शनिवार, 26 मई 2018

वर्णिक छंद


वर्णिक छंद सवैया (22-26 वर्ण) इसके 48 भेद हैं। मत्तगयंद सवैया- (मालती तथा इन्दव नाम से भी जाना जाता है) इसके सभी चरणों में सात भगण (SII) और दो गुरू के क्रम से 23 वर्ण होते हैं- उदा.- ताहि अहिर की छोहरिया छछिया भरी छाछ पै नाच नचावै। (23वर्ण) या लकुटी अरु कामरिया पर राज तिहू पुर को तजि डारो।
  रसखान  देव  मतिराम
दुर्मिल सवैया (चंद्रकला)- 24 वर्ण इसमें आठ सगण (IIS) होते हैं तथा 12-12 पर यति होती है। उदा.- इसके अनुरूप कहैं किसको वह कौन सुदेश समुन्नत है। (24)  केशवदास
 किरीट सवैया- इसके प्रत्येक चरण में आठ भगण (SII) के क्रम से 24 वर्ण हैं। उदा.- मानुस हौं तु वही रसखानि बसौं ब्रज गोकुल गाँव कि ग्वारन। जो पसु हों तो कहा बस मेरो चरौं नित नन्द की धेनु मँझारन।। रसखान  देव
 द्रुतविलम्बित छंद- इसके प्रत्येक चरण में नगण (III), भगण (SII), भगण (SII), रगण (SIS) है। इसमें 12 वर्ण होते हैं। हिंदी खड़ी बोली का पहला महाकाव्य प्रियप्रवास (हरिऔध) का आरंभ इसी छंद से है। उदा.- दिवस का अवसान समीप था, गगन था कुछ लोहित हो चला, तरु शिखा पर थी अब राजती, कमलिनी कुल वल्लभ की प्रभा इन्द्रवज्रा- इसमें 11 वर्ण होते हैं। इसमें दो तगण (SSI), एक जगण (ISI) दो गुरू होते हैं। संस्कृत काव्य में इसका प्रयोग अधिक है। मैथिलीशरण गुप्त और हरिऔध ने इसका प्रयोग अधिक किया है। उदा.- मैं जो नया ग्रंथ विलोकता हूँ, भाता मुझे सो नव मित्र सा है, उपेन्द्रवजा- इसमें 11 वर्ण होते हैं। इसमें जगण (ISI), तगण (SSI) और दो गुरू होते हैं।
भुजंग प्रयात- इसमें चार यगण (ISS) के क्रम से 12 वर्ण होते हैं। उदा.- जहाँ कंज के कुंज की मंजुता थी। लता पवित्रता-पुष्पिता गुंजिता थी।
शिखरिणी- इसमें 17 वर्ण होते हैं। य,म,न,स,भ और लघु गुरू होतै है। उदा.- घटा कै सी प्यारी प्रकृति, तियके चन्द्र मुख की नया नीला ओढ़े वसन चटकी ला गगन का।
मालिनी- इसमें 15 वर्ण होते हैं। इसमें दो नगण, एक मगण, दो यगण होते हैं। उदा.- प्रिय पति वह मेरा, प्राण प्यारा कहाँ है? दुःख जलनिधि डूबी का सहारा कहाँ है?
 मन्दाक्रान्ता- इसके प्रत्येक चरण में 17 वर्ण होते हैं। शार्दूल विक्रीड़ित- इसके प्रत्येक चरण में 19 वर्ण होते हैं। कवित्त  कवित्त को घनाक्षरी छंद, मनहरण छंद भी कहा जाता है। यह छंद मुक्तक वर्णिक छंद की कोटि में माना जाता है। इसके प्रत्येक चरण में 31 (16+15) वर्ण होते हैं। 15 या 16 या 31 वर्ण पर यति होती है। चरण के अंत में गुरू होता है।  पद्माकर  घनानंद  केशवदास  सेनापति  जगन्नार्थ दास रत्नाकर (उद्धव शतक)  भूषण  देव रुप घनाक्षरी  जिस पद्य के प्रत्येक चरण में बत्तीस वर्ण हों और अंत में लघु का विधान हो वहाँ रूप घनाक्षरी छंद होता है।

मात्रिक छंद


मात्रिक छंद सममात्रिक छंद अर्द्ध सममात्रिक छंद विषम मात्रिक
छंद
चौपाई
 इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण सोलह मात्राएँ होती हैं तथा चरण के अंत में लघु मात्रा वाला वर्ण नहीं आता।
दो चरण मिलकर एक अर्द्धाली बनते हैं। ये दोनों चरण प्रायः एक ही पंक्ति में लिखे जाते हैं। पहले दूसरे चरण की तथा तीसरे चौथे चरण की तुक परस्पर मिलती है।
उदाहरण
तात जनक तनया यह सोई। धनुष जग्य जेहि कारन होई। पूजन गौरि सखीं लै आईं।
करत प्रकासु फिरत फुलवाईं।
नयन जो देखा कवँल भा, निरमल नीर सरीर । हँसत जो देखा हंस भा, दसन-जोति नग हीर ॥ (पद्मावत)
उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।।
बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।
तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥
रोला 
यह चार पंक्तियों में लिखा जाने वाला एक सममात्रिक छंद है।
इसकी प्रत्येक पंक्ति में 11, 13 की यति के क्रम में 24 मात्राएँ होती है।
पहली-दूसरी तथा तीसरी चौथी पंक्तियों की तुक परस्पर मिलती है।
उदाहरण 
बाधाओं से नहीं तनिक भी जो घबराये। मृत्यु-पंथ पर बढ़े अधर पर हास बिछाये।
मृत्युभूमि के लिए जिन्होंने प्राण लुटाये।
हरिगीतिका 
यह चार पंक्तियों में लिखा जाने वाला सममात्रिक छंद है।
इसकी प्रत्येक पंक्ति में 16 तथा 12 मात्राओं की यति के क्रम से 28 मात्राएँ होती हैं।
पंक्ति के अंत में तुक साम्य होता है।
उदाहरण 
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी।
अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी।
पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी।
ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी।
प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी।
सूरदास अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।

