शुक्रवार, 19 जुलाई 2013

संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश


संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश

आज हिन्दी भाषा के जिस रूप को हम जानते है, उसका प्राथमिक स्तर ऐसा नहीं था। आरंभ से हम विचार करें तो हिंदी आधुनिक आर्य भाषाओं में से एक है। आर्य भाषा का प्राचीनतम रूप वैदिक संस्कृत रहा, जो उस समय के साहित्य की भाषा थी। वैदिक भाषा में वेद, संहिता, उपनिषदों-वेदांत आदि का सृजन हुआ है। वैदिक भाषा के साथ-साथ ही बोलचाल की भाषा संस्कृत थी, जिसे लौकिक संस्कृत भी कहा जाता है। दूसरे शब्दों में कहें तो प्राचीन भारतीय आर्यभाषा में संस्कृत के दो रूप मिलते हैं : वैदिक और लौकिक। वैदिक संस्कृत का सर्वोतम स्वरुप ऋग्वेद की साहित्यिक भाषा में मिलता है। वैदिक भाषा के धीरे-धीरे परिवर्तित होने के कारण उसमें जनभाषा के लक्षण निरंतर आते गए। परिणामस्वरूप लौकिक संस्कृत का जन्म हुआ। विद्वानों ने सामान्य रूप से भारतीय भाषा के विकास क्रम को तीन भागों में विभाजित किया है-
(1) प्राचीन भारतीय भाषा (१५०० ई० पूर्व से ५०० ई० पूर्व तक)
(2) मध्यकालीन भारतीय भाषा (५०० ई० पूर्व से १०००  ई० तक)
(3) आधुनिक भारतीय भाषा (१००० ई० से अब तक)
जब हम प्राचीन भारतीय भाषा की बात करते हैं तो उसमें सबसे पहले संस्कृत भाषा का नाम लिया जाता है। संस्कृत भारतीय आर्यभाषाओँ के विकास की प्रथम और सबसे महत्वपूर्ण भाषा है। इसे देववाणी या देवभाषा के नाम से भी जाना जाता है। संस्कृत का विकास उत्तरी भारत में बोली जाने वाली वैदिककालीन भाषाओं से माना जाता है। ऐसा माना जाता है कि ८ वी.शताब्दी ई.पू. में इसका प्रयोग साहित्य में होने लगा था। संस्कृत भाषा में ही रामायण तथा महाभारत जैसे ग्रन्थों की रचना हुई। बाल्मीकि, व्यास, कालिदास, अश्वघोष, माघ, भवभूति, मम्मट, दंडी आदि संस्कृत के महान् विचारक माने जाते हैं। संस्कृत का साहित्य विश्व के समृद्ध साहित्य में से एक है। डॉ हजारी प्रसाद द्विवेदी लिखते हैं कि, "हिमालय के सेतुबंध तक, सारे भारतवर्ष के धर्म, दर्शन, विज्ञान, चिकित्सा आदि विषयों की भाषा कुछ १०० वर्षों पहले तक एक ही रही है. यह भाषा संस्कृत थी. भारवर्ष का जो कुछ शेष और रक्षा योग्य है वो यह भाषा की भण्डार में संचित किया गया है। इसके लक्षाणिक ग्रंथों के पठन, पाठन और चिंतन में भारतवर्ष के हजारों पुश्त तक के करोंडो सर्वोतम मस्तिस्क दिन रात लगे रहे हैं और आज भी लगे हुए हैं। मैं नहीं जानता की संसार के किसी देश में, इतने काल तक, इतनी दूर तक व्याप्त इतने उत्तम मस्तिस्क में विचरण करने वाली कोई भाषा है या नहीं, शायद नहीं."

