' एक फ्रांसीसी विद्वान थे, जो पेरिस में हिंदुस्तानी या उर्दू के अध्यापक थे। इनके इस्त्वार द ल लितरेत्यूर ऐंदूई ऐ ऐंदूस्तानी ग्रंथ के दो संस्करण प्रकाशित है। एक 1839 में, दूसरा 1847 में हुआ। इसमें 738 कवियों और लेखकों की जीवनियों का उल्लेख है। इसकी भूमिका में 16 और कुल 630 पृष्ठ हैं। कुछ विद्वान इसे हिंदी का पहला साहित्य का इतिहास बताते हैं। यह हिंदी साहित्य का इतिहास हो या न हो, लेकिन देशी-विदेशी साहित्यकारों को एक साथ एक मंच पर लाने का काम जरूर रहा है।  जॉन बार्थविक गिलक्राइस्ट का जन्म एडिनबरा में हुआ था। उन्होंने एडिनबरा के जार्ज हेरियट्स अस्पताल में चिकित्सा संबंधी शिक्षा ग्रहण की। चिकित्सीय शिक्षा प्राप्त कर वे अप्रैल 1783 को ईस्ट इंडिया कंपनी में एक चिकित्सक के रूप में कलकत्ता (भारत ) आए। यहाँ इन्हे सर्जन का पद दिया गया। तब तक शासन कार्य फारसी में होता था। जॉन गिलक्राइस्ट ने फारसी के स्थान पर शासनकार्य को हिंदुस्तानी के माध्यम से चलाने की बात सोची। वे स्वयं अध्ययन करते रहे और दूसरों को भी इस बात के लिए प्रेरणा देते रहे। इतना ही नहीं गिलक्रिस्ट  ईस्ट इंडिया कम्पनी के कर्मचारी के साथ-साथ भाषाविद भी थे। कलकत्ता के फोर्ट विलियम्स कॉलेज में इन्होने हिंदुस्तानी भाषा की पुस्तकें तैयार कराने का कार्य किया। इन्होंने 1. इंग्लिश-हिन्दुस्तानी डिक्शनरी, कलकत्ता (1787) 2. हिन्दुस्तानी ग्रामर (1796) पुस्तकों की रचना भी की। जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन अंग्रेजों के जमाने में "इंडियन सिविल सर्विस" के कर्मचारी थे। भाषाविज्ञान के क्षेत्र में, उनका स्थान अमर है। सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन "लिंग्विस्टिक सर्वे ऑव इंडिया" के प्रणेता के रूप में उभर आए। नव्य भारतीय आर्यभाषाओं के अध्ययन की दृष्टि से उन्हें बीम्सभांडारकर और हार्नली के समकक्ष रखा जा सकता है। अंग्रेज विद्वानों में फ्रेडरिक पिंकाट का स्मरण हिन्दी प्रेमियों को सदा बनाए रखना चाहिए। इनका जन्म संवत् 1893 में इंगलैंड में हुआ। उन्होंने प्रेस के कामों का बहुत अच्छा अनुभव प्राप्त किया और अंत में लंदन की प्रसिद्ध ऐलन ऐंड कंपनी के विशाल छापेखाने के मैनेजर हुए। वहीं वे अपने जीवन के अंतिम दिनों के कुछ पहले तक शांतिपूर्वक रहकर भारतीय साहित्य और भारतीय जनहित के लिए बराबर उद्योग करते रहे।  सैमुएल केलॉग का जन्म 06 सितंबर, 1839 में, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के न्यूयार्क के लाँग आइलैण्ड में क्योकू नामक स्थान में एक गिरजा-भवन (परोहिताश्रम) में हुआ। केलॉग की पुस्तक का नाम था- ए ग्रामर आफ द हिन्दी लैंग्वेज, इसका पहला संस्करण 1874 में प्रकाशित हुआ था। केलॉग ने अपने प्रथम संस्करण के समय लल्लूलाल के प्रेमसागर के उदाहरण लिए। लेकिन दूसरे संस्करण में राजा लक्ष्मण सिंह द्वारा प्रस्तुत अभिज्ञान शाकुंतलम् की सहायता ली। केलॉग जिस समय हिन्दी व्याकरण लिख रहे थे, यूरोप के कुछ विद्वान भारत में बोली जानेवाली आर्य-परिवार की भाषाओं का अध्ययन कर चुके थे। केलॉग ने अपने समकालीन तथा पूर्ववर्ती विद्वानों को पढ़ा, जो इस प्रकार हैं-बीम्स, हार्नली, पिनकाट, प्लेट्स और ग्रियर्सन आदि। 
किसी देश का साहित्य जानना, समझना, पढ़ना, एक दिन, एक पल और एक क्षण का काम नहीं है। उसके विकास में कितने ही लोगों का योगदान रहता है। इसके बारे में तो उपर्युक्त चर्चा से समझ आ ही गया होगा। इतना ही नहीं समय और परिस्थिति के साथ-साथ भारतीय लोग भी देश की मिट्टी को छोड़ विदेशों में जाकर बस गये और अपनी मिट्टी के लिए कुछ करने की चाहत ने उन्हें लेखन के कार्य की ओर मोड़ दिया। लेखन का यह कार्य वर्तमान में विदेश में रह रहे लोगों द्वारा किया जाना अब प्रवासी साहित्य कहा जाता है। जो भी हो, ये लोग भी हिंदी का ही काम और सेवा कर रहे हैं। अपनी संस्कृति, अपनी मिट्टी की सुगंध, वातावरण, परिवेश और परिस्थितियों से किसी भी सूरत में नाता नहीं तोड़ना चाहते हैं। ऐसे प्रवासी साहित्यकार देश से हजारों किलोमीटर दूर बैठे रहने के बावजूद भी अपनी दिव्यदृष्टि देश हित में ही रखते हैं। उनकी कलम सच्ची ताकत है।


[1] . हिंदी स्वराज, महात्मा गांधी, पेज-49.

परीक्षा के परीक्षकः नरेन्द्र मोदी