पद्दडिया 
 इसमें 16 मात्राएँ होती है। इसके अंत में जगण (ISI) होगा।
 यह ओजपूर्ण तथा वीर रस के लिए प्रयुक्त होता है।
 उदा.-
 स्वच्छ रज तल अन्तर्गत मूल, उड़ती नभ में निर्मल धूल।
 स्वर्ण मक्शी जाती सुध भूल, श्वेत पुष्पों के पास न शूल।

दोहा 
• यह दो पंक्तियों में लिखा जाने वाला एक सममात्रिक छंद है।
इसका विषम (प्रथम-तृतीय) चरणों में 13-13 तथा सम (दूसरे-चौथे) चरणो में 11-11 मात्राएँ होती है।
• उदाहरण-
 जप माला छापा तिलक, सरै न एकौ काम। मन काँचै नाचै वृथा, साँचे राचै राम।।
 दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय । जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥

सोरठा
 यह अर्ध सममात्रिक छंद है, जो दो पंक्तियों में लिखा जाता है।
इसके पहले व तीसरे (विषम) चरणों में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे व चौथे (सम) चरणों में 13-13 मात्राएँ होती है।
उदाहरण-
 लिख कर लोहित लेख, डूब गया है दिन अहा! व्योम-सिंधु सखि देख, तारक बुदबुद दे रहा!! 
 ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्यों। तातो जारै अंग, सीरो पै कारो पै कारो लगै।। 
 बंदौ गुरू पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि। महा मोह तम पुंज, जासु बचन रविकर निकर।।

बरवै

इसमें पहले और तीसरे चरण में 12 मात्राएँ और दूसरे तथा चौथे चरण में 7 मात्राएँ होती है।
उदा.- 
अवधि शिला का उर पर, था गुरु भार। तिल तिल काट रही थी, दृगजल धार।। (मैथिलीशरण गुप्त)
सुख दुख में जो सम हो, ज्ञान विधान, केवल वही जगत में, सन्त सुजान।।

छप्पय 

इसके पहले चार चरणों में रोला (11+13) तथा दो में उल्लाला (15+13) का योग होता है। पाँचवें छठे चरणों में 26 से 28 मात्राएँ हो सकती हैं।
पृथ्वीराज रासो में इसी छंद का प्रयोग किया गया है।

उदा.- 
नीलांबर परिधान, हरित पट पर सुन्दर हैं
सूर्य चंद्र युग मुकुट, मेखला रत्नाकर हैं
नदियाँ प्रेम प्रवाह, फूल तारे मंडन हैं,
बन्दी जन खग वृन्द, शेष फन सिंहासन है।
करते अभिषेक पर्याद हैं, बलिहारी इस वेश की।
हे मातृभूमि तू सत्य ही, सगुण मूर्ति सर्वेश की।

कुण्डलिया
इसकी पहली दो पंक्तियाँ दोहा छन्द की तथा अन्तिम चार पंक्तियाँ रोला छन्द की होती है।

उदा.- 
दौलत पाय, न कीजिए, सपने हूँ अभिमान। चंचल जल दिन चारि को, ठाँउ न रहत निदान।। ठाँउ न रहत निदान, जियत जग में जस लीजै। मीठे वचन सुनाय, विनय सब ही की कीजै।। कह गिरिधर कविराय, अरे यह सब घट तौलत। पाहुन निसि दिन चारि, रहत सब ही के दौलत।।