संस्कृत भाषा के विकास के बाद के काल को हिंदी भाषा का मध्यकालीन युग कहा गया। संस्कृत कालीन आधारभूत बोलचाल की भाषा परिवर्तित होते-होते समयानार काफ़ी बदल गई, जिसे 'पाली' कहा गया। पाली का अर्थ है "पाठ"।  वास्तव में बौद्ध धर्म का साहित्य पाली में ही लिखा हुआ है। महात्मा बुद्ध के समय में पाली लोक भाषा थी और उन्होंने पाली के द्वारा ही अपने उपदेशों का प्रचार-प्रसार किया। संभवत: यह भाषा ईसा की प्रथम ईसवी तक रही। मध्य कालीन (५०० ई० पूर्व से १००० इ० तक ) भारतीय आर्यभाषाओँ के विकास क्रम को तीन भागों में सामान्य रूप से रखते हैं: पाली युग ; प्राकृत युग और अपभ्रंश युग। इसके बाद से ही हिंदी युग का आरंभ हुआ।


पहली ईसवी तक आते-आते पाली भाषा और परिवर्तित हुई, तब इसे 'प्राकृत' की संज्ञा दी गई। इसका काल 100 ई. से 600 ई. तक माना जाता है। प्राकृत का अर्थ है "सहज"और यह बहुत से आधुनिक हिंदी उपभाषाओं की मूल भाषा है, जैसे कुछ लोग अर्धमागधी, शौरसेनी, इत्यादि भाषाओँ की जनक प्राकृत को ही मानते हैं। जैन धर्म का साहित्य प्राकृत में रचित है। प्राचीन भारत में यह आम नागरिक की भाषा थी और संस्कृत अति विशिष्ट लोगों की भाषा थी।

अपभ्रंश का अर्थ है "दूषित" अर्थात् जो शुद्ध ना हो। अपभ्रंश शब्द का प्रयोग दो अर्थों में किया जाता है –साभ्रष्ट-बिगडा हुआ रुप तथा विकसित रुप। अपभ्रंष नाम सर्वप्रथम वलभी के राजा धारसेन द्वितीय के शिलालेख में मिलता है। जिसमें उसने अपने पिता ग्रहसेन को संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश तीनों भाषाओं का कवि कहा है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के मतानुसार, इस प्रकार अपभ्रंश या प्राकृत भाषा की हिंदी में रचना होने का पता हमें विक्रम की सातवीं शताब्दी में मिलता है, उस काल की रचना के नमूने बौद्धों की वज्रयान शाखा के सिद्दों की कृतियों के बीच मिलते हैं।
यह भाषा ही आधुनिक हिंदी भाषा के मूल में है। विचार किया जाए तो अपभ्रंश की भाषा रूप में यद्यपि अलग सत्ता है, किन्तु, वो संस्कृत, पाली और प्राकृत की अपेक्षा हिंदी के व्याकरणिक ढांचे और शब्द भंडार के बहुत निकट है। अपभ्रंश में रचित अधिकांश साहित्य उच्च कोटि का है। इसको प्राकृत का विकसित रुप कहना अधिक समीचीन है। आचार्य शुक्ल के अनुसार, जब तक भाषा बोलचाल में थी, तब तक वह भाषा या देवभाषा ही कहलाती रही, जब वह भी साहित्य की भाषा हो गई तब उसके लिए अपभ्रंश शब्द का व्यवहार होने लगा। अपभ्रंश को इसीलिए 'पुरानी हिंदी' भी कहा जाता है। इस प्रकार अपभ्रंश को मध्यकालीन और आधुनिक कालीन भाषाओँ के बीच के कड़ी माना गया है।


जहां तक अपभ्रंश के भेदों की बात है विचारको ने इसके अलग-अलग भेद के है। नमि साधु के अनुसार इसके तीन भेद हैं- उपनागर, आभीर और ग्राम्य। मार्कण्डेय जी ने इसके तीन भेद माने हैं- नागर, उपनागर और ब्राचड। डॉ याकोबी के मतानुसार इसके चार भेद हैं- पूर्वी, पश्चिमी, दक्षिणी और उत्तरी। डॉ तगारे ने अपभ्रंश के तीन भेद माने हैं- दक्षिणी, पश्चिमी और पूर्वी। डॉ नामवर सिंह ने इसके केवल दो ही भेद माने हैं- पश्चिमी और पूर्वी।   

      डॉ भोलानाथ तिवारी ने अपभ्रंश के निम्नलिखित सात भेद माने हैं और उससे  निर्गत आधुनिक भाषाओं को इस प्रकार दिखाया है-

      अपभ्रंश                   उससे निकलने वाली आधुनिक भाषाएं

1.   शौरसेनी                        पश्चिमी हिंदी, राजस्थानी, गुजराती।
2.   पैशाची                   लहंदा, पंजाबी (इस पर शौरसेनी अपभ्रंश का प्रभाव है)
3.   ब्राचड़                    सिंधी
4.   खस                     पहाडी
5.   महाराष्ट्री                 मराठी
6.   अर्द्ध मागधी               पूर्वी हिंदी
7.   मागधी                   बिहारी, बंगाली, उडिया, असमिया।