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

हिंदी वर्तनी


वर्तनी शिक्षण

 • पारंपरिक रूप से हम जिस प्रक्रिया या व्यवस्था द्वारा भाषा के ध्वन्यात्मक रूप को लिखित रूप देते हैं उसे ̒वर्तनी कहा जाता है।
• मानक उच्चारण में ध्वनियों का जो अनुक्रम होता है, उसी के अनुसार लिखित रूप में वर्णों और अक्षरों का क्रम नियोजन शुद्ध वर्तनी का मुख्य उद्देश्य होता है।
• हिंदी वर्तनी का स्वरूप अक्षरात्मक है। उसमें स्वरों वर्णों के लिपि संकेत तो होते ही है, उनकी मात्राएँ भी प्रयुक्त होती है।
• हिंदी वर्तनी की अशुद्धियों के अनेक कारण है- उच्चारण-भिन्नता से वर्तनीगत व्याघात (Interruption), चिह्नों में एकरूपता का अभाव, लिपि का अपूर्ण ज्ञान, मात्राओं के प्रयोग में असावधानी, शब्द-रचना और अर्थ-भेद की अनभिज्ञता तथा सादृश्य आदि।
• भाषा शिक्षण के अन्तर्गत वर्तनी संबंधी त्रुटियों का निवारण वर्तनी का शुद्ध उच्चारण एवं लेखन अभ्यास करवाकर करना चाहिए।
• वर्तनी ठीक कराने हेतु कक्षा में प्रिंट समृद्ध माहौल का निर्माण करना चाहिए।
 • वर्ण – व्–र–ण = व् -पूर्ण, र -प्रवाह, ण -ध्वनि =अर्थात वर्ण वह तत्व है जिसमें पूर्णता है, ध्वनि है और ध्वनि का प्रवाह है।
• नाभी से लेकर कंठ तक वाणी के मूल केंद्र है। नाभी से ही बालक को गर्भ में पोषण मिलता है।
• आप ‘अ ‘ बोलिए – अब अनुभव करिए कि आपकी नाभी अवश्य हिलती है। यही ‘अकार’ का उद्भव केंद्र है। बिना ‘अकार’ के वर्ण आकार नहीं ले सकते।
• आपके बोलने की चाह करते ही नाभी केंद्र उतेजित होता है और यहीं प्राण वायु के सहारे से क्रमशः कंठ और होठों तक ऊपर जाते हुए स्वरों का स्वरुप ही भाषा और वार्तालाप बनता है।
• अ से अः तक बोलिए तो नाभी से उतेजित वाणी तंत्र क्रमशः कंठ तक जाता है। जो सबसे पहले नाभी पर दबाब पड़ता है। वह ‘कपाल भाती’ का ही रूप है ।
 • अं भ्रामरी का रूप है। अः श्वास को बाहर निकलने का रूप है।
 • जब चन्द्र बिंदु का उच्चारण होता है तो इसकी झंकार की तरंगें मस्तिष्क के स्नायु तंत्र तक जाती हैं।
 • विसर्ग का उच्चारण नाभी क्षेत्र से ही है बिना नाभी का क्षेत्र हिले स्वः नहीं बोला जा सकता है।
• अकार और हकार का संतुलन और संयोजन – अकार में कोमल और हकार में कठोर का निरूपण है। एक बार कोमल और एक बार कठोर है। प्रत्येक वर्ग में पहला वर्ण वाद, दूसरा प्रतिवाद, तीसरा संवाद और चौथा अगति वाद है।

भाषा के विकास में भारतीय और पाश्चात्य विचार

भाषा का विकास • चौम्सकी, वाइगोत्सकी, पियाजे • चौम्सकी का जन्म अमरीका में फिलाडेल्फिया प्रांत के इस्ट ओक लेन में हुआ था। • उनके पिता यूक्रेन में जन्मे श्री विलियम चौम्सकी (1896-1977) थे जो हीब्रू के शिक्षक एवं विद्वान थे। • चौम्सकी ने अपने भाषावैज्ञानिक गुरु श्री हैरिस से उनके द्वारा प्रतिपादित प्रजनक भाषाविज्ञान के ट्रांसफार्मेशन सिद्धांत को सीखा जिसकी बाद में चौम्सकी ने अपनी व्याख्या की और कांटेक्सट फ्री ग्रामर के सिद्धांतों का प्रतिपादन किया। • चौम्सकीय भाषाविज्ञान की शुरुआत उनकी पुस्तक सिंटैक्टिक स्ट्रक्चर्स से हुई मानी जा सकती है जो उनके पीएचडी के शोध, लाजिकल स्ट्रक्चर आफ लिंग्विस्टिक थीयरी (1955, 75) का परिमार्जित रूप था। • इस पुस्तक के द्वारा चौम्सकी ने पूर्व स्थापित संरचनावादी भाषावैज्ञानिकों की मान्यताओं को चुनौती देकर ट्रांसफार्मेशनल ग्रामर की बुनियाद रखी। • इस व्याकरण ने स्थापित किया कि शब्दों के समुच्य का अपना व्याकरण होता है, जिसे औपचारिक व्याकरण द्वारा निरुपित किया जा सकता है और खासकर सन्दर्भमुक्त व्याकरण द्वारा जिसे ट्रांसफार्मेशन के नियमों द्वारा व्याख्यित किया जा सकता है। • उन्होंने माना कि प्रत्येक मानव शिशु में व्याकरण की संरचनाओं का एक अंतर्निहित एवं जन्मजात (आनुवांशिक रूप से) खाका होता है जिसे सार्वभौम व्याकरण की संज्ञा दी गयी। • ऐसा तर्क दिया जाता है कि भाषा के ज्ञान का औपचारिक व्याकरण के द्वारा माडलिंग करने पर भाषा उत्पादकता के बारें में काफी जानकारी इकट्ठा की जा सकती है, जिसके अनुसार व्याकरण के सीमित नियमों द्वारा कैसे असीमित वाक्य निर्माण कैसे संभव हो पाता है। • चौम्सकी ने प्राचीन भारतीय वैय्याकरण पाणिनी के प्राचीन जेनेरेटिव ग्रामर के नियमों के महत्व भी स्वीकृत करते हैं। • चौम्सकी ने अपने प्रिंसिपल्स ऐंड पैरामीटरस का माड्ल अपने पीसा के व्याख्यान के बाद 1979 में विकसित की थी जो बाद में लेक्चर्स आन गवर्नमेंट ऐंड बाइंडिंग के नाम से प्रकाशित हुई। इसमें चौम्सकी ने सार्वभौम व्याकरण के बारे में काफी अकाट्य दावे एवं तर्क पेश किये। • चौम्सकी की भी मान्यता यही रही कि भाषाओं के बीच दिखाई पड़नेवाला फ़र्क उनकी तल संरचनाओं का है. अपने मूल प्रजनन बिन्दु पर ये सभी भाषायें एक ही व्याकरण द्वारा आत्मसातीकृत होती है. • नाइडा ने अपने व्यावहारिक अनुवाद कर्म में चौम्सकी के इस सिद्धान्त का सहारा लिया. वाइगोत्सकी • वाईगोटस्की एक विचारक थे जिन्होंने पूर्व सोवियत संघ के पहले दशकों के दौरान काम किया था। • उनका मानना था कि बच्चे व्यावहारिक अनुभव के माध्यम से सीखते हैं। • उन्होंने दावा किया कि जब कोई बच्चा कोई नया काम सीखने की कगार पर होता है तब वयस्कों द्वारा समय पर और संवेदनशील हस्तक्षेप से बच्चों को नए कार्यों (जिन्हें समीपस्थ विकास का क्षेत्र नाम दिया गया) को सीखने में मदद मिल सकती है। • इस तकनीक को "स्कैफोल्डिंग (मचान बनाना)" कहा जाता है क्योंकि यह नए ज्ञान के साथ बच्चों के पास पहले से मौजूद ज्ञान पर निर्मित होता है जिससे वयस्क बच्चे को सीखने में मदद मिल सकती है। • वाइ़गटस्कि का ध्यान पूरी तरह से बच्चे के विकास की पद्धति का निर्धारण करने में संस्कृति की भूमिका पर केंद्रित था। • उन्होंने तर्क दिया कि बच्चे के सांस्कृतिक विकास में हर कार्य दो बार प्रकट होता है: पहली बार सामाजिक स्तर पर और बाद में व्यक्तिगत स्तर पर। • पहली बार लोगों के बीच (अंतरमनोवैज्ञानिक) और उसके बाद बच्चे के भीतर (अंतरामनोवैज्ञानिक). यह स्वैच्छिक ध्यान, तार्किक स्मृति और अवधारणा निर्माण में समान रूप से लागू होता है। चौम्सकी वाइगोत्सकी पियाजे 1. चौम्सकी भाषा को जन्मजात मानते हैं अर्थात् बच्चे भाषा सीखने की क्षमता के साथ पैदा होते हैं। 2. भाषा अनेक विधाओं से सीखने की कला है। 