विचार करे और देखे तो हम पाते हैं कि अधिकांश भाषा वैज्ञानिकों तथा विचारकों ने खस और ब्राचड़ के नाम को नहीं माना है तथा ना ही इनके नाम लिए हैं। उन्होनें केवल पांच भेद ही माने हैं। वास्तव में अपभ्रंश से ही हिन्दी भाषा का जन्म हुआ। आधुनिक आर्य भाषाओं में, जिनमे हिन्दी भी है, का जन्म 1000 ई.के आस पास ही हुआ था, किंतु उसमे साहित्य रचना का कार्य 1150 या इसके बाद आरंभ हुआ। अनुमानत: तेरहवीं शताब्दी में हिन्दी भाषा में साहित्य रचना का कार्य प्रारम्भ हुआ, यही कारण है कि हजारी प्रसाद द्विवेदी जी हिन्दी को ग्राम्य अपभ्रंशों का रूप मानते है। इस दृष्टि से भाषा बहता नीर की बात सही साबित होती है और हम पाते है कि कैसे एक भाषा अपना स्वरुप बदलती हुई आगे बढती चली जाती है। वह समय के साथ लोगों के विचारों को राशनी देने का काम करती है तो साहित्य को भी बढाती हुई चलती है।


सोमवार, 17 जून 2013



नई सोच का परिणाम है पितृ दिवस
                                  डॉ. नीरज भारद्वाज
मित्रों, पितृ दिवस पर कितने ही लोगों ने लिख डाला है। पाश्चात्य का एक और प्रभाव लोगों के दिलो दिमाग पर राज करने लगा है। क्या पिता को मनाने के लिए किसी खास दिन की जरुरत होती है? यह नई सोच पता नहीं कहां से उपजी है। हमारे ग्रंथ एवं विद्वानों का मानना है कि माता धरती के समान है, जो सारे दर्द सहन करके भी अपनी संतान का पालन-पोषण करती है और पिता असमान की तरह है, जो हमेशा छत की तरह बने रहकर उनकी रक्षा करता रहता है और अपने बच्चों के लिए हर संभव प्रयास करके उनका भरण-पोषण करता है। माता-पिता दोनो ही बच्चों के भलाई के बारे में सोचते रहते हैं। उनका दिया हुआ जन्म हम कैसे भूला सकते हैं। फिर उनके लिए एक दिन मनाकर क्या उनको खुश किया जा सकता है, कभी नहीं। जहां तक मैं मानता हूं कि साहित्य हमेशा नई सोच को भी लिखता है और उसका परिणाम है आपका बंटी नामक उपन्यास। उपन्यास में मन्नू भंडारी ने आधुनिक माता-पिता की सोच पर प्रकाश डाला है और कैसे प्रेम विवाह करने वाले लडका-लडकी जल्द ही अलग-अलग रहने लगते हैं और दोनो ही फिर से नए संबंध बनाकर अलग-अलग शादी भी कर लेते हैं। लेकिन उन दोनों से पैदा हुआ बच्चा कैसे समाज में अपना स्थान नहीं बना पाता और वह केवल ठोकर ही खाता रहता है। उस पर लेखिका ने प्रकाश डाला है। देह खुख की कामना में, जो बच्चा पैदा हुआ और उसे किसी ने नहीं पाला। तो ऐसे वातावरण में तो पितृ दिवस मनाना सही है, क्योंकि उस बालक को न माता का प्यार मिला और न ही पिता का तो वह एक दिन आकर अपने माता-पिता से मिल लेता है और अपनी बातों को भूलाने का प्रयास करता है। लेकिन वास्तविता से सोचा जाए तो ऐसा माहौल और ऐसे पैदा होकर पलने वाला बच्चा राष्ट्र को नई सोच देगा। इससे सही संस्कृति की भावना फैलेगी? नहीं, बल्कि देहिक भूख की भावना फैलेगी। नए कानून बनेंगे, नई सोच उत्पन्न होगी, नया समाज बनेगा और चारों ओर केवल देह खुश ही सर्वोपरी होगा। इसके बहुत से परिणाम तो हम साचारपत्रों में पढ भी लेते हैं। प्रेमी के साथ मिलकर ल़डकी ने घरवालों को जहर दिया अर्थात् माता-पिता को मार दिया। प्रेम के कारण पत्नि ने पति को मार दिया। मैंने आपका बंटी उपन्यास का जिक्र इसलिए किया, क्योंकि वह कहीं न कही हमारी आधुनिक सोच को दर्शाता है। जिसके कारण समाज में ऐसे पाप बढ रहे हैं और कितने ही बच्चे माता-पिता के प्यार से अछुते रह जाते हैं। हम भारतीय संस्कृति के लोग हैं। हम रोज माता-पिता के दर्शन करके और उनका आशीर्वाद लेकर ही घर से निकलते है और अपने काम को अंजाम देते हैं। हमारे यहां इन सभी दिनों की अभी आवश्यकता नहीं है। हां, भविष्य में हो सकती है। लेकिन हम साहित्य और अध्यापन से जुडे लोग अपनी संस्कृति को अपनी कलम के माध्यम से बचाने का हर संभव प्रयास करेंगें और बदलती मानव सोच पर लेखन के माध्यम से ऐसे ही कुठाराघात करते रहेंगे।