3. भाषा मस्तिष्क का विकास है। 4. व्यावहारिक या अनौपचारिक व्याकरण (Functional Grammar) का विकास चौमस्की ने किया। 1. वाइगोत्सकी भाषा के सामाजिक अर्थात् सामाजिक अंतःक्रिया स्वरूप पर बल देते हैं। 2. अंतः क्रियाएँ (अंतःवाक्) भाषा का विकास करती हैं। 3. भाषा एवं चिंतन एक-दूसरे से स्वतंत्र रूप से विकसित होते हैं। 4. 1. पियाजे बच्चे के शारीरिक विकास के साथ भाषा के विकास की बात करते हैं। 2. भाषा अनुकरण के माध्यम से सीखी जाती है, वह विचार पर बल देते हैं। भाषा संबंधी भारतीय मत पाणिनि पूर्व भाषा-चिन्तन • प्राचीनतम ग्रंथ ऋग्वेद में अनेक बार 'वाक्' के महत्त्व पर प्रकाश डाला गया है। • भाषाशास्त्र में वाक (स्पीच)-विवेचन एक अत्यंत जटिल विषय है। 'वाक्' वह मूल शक्ति है, जिसे हम सामाजिक सन्दर्भो के माध्यम से भाषा के रूप में ग्रहण करते हैं। • वेद में इसी वाक्-शक्ति की अधिष्ठात्री देवी के रूप में सरस्वती का आह्वान किया गया है, • 'उच्चारण भाषा का प्राणतत्त्व होता है', इसे सभी भाषाविज्ञानी स्वीकार करते हैं। • वेद में शुद्ध उच्चारण को अत्यन्त महत्त्वपूर्ण माना गया है। चूँकि वेद 'अपौरुषेय' है, इसलिए उसका समय निश्चित नहीं है। वेदो के बाद ब्राह्मण ग्रन्थ • ऐतरेय ब्राह्मण में भाषाविज्ञान के दो मुख्य विषयों - भाषा-वर्गीकरण एवं शब्द-अर्थ का विवेचन किया गया है। • वेद-पाठ थोड़ा कठिन है। उसके अध्ययन को सरल बनाने के लिए पदपाठ की रचनाकर 'वेद-वाक्य'को पदों में विभक्त किया गया और इस क्रम में सन्धि, समास, स्वराघात जैसे विषयों का विश्लेषण भी हुआ। • यह निश्चय ही भाषा का वैज्ञानिक अध्ययन था। पदपाठ' के पश्चात् प्रातिशाख्यों एवं शिक्षाग्रन्थों का निर्माण कर ध्वनियों का वर्गीकरण, उच्चारण, स्वराघात, मात्रा आदि अत्यन्त महत्त्वपूर्ण भाषावैज्ञानिक विषयों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला गया। • विभिन्न संहिताओं के उच्चारण-भेदों को सुरक्षित रखने एवं ध्वनि की सूक्ष्मताओं का विवेचन करने में क्रमशः प्रातिशाख्यों और शिक्षाग्रन्थों का अपना विशिष्ट स्थान है। • इसी क्रम में उपनिषदों की चर्चा भी अपेक्षित है - विशेषकर तैत्तिरीय उपनिषद् की। इसमें अक्षर, अथवा वर्ण, स्वर, मात्रा, बल आदि भाषीय तत्त्वों पर भी चिन्तन किया गया है। • वैदिक शब्दों का जो कोश तैयार किया गया, उसे 'निघंटु' की संज्ञा दी गई। इसका निर्माण-काल ८०० ई। पू। के आसपास माना जाता है। • 'निघंटु' में संगृहीत वैदिक शब्दों का अर्थ-विवेचन किया गया 'निरुक्त' में। निरुक्तकार यास्क ने अर्थ के साथ-साथ शब्द-भेद, शब्द-अर्थ का सम्बन्ध जैसे विषयों पर भी विचार किया। पाणिनि और पाणिनिकालीन भाषाशास्त्रीय चिन्तन  पाणिनि और उनकी अष्टाध्यायी • संसार के भाषाविज्ञानियों में पाणिनि (450ईपू) का स्थान सर्वोपरि है। • पाश्चात्य विद्वानों ने भी पाणिनि की श्रेष्टता मुक्तकण्ठ से स्वीकार कर ली है। ईसा के लगभग पांच सौ वर्ष पूर्व ऐसा विलक्ष्ण भाषाविज्ञानी उत्पन्न हुआ था। • पाणिनि का अप्रतिम भाषावैज्ञानिक ग्रन्थ, आठ अध्यायों में विभक्त रहने के कारण, अष्टाध्यायी कहलाता है। • आठों अध्यायों में चार-चार पाद हैं। सम्पूर्ण ग्रन्थ सूत्र रूप में रचित है और कुल सूत्रों की संख्या लगभग चार सहस्र (3997) है। • प्रसिद्ध चौदह माहेश्वर सूत्र ही अष्टाध्यायी के मूलाधार माने गए हैं। • अष्टाध्यायी के आठ अध्यायों में संज्ञा (सुबन्त), क्रिया (तिं अत), समास, कारक, सन्धि, कृत् और तद्धित प्रत्यय, स्वर-ध्वनि-विकार और पद का विवेचन किया गया है। • परिशिष्ट में गणपाठ एवं धातुपाठ देकर ग्रन्थ की उपादेयता और बढ़ा दी गई है। • भाषा में शब्द का प्रयोग निश्चित नियमों के आधार पर ही होना चाहिए. इसी पृष्ठभूमि के संस्कृत के 'कठोर 'वैयाकरण पाणिन ने 'अष्टाध्यायी 'की रचना की. • शब्द के मूल, प्रत्यय और धातु की अवधारणाएं तथा शब्दरूपों के निर्माण की अवधारणा प्रस्तुत करने वाले पहले व्यक्ति पाणिनी थे। • वे पहले व्यक्ति थे जिन्होंने यादॄच्छिक प्रतीकात्मक वर्णनात्मक भाषा का प्रयोग किया। • 'अष्टाध्यायी'की प्रमुख विशेषताएँ हैं : 1. वाक्य को भाषा की मूल इकाई मानना। 