शनिवार, 25 मई 2013



क्या करें मन उदास है
                                    डॉ. नीरज भारद्वाज
21वीं सदी के भारत में विकास को लेकर बहुत सारी बातें हो रही है। 21वीं सदी को लोग सूचना, विज्ञान, प्रौद्योगिकी आदि की सदी भी कह रहे हैं। इतना ही नहीं लोग चारों ओर अपने लाभ तथा विकास की बातें कर रहे हैं। सरकारें विकास के नाम पर वाह-वाई लूट रही हैं। लेकिन विकास का यह पथ समाज की दृष्टि से किस ओर जा रहा है, इस पर भी विचार करने की जरुरत है।
आए दिन समाचारपत्रों, समाचार चैनलों पर नर संहार की कोई न कोई बडी घटना मिल ही जाती है। कहने का भाव यह है कि विकास के साथ-साथ मानवता का हनन भी तेजी से हो रहा है। रिस्ते-नाते, व्यक्ति-व्यवहार सभी कुछ टूटते छुटते जा रहे हैं। समाज का एक वर्ग तो धन लोलुप प्रवृति से जी रहा है, वहीं दूसरा वर्ग एक-एक पैसे को मोहताज है। आखिर समाज में इस प्रकार की फैलती जा रही बुराइयों को मिटाने का प्रयास हो रहा है या नहीं, यह सोचने की बात है।
सब कोई अपने में लगें हैं। यदि यही गति रही तो समाज का विघटन नहीं, विनाश व्यक्ति स्वयं कर देगा। बेटी ने प्रेमी के साथ मिलकर सारे परिवार को मारा, नौकर ने मालिक को मारा, इज्जत की खातिर बाप ने बेटी को मारा, धन न मिलने के कारण बाप को मारा, अवैध रिस्तों के कारण पत्नि ने पति को और पति ने पत्नि को मारा, कर्ज न चुकाने के कारण उद्योगपति ने पूरे परिवार को मारा, पांच साल की बच्ची से बलात्कार, सामुहिक बलात्कार आदि न जाने कितनी ही घटनाएं और खबरें आज समाज के सामने आ रही है। लोग उन्हें ध्यान से पढते हैं। लेकिन सोचने कि बात यह है कि हमारा समाज और देश किस दिशा में जा रहा है।
 मानवता शब्द केवल कहने को रह गया है। इन सब बातों पर सोचकर केवल साहित्य की रचना होना रह गया है क्या? हमें सोचना होगा और विचार करना होगा कि कमी कहां पर है तथा उसमें सुधार कहां से हो सकता है। सुधार के साथ-साथ समाज को जागरुक करने के लिए कौन से नए कदम उठाए जा सकते हैं। आज समाज को सहयोग और एक दूसरे के काम आने की जरुरत दिख रही है। लेकिन शुरुआत कहां से हो यह सोचा जा रहा है। मेरा भारत गांव की मिट्टी में ही खुश था। पता नहीं विकास का कौन सा श्राप इसे धीरे-धीरे निगल रहा है। यह सोचकर मन बहुत बार उदास होता है। मानना यह है कि शुरआत कहीं ओर से नहीं हमें अपने आप से ही करनी होगी और करनी चाहिए भी। विकास का पथ इतना भयानक होगा यह कल्पना कभी सोची भी नहीं थी। रिश्ते-नाते इतनी तेजी से टूटते चले जाएगें। हमें सोचना होगा एक बार फिर नए सिरे से और देश को नई रोशनी देनी होगी। 

रविवार, 19 मई 2013

शिक्षक और शोध


शिक्षक और शोध

आज के भागते-दौडते और बदलते परिवेश के काल में शिक्षा और शिक्षक दोनों ही तेजी से बदलते दिखाई दे रहे हैं। शिक्षा के बदलते परिवेश के कारण ही समाज, संस्कृति और लोगों के आव-भाव तेजी से बदल रहे हैं। विचार किया जाए तो मानव मूल्यों के विघटन के इस दौर में और विश्वग्राम की परिकल्पना के इस समय में शिक्षा और शिक्षक दोनों की ही जिम्मेदारी बढती जा रही है। समझा जाए तो एक योग्य शिक्षक ही शिक्षा के स्तर को बढाने और उसे देश-दुनिया में फैलाने का कार्य करता है। राष्ट्र विकास और राष्ट्र को दिशा देना दोनों ही स्थितियों में शिक्षक अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करता है, क्योंकि शिक्षक समाज का द्रष्टा होने के साथ-साथ उभरते समाज का ताना-बाना भी तैयार करता है। राष्ट्रपिता महात्मा गांधी लिखते हैं कि, माना, कि बच्चे की विवेक-शक्ति सुषुप्तावस्था में होती है, परंतु एक सचेत शिक्षक उसे प्रेम से जाग्रत करके उसे शिक्षित बना सकता है। वह बच्चे में सयंम की टेव डाल सकता है, ताकि बुद्धि इंद्रियों के वशीभूत न होकर बचपन से ही उसकी पथ प्रदर्शन बन जाए।
वर्तमान समय में शिक्षक को लेकर बहुत सारे नए मत और विचार उभर कर आ रहे है। उन विचारों तथा विषयों पर चर्चा, परिचर्चा आदि भी हो रही है। लेकिन इन सब बातों से दूर एक विचार यह भी है कि शिक्षक राष्ट्र का निर्माता होता है। इस विचार से यह स्पष्ट होता है कि एक शिक्षक अपने पूरे जीवन काल में अपना सारा समय, ऊर्जा और शोध केवल राष्ट्र के निर्माण में ही लगा देता है। उसके शोध का ही परिणाम होता है कि एक राष्ट्र विकास के पथ पर अग्रसर होता है। विचार किया जाए तो एक शिक्षक हर समय शोध करता रहता है और वह एक शोधार्थी का जीवन यापन करता है। साथ ही साथ वह शोधक का भी कार्य करता है, क्योंकि किसी भी प्रकार की त्रुटि या दोष-निवारण करने वाला शोधक कहलाता है। देखा जाए तो आज कि शिक्षा प्रणाली में  शिक्षक  को अधिकतम गुण प्राप्त कर उसे आधुनिक वैद्य, अभियंता अथवा  अच्छे उद्योग में शिक्षार्थी को कैसे प्रवेश मिलेगा, इस ओर अपने शिक्षार्थियों का ध्यान एकाग्र करना हो गया है।
एक आदर्श शिक्षक अपने शिक्षार्थी में अच्छे गुणों को डालने के लिए उसके प्रश्नों को सुलझाने के लिए कितने ही शोध और प्रयास करता है। वह केवल उपदेश न कर उसका आचरण तथा विचार कैसा हों, इन सब बातों का अध्ययन करता है,  क्योंकि शिक्षार्थी  शिक्षक के प्रत्येक कृत्य का अनुकरण करता है। उसके अनुसार आचरण करने का प्रयत्न करता है। सही मायनों में शिक्षक ही पूरी शिक्षा व्यवस्था का केंद्र बिंदु होता है अर्थात् पूरी शिक्षा व्यवस्था उसी के आस-पास घुमती दिखाई देती है। दूसरे शब्दों में कहें तो संपूर्ण शैक्षिक प्रक्रिया की श्रृंखला में शिक्षक महत्वपूर्ण और निर्णायक भूमिका अदा करता है।
शिक्षक पूरी शैक्षिक प्रक्रिया का महत्वपूर्ण माध्यम है, उसी के शोध और प्रयास से एक शिक्षार्थी अज्ञान रुपी अंधकार से निकलकर ज्ञान के प्रकाश का पुंज बनता है। समझा जाए तो शिक्षा की गुणवत्ता शिक्षक की गुणवत्ता और उसके शोध पर निर्भर करती है। एक शिक्षार्थी में ज्ञानात्मक, भावात्मक, गुणात्मक आदि गुण एवं शिक्षा तभी आ सकेगी जब शिक्षक स्वयं ज्ञान का आलोक पुंज हो और उसमें खोजी अर्थात् शोध की प्रवृति हो। इस दृष्टि से शिक्षक अपने ज्ञान को हमेशा बनाए रखने के लिए शोध करता रहता है।
शोध कार्य में दो क्रियाएं सन्निहित होती हैं- पहली किसी कच्ची धातु की उपलब्धि करना, दूसरी यह कि उसे गलाकर पवित्र परिष्कृत एवं दोषरहित बनाना। शिक्षक इन दोनों ही क्रियाओं को करता है अर्थात् उसके सामने आने वाला कोई भी बच्चा एक कच्चे घडे के समान होता है, जिसे वह अपने ज्ञान और बुद्दि के प्रयोग से समाज का सभ्य नागरिक बनाता है। एक शिक्षक की बुद्धि तथा विचार हमेशा नए-नए प्रयोगों की ओर रहती है। किसी भी सत्य को निकटता से जानने के लिए शोध एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया होती है। समय- समय पर विभिन्न विषयों की खोज और उनके अध्ययन और निष्कर्षो की विश्वसनीयता और प्रमाणिकता भी शोध की मदद से ही संभव हो पाती है। जैसे-जैसे समय बीत रहा हैं वैसे-वैसे मानव की समस्याएँ भी विकट होती जा रही हैं। इन सभी बातों पर विचार एक शिक्षक अपने शोध और प्रयोग से करता रहता है।
वास्तव में देखा जाए तो एक शिक्षक अपने शोध में बोधपूर्वक, ज्ञानपूर्वक आदि प्रयत्नों से तथ्यों का संकलन कर सूक्ष्मग्राही एवं विवेचक बुद्धि से उसका अवलोकन-विश्‌लेषण करके नए तथ्यों या सिद्धांतों का उद्‌घाटन करता है और अपने शिक्षार्थी को आगे बढाता है। नए ज्ञान की प्राप्ति के व्यवस्थित प्रयत्न ही शोध होता हैं और शिक्षक इसके लिए हमेशा तैयार रहता है। शोध ही वह शक्ति है, जो मानव ज्ञान को दिशा प्रदान करती है तथा ज्ञान भंडार को विकसित एवं परिमार्जित करती है और इस दिशा में केवल एक शिक्षक ही प्रयासरत रहता है। मानव की सोच विविधता वाली होती है और उसकी रूचिप्रकृतिव्यवहारस्वभाव और योग्यता भिन्न - भिन्न होती है। इस कारण से अनेक जटिलताएं भी पैदा हो जाती है। अत: मानवीय व्यवहारों की अनिश्चित प्रकृति के कारण जब हम उसका व्यवस्थित ढंग से अध्ययन कर किसी निष्कर्ष पर आना चाहते हैं तो वहां पर हमें शोध का प्रयोग करना होगा। इस तरह सरल शब्दों में कहें तो सत्य की खोज के लिए व्यवस्थित प्रयत्न करना या प्राप्त ज्ञान की परीक्षा के लिए व्यवस्थित प्रयत्न भी शोध कहलाता है।
शिक्षक के शोध का ही परिणाम होता है कि एक राष्ट्र में व्याप्त उसकी व्यावहारिक, सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक, राजनैतिक, साहित्यिक आदि सभी समस्याओं का समाधान होता है, क्योंकि वह हर समय अपने शिक्षार्थी को हर समस्या और उसके समाधान के विषय में विस्तार से बातें करता रहता है। इतिहास इस बात का साक्षी रहा है कि राष्ट्र को गति देने में शिक्षक की भूमिका और उसका शोध सदा ही महत्वपूर्ण रहा है। शिक्षा आयोग (1964-66) की रिपोर्टानुसार- भारत का भाग्य अब उसकी कक्षाओं में तैयार हो रहा है। इस दृष्टि से पूरा अध्ययन करने पर पता चलता है कि शिक्षा सतत् और जीवन पर्यंत चलने वाली प्रक्रिया है और शिक्षक इस प्रक्रिया का केंद्र है। इसीलिए कहा जा सकता है कि एक शिक्षक हर क्षण और समय केवल शोध ही करता है। उसी के शोध और प्रयोगों का परिणाम है, आज का उभरता समाज तथा राष्ट्र।

                                    डॉ. नीरज भारद्वाज (9350977005)
                                                                       dr.neerajbhardwaj0108@gmail.com
                                    Blog- mnbhardwaj.blogspot.com








रविवार, 12 मई 2013

हिंदी प्रश्न


.    तोडने ही होंगे मठ और गढ सबकिसकी पंक्ति है?
2.    द्रुत झरो जगत के जीर्ण पत्रपंक्ति के रचनाकार कौन हैं?
3.    उत्तर प्रियदर्शीकिसकी गीति-नाट्य रचना है?
4.    केसव कहि न जाइ का कहिए! देखत तब रचना बिचित्र अति, समुझि मनहि मन रहिए!किसकी पंक्ति है?
5.    रावरे रूप को रीति अनूप, नयो नयो लागत ज्यों ज्यों निहारिये’ - किसकी पंक्ति है?
6.    प्रसिद्ध हिन्‍दी पत्रिका कल्पनाकहॉं से प्रकाषित होती थी?
7.    कोमल गांधारनाटक के रचनाकार कौन हैं?
8.    मुक्ति का रहस्यनाटक किसकी कृति है?
9.    हिन्दी साहित्य का नया इतिहासके लेखक कौन हैं?
10.   हिन्दी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहासकिसकी कृति है?
11.    हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहासके रचनाकार कौन हैं?
12.    हिन्दी साहित्य की संवेदना का विकासकिसकी रचना है?
13.    कवि कुछ ऐसी तान सुनाओ जिससे उथल पुथल मच जाएकिसकी पंक्ति है?
14.    मध्यवाचार्य किस सम्प्रदाय के संस्थापक हैं?
15.    किन रचनाकारों की भाषा को संधाभाषा कहा गया?
16.    धिक् जीवन जो पाता ही आया विरोधकिसकी पंक्ति है?
17.    दुःखवा मैं कासे कहूँ मोरी सजनीकिसकी कहानी है?
18.    मधुप गुनगुना कर कह जाताकिसकी पंक्ति है?
19.    मर्द साठे पर पाठे होते हैं।किसकी उक्ति है?
20.    ये उपमान मैले हो गये हैंकिसकी पंक्ति है?
21.    हम राज्य लिये मरते हैंकिसकी काव्य-पंक्ति है?
22.    हिन्दी व्याकरणकिसकी रचना है?
23.    हिन्दी शब्‍दानुशासनकिसने लिखा है?
24.    हिन्दी भाषा का उद्भव और विकासकिसकी रचना है?
25.    देवीदीनमुंशी प्रेमचन्द के किस उपन्यास का पात्र है?
26.    प्रैक्टिकल क्रिटिसिज्मकिसका ग्रन्थ है?
27.    सेक्रेड वुडकिसकी रचना है?
28.    लिरिकल बैलेडसकिसने लिखा है?
29.    पोयटिक्सकिसकी कृति है?
30.    जात पांत पूछै नहिं कोईकिसकी पंक्ति है?
31.    प्रेम प्रेम ते होय प्रेम ते पारहिं पइएपंक्ति के रचनाकार कौन हैं?
32.    आधुनिक काल में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान घटना हैकिसका कथन है?
33.    अब अभिव्यक्ति के सारे खतरे उठाने ही होंगेकिसकी उक्ति है?
34.    सबने भी अलग अलग संगीत सुनाकिसकी पंक्ति है?
35.    प्रिय के हाथ लगाये जागी, ऐसी मैं सो गई अभागीकिसकी उक्ति है?
36.    अंतिम अरण्यकिसका उपन्यास है?
37.    विश्‍वबाहु परशुरामकिसका उपन्यास है?
38.    शीलवतीसुरेन्द्र वर्मा के किस नाटक की पात्र है?
39.    मानवमूल्य और साहित्यकिसकी कृति है?
40.    बिहारी सतसईनामक ग्रन्थ के रचयिता कौन हैं?
41.    देव और बिहारीकिसकी कृति है?
42.    बिहारी और देवकिसकी रचना है?
43.    नैया बिच नदिया डूबति जायकिसकी उक्ति है?
44.    माध्यमकिस संस्थान की पत्रिका है?
45.    इलाहाबाद से प्रकाषित कादम्बिनीपत्रिका के प्रथम सम्पादक कौन थे?
46.    पासंगनामक कहानी संग्रह के रचनाकार कौन हैं?
47.    जंगल का जादू तिल तिलनामक कहानी संग्रह के रचनाकार कौन हैं?
48.    दुक्खम सुक्खमउपन्यास की लेखिका कौन हैं?
49.    संसद से सडक तककविता संग्रह के रचनाकार कौन हैं?
50.    मुख नहीं चंद्रमा हैइस पंक्ति में कौन सा अलंकार है?
51.    जिन्दगीनामाकिसकी कृति है?
52.    तुम्हारे लिएकिसकी कृति है?
53.    बाबूलाल तेली की नाकनामक कहानी के रचनाकार कौन हैं?
54.    अकेला पलाशऔर समरांगणउपन्यास किस महिला उपन्यासकार की रचनाएं हैं?
55.    हमसफरनामाकिसके द्वारा रचित रेखाचित्र-संग्रह है?
56.    कुइयाँजानउपन्यास किसकी कृति है?’
57.    तुलसीदास चंदन घिसैंशीर्षक रचना के लेखक कौन हैं?
58.    'राम की जलसमाधि' किस कवि की प्रसिद्ध रचना है?
59.    'रेहन पर रग्‍घू' किसका उपन्‍यास है?
60.    'मानवी' काव्‍य संग्रह के रचयिता कौन हैं?


उत्तरमाला

1.    मुक्तिबोध
2.    सुमित्रानन्दन पन्त
3.    अज्ञेय
4.    तुलसीदास
5.    घनानन्द
6.    हैदराबाद
7.    शंकर शेष
8.    लक्ष्मीनारायण मिश्र
9.    बच्चन सिंह
10.    गणपतिचन्द्र गुप्त
11.    डॉ0 रामकुमार वर्मा
12.    लक्ष्मीसागर वार्णेय
13.    बालकृष्ण शर्मा नवीन
14.    द्वैतवाद
15.    बौद्ध-सिद्ध
16.    निराला
17.    चतुरसेन शास्त्री
18.    जयशंकर प्रसाद
19.    प्रेमचंद
20.    अज्ञेय
21.    मैथिलशरण गुप्त
22.    कामताप्रसाद गुरु
23.    किशोरीदास वाजपेयी
24.    उदय नारायण तिवारी
25.    गबन
26.    रिचर्ड्स
27.    टी.एस. इलियट
28.    विलियम वर्ड्सवर्थ
29.    अरस्तू
30.    रामानन्द
31.    सूरदास
32.    आचार्य रामचन्द्र शुक्ल
33.    मुक्तिबोध
34.    अज्ञेय
35.    निराला
36.    निर्मल वर्मा
37.    विष्वम्भरनाथ उपाध्याय
38.    सूर्य की पहली किरण से सूर्य की अन्तिम किरण
39.    धर्मवीर भारती
40.    पद्मसिंह शर्मा
41.    कृष्ण बिहारी मिश्र
42.    लाला भगवानदीन
43.    कबीर
44.    हिन्दी साहित्य सम्मेलन
45.    बालकृष्ण राव
46.    मेहरुन्निसा परवेज
47.    प्रत्यक्षा
48.    ममता कालिया
49.    धूमिल
50.    अपह्नुति
51.    कृष्णा सोबती
52.    हिमांशु जोशी
53.    स्वयं प्रकाश
54.    मेहरुन्निसा परवेज
55.    स्वयं प्रकाश
56.    नासिरा शर्मा
57.    हरिशंकर परसाई
58.    भारत भूषण
59.    काशीनाथ सिंह
60.   गोपाल सिंह नेपालीv