2. ध्वनि-उत्पादन-प्रक्रिया का वर्णन एवं ध्वनियों का वर्गीकरण। 3. सुबन्त एवं ति अन्त के रूप में सरल और सटीक पद-विभाग। 4. व्युत्पत्ति - प्रकृति और प्रत्यय के आधार पर शब्दों का विवेचन। पतञ्जलि और उनका महाभाष्य • अबतक सम्पूर्ण संसार में महाभाष्यकार के रूप में प्रतिष्ठित होने का श्रेय केवल पतञ्जलि को है। • महाभाष्य लिखने के मूल में कात्यनीय वार्तिको की प्रेरणा काम करती रही है। • महाभाष्य का अधिकांश भाग कात्यायन द्वारा उठायी गई शंकाओं के समाधान से सम्बद्ध हैं। • पतञ्जलि का मुख्य उद्देश्य उन पाणिनीय सूत्रों को दोषमुक्त सिद्ध करने का रहा है, जो कात्यायन की दृष्टि में या तो दोषमुक्त थे अथवा बहुत उपादेय नहीं थे। • महाभाष्य में कुल 1689 सूत्रों की व्याख्या की गई है। • यद्यपि महाभाष्य का आधार अष्टाध्यायी ही रही है, तथापि इसमें पतञ्जलि ने जनभाषा का जैसा विस्तृत विवेचन किया है, वैसा अन्यत्र दुर्लभ है। • संस्कृत, प्राकृत और अपभ्रंश इन तीनों प्रकार की भाषाओं को ध्यान में रखते हुए उन्होंने भाषा को एक व्यवस्थित स्वरूप प्रदान किया। पाणिनि-पश्चात् का भाषाध्ययन • अष्टाध्यायी की टीका एवं उसकी मौलिक व्याख्या की दृष्टि से क्रमशः काशिका एवं कौमुदी ग्रन्थों का विशिष्ट महत्त्व है। • कौमुदी ग्रन्थों में सिद्धांत कौमुदी (भट्टोजि दिक्षित) एवं लघुकौमुदी प्रसिद्ध हैं। • मण्टनमिश्र प्रसिद्ध भाषाचिन्तक थे। इन्होंने 'स्फोटसिद्धि'नामक ग्रन्थ की रचना की। • भाषाविज्ञान को भृर्तहरि की देन : वाक्यपदीय का महत्त्व पाणिनि-पतञ्जलि-पश्चात् के भाषाशास्त्रियो में वाक्यपदीयकार भृर्तहरि (सातवी शताब्दी) का स्थान अत्युच्च है। • न केवल प्राचीन भाषाशास्त्र की दृष्टि से भृर्तहरि महान है, अपितु आधुनिक भाषाविज्ञानी भी उनके चिन्तन से अत्यधिक प्रभावित हैं। • तीन काण्डों - ब्रह्मकाण्ड, वाक्यकाण्ड और पदकाण्ड में विभक्त वाक्यपदीय भाषाविज्ञान का एक उत्कृष्ट ग्रन्थ है। • अत्यन्त संक्षेप में इस ग्रंथ की विशेषताओं पर निम्नांकित रूपों में प्रकाश डाला जा सकता है : 1. भाषा की इकाई वाक्य ही होता है, चाहे उसका अस्तित्व एक वर्ण के रूप में क्यों न हो। 2. वाशक्ति विश्व-व्यवहार का सर्वप्रमुख आधार है। 3. वाक्-प्रयोग एक मनोवैज्ञानिक क्रिया होता है, जिसमें वक्ता और श्रोता दोनों का होना आवश्यक है। ज्ञातव्य है कि गार्डीनर, जेस्पर्सन एवं चॉम्सकी प्रभृति अधिक चर्चित आधुनिक भाषाविज्ञानी भी इसका पूर्ण समर्थन करते हैं। 4. हर वर्ण में उस के अतिरिक्त भी किञ्चित वर्णांश सम्मिलित रहता है। अमरीकी भाषाविज्ञान ने भी प्रयोग द्वारा इसे सिद्ध करने का सफल प्रयास किया है। भौतिक विज्ञान भी यही बतलाता है। 5. ध्वनि उत्पादन, उच्चारण, ध्वनि-ग्रहण, स्फोट आदि का विस्तृत विवेचन भर्तृहरि ने किया है। भाषाविज्ञान के ये प्रमुख विषय हैं। 6. भर्तृहरि अर्थग्रहण में लोक प्रसिद्ध को ही महत्त्व देते हैं। पतञ्जलि के बाद इन्होंने ही इस पर विशद रूप से विचार किया है। 7. भर्तृहरि ने शिष्ट भाषा के साथ-साथ लोक भाषा के अध्ययन पर भी बहुत बल दिया है। यही प्रवृति आज सम्पूर्ण विश्व मे दिखाई पड़ती है। इस प्रकार, भर्तृहरि के भाषा सिद्धांत अत्यन्त व्यापक अथच पूर्ण वैज्ञानिक हैं। 8. भर्तृहरि ने शब्द के व्युत्पत्तिमूलक अर्थ की कमियों को रेखांकित किया. दरसल शब्द का स्वयं का कोई यथार्थ नहीं होता, बल्कि उसके अर्थ का सम्बन्ध पाठ के द्वारा निर्धारित सन्दर्भ और अन्य शब्दों की पूर्वापरता से नि:सृत होता है. भर्तृहरि ने भाषा की आन्तरिक संरचना को सार्वभौम माना.

CTET भाषा के महत्वपूर्ण बिंदू


भाषा की परिभाषाएँ
 महर्षि पतंजलि के मतानुसार- व्यक्ता वाचि वर्णों येषां त इसे व्यक्तवाचः कहने का भाव है कि वर्णों में व्यक्त होने वाली वाणी ही भाषा है।
 भर्तृहरि- भाषा यथार्थ को गढ़ती है (यानी पहले से ही मौजूद किसी यथार्थ को महज उद्घाटित भर नहीं करती।
 आचार्य दंड़ी- यह सृष्टि अंधकार में डूब गई होती, यदि भाषारूपी प्रकाश का अभ्युदय न हुआ होता।
 कामाता प्रसाद गुरू- भाषा वह साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचार दूसरों पर भली-भाँति प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार आप स्पष्टतया समझ सकता है।
 भोलानाथ तिवारी- भाषा उच्चारण अवयवों से उच्चारित स्वेच्छाचारी ध्वनि प्रतीकों की वह अवस्था है जिसके द्वारा एक समाज के लोग आपस में भावों और विचारों का आदान-प्रदान करते हैं।
 बाबूराम सक्सेना- भाषा से तात्पर्य, विचारों एवं भावों का व्यक्तिकरण प्रमुख रूप से स्रोत, ग्राह्य ध्वनि चिह्नों से प्रमाणित होता है।
 डॉ श्यामसुन्दर दास- मनुष्य और मनुष्य के बीच वस्तुओं के विषय में अपनी इच्छा और मति का आदान-प्रदान करने के लिए व्यक्त ध्वनि संकेतों का जो व्यवहार होता है, उसे भाषा कहते हैं। पाश्चात्य मत
 मैक्स मूलर- भाषा और कुछ नहीं, केवल मानव की चतुर बुद्धि द्वारा आविष्कृत एक ऐसा उपाय है, जिसकी सहायता से हम अपने विचार सुगमता और तत्परता से प्रकट कर सकते हैं।
 प्लेटो- विचार आत्मा की मूक या ध्वनि-हीन बातचीत है पर वही जब ध्वनि के रूप में होठों द्वारा प्रकट होती है, तो उसे भाषा कहते है।
 प्लेटो ने धातु या रणन का सिद्धांत दिया, जिसे मैक्समूलर ने फिर से आख्यात करते हुए बताया है कि शब्द और अर्थ के अन्तर्गत नैसंगिक एवं रहस्यात्मक संबंध होती है, ध्वनियाँ सुनकर ही यह कहा जा सकता है कि अमुक ध्वनि अमुक वस्तु कही है- उदा- पेड़ से पत्ता नीचे गिरा। इस गिरने की पत्त ध्वनि से पत्ता शब्द का निर्माण हुआ।  पियाजे- भाषा अन्य संज्ञानात्मक तंत्रों की भाँति परिवेश के साथ अंतःक्रिया के माध्यम से ही विकसित होती है।  क्रोंच- भाषा अभिव्यक्ति की दृष्टि से उच्चरित एवं सीमित ध्वनियों का संगठन है।
 चॉम्सकी- भाषिक क्षमता जन्मजात होती है, वरना भाषिक व्यवस्था को सीखने की प्रक्रिया संभव ही नहीं होती। वे मानते हैं कि भाषा सीखे जाने के काम में, वैज्ञानिक पड़ताल भी साथ-साथ चलती रहती है।  वाइगोत्सकी- बच्चे की भाषा समाज के साथ संपर्क का ही परिणाम है साथ ही बच्चा अपनी भाषा के विकास के दौरान दो तरह की बोली बोलता है- पहला आत्मकेन्द्रित और दूसरी सामाजिक।
 स्वीट- ध्वन्यात्मक शब्दों के द्वारा विचारों को प्रकट करना ही भाषा है।
 फ्रांसिसी विद्वान रूसो के अनुसार मनुष्य ने ही भाषा को जन्म दिया है।
 ब्लाक और ट्रैगर- भाषा यादृच्छिक ध्वनि-प्रतीकों की वह व्यवस्था है जिसकी सहायता से कोई सामाजिक वर्ग आपस में सहयोग करता है।
 कैंब्रिज इन्साइक्लोपीडिया ऑफ लैंग्वेज की मानें तो दुनिया में 6326 भाषाएँ मौजूद हैं।
 भाषा का अभिलक्षण
• भाषा पैतृक संपत्ति नहीं है।
• भाषा नियमबद्ध व्यवस्था है।
• भाषा अर्जित संपत्ति है।
• भाषा सामाजिक वस्तु है।
• भाषा का अर्जन अनुकरण के माध्यम से होता है।
• भाषा निरंतर परिवर्तनशील है।
• प्रत्येक भाषा की भौगोलिक सीमा होती है।
• भाषा का प्रवाह जटिलता से सरलता की ओर होता है।
• भाषा संप्रेषण का सर्वोतम माध्यम है।
• भाषा सर्वव्यापक है।
• भाषा व्याकरण सम्मत तथा शुद्ध होती है।
• भाषा गद्यात्मक होती है। • भाषा में एकरूपता की विशेषता भी होती है।
• भाषा के मौखिक और लिखित रूपों में भी एकरूपता व समानता होती है। जो शब्द रूप उच्चरित किया जाता है उसकी वर्तनी भी व्याकरणिक नियमों के अनुसार एक तथा निश्चित होती है।
• भाषा ध्वनियों, शब्दों, वाक्यों आदि का समूह है।
• भाषा के विविध प्रयोगों से ही भाषा कि विविध कुशलताएँ आती हैं।
• बच्चे विद्यालयी शिक्षा की शुरुआत से पहले ही भाषा की जटिलताओं और नियमों को आत्मसात कर पूर्ण भाषिक क्षमता रखते हैं।
• भाषाएँ एक प्रकार से स्मृतिकोश का भी काम करती हैं।
• भाषाएँ सामाजिक-साँस्कृतिक रूप से बनती हैं।
• भाषा संस्कृति और संस्कारों की संवाहिका होती है।
• संयुक्त परिवार में बच्चे का भाषिक विकास बेहतर बनता है।
• भाषा सोचने, महसूस करने और चीजों से जुड़ने का उत्तम साधन है।
• भाषा को सीखने के लिए समृद्ध भाषिक वातावरण होना चाहिए।
• भाषा अध्ययन में मुख्य तत्व उच्चारण की स्पष्टता है।
• भाषा संरचना के प्रमुख तीन अंग है- 1. उच्चारण, 2. रचना, 3. अर्थ।
• भाषा सीखने में जो त्रुटियाँ होती हैं वे सीखने की प्रक्रिया का स्वाभाविक हिस्सा होती हैं, जो समय के साथ दूर होने लगती हैं। बच्चे की त्रुटियाँ अध्यापक को मदद करती हैं कि कोई बच्चा कैसे सीखता है।
• भाषा जीवन की विभिन्न स्थितियों को साधती है।
 • भाषा की कक्षा में यह जरूरी है कि भाषिक पृष्ठभूमि पर किसी को पीछे न छोड़ा जाए।
 • प्रत्येक कक्षा भाषा की कक्षा होती है।
 • भाषा में चार विशेषताएँ होना आवश्यक है- स्वायत्तता, मानकीकरण, ऐतिहासिकता, जीवंतता।
• भाषा का प्रमुख गुण है – बोद्धात्मकता, सरलता, सहजता, सप्राणता, व्याकरण समतता, परवर्तनशीलता आदि। • भाषा की जड़ मनुष्य की वाणी है, जिससे भाषा वकिसत हुई है।
• एक भाषा के अंतर्गत कई बोलियाँ हो सकती हैं। लेकिन किसी बोली के अन्तर्गत एक या अधिक भाषाएँ नहीं हो सकती।
• भाषा समाज सापेक्ष होती है अर्थात् यह उसी में बोली-समझी जाती है। व्यक्ति सापेक्ष नहीं।
• तर्कसंगत चिंतन का शिक्षण, भाषा-शिक्षण का आवश्यक अंग है।
• उचित स्वराघात, अनुतान, गति, यति, लय और प्रवाह आदि को ध्यान में रखने पर भाषा की जीवंतता आ जाती है।
• भाषा का रूप मानक है और बोली व्यवहारिक। हिंदी खड़ी बोली का मानक रूप है।
• मानकीकरण का अर्थ- किसी वस्तु के मनमाने ढंग से प्रयोग की प्रवृत्ति को रोककर, या कहें नियंत्रित कर अनुकरणयोग्य आदर्श स्थिति में लाने के लिए उसके विविध रूपों में आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर समान अभिलक्षणों से युक्त करना मानकीकरण कहलाएगा। (केंद्रीय हिंदी निदेशालय)
• मानक स्वर के आविष्कार का श्रेय लंदन विश्वविद्यालय के भाषा-विज्ञान विभाग के प्रोफ़ेसर सर डेनियल जोंस तथा उनके सहयोगियों को है।
• सन् 1966 में शिक्षा मंत्रालय ने मानक देवनागरी वर्णमाला प्रकाशित की जिसे बाद में पुस्तक रूप में भी प्रकाशित किया गया पुस्तक का नाम था- परिवर्धित देवनागरी वर्णमाला। • सन् 1967 में हिंदी वर्तनी का मानकीकरण नाम से पुस्तक प्रकाशित हुई।
• सन् 1983 में देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण नाम से पुस्तक प्रकाशित हुई।
• आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी तथा अन्य आचार्यों ने हिंदी भाषा और उसकी लिपि तथा वर्तनी के मानकीकरण के क्षेत्र में कार्य किया।
• बालक की भाषा तभी प्रभावशाली और सुव्यवस्थित होती है जब वह मानक भाषा का प्रयोग करता है।
• संप्रेषक (वक्ता)-संदेश-माध्यम-श्रोता-परिणाम-प्रतिपुष्टि (संचार प्रक्रिया)
• मैकलुहान- माध्यम ही संदेश है। माध्यम- (संकेत, चिह्न, भाषा, इशारा) • दुनिया को ठीक से समझने एवं अच्छे सम्बन्ध स्थापित करने हेतु कम से कम आठ भाषाओं का ज्ञान आवश्यक है- रशियन, चाइनीज,जापानी, स्पेनिस, जर्मन, अंग्रेजी, अरबी, फ्रांसीसी है।
• अगर दो भाषाओं के संकेतकों के मध्य किसी भी प्रकार की समतुल्यता सम्भव नही है तो मानव ज्ञान का प्रसार और विकास नहीं हो सकता था.  अनौपचारिक भाषा • माता-पिता • घर-परिवार • परिवेश • पड़ोस • समाज • जनसंचार के माध्यम
  औपचारिक भाषा • क्षेत्र के पढ़े-लिखे समाज द्वारा स्वीकृत भाषा।
  भाषा के रूप
 • मौखिक को वाचिक भी कहते हैं। (असल रूप) • लिखित • आंगिक (बैनन, नैनन, शैनन) • यांत्रिक (रेडियो, टीवी, कंप्यूटर...)
  राजभाषा • सरकारी कामकाज के लिए प्रयुक्त भाषा अंग्रेजी में इसे Official Language कहते हैं। • अध्याय 17, अनुच्छेद- 343 की अष्टम अनुसूची में। • संविधान का अनुच्छेद 343 (1) में देवनागरी लिपि में लिखी हिंदी को संघ की राजभाषा का दर्जा दिया गया।
• इसी अनुच्छेद के खंड (2) में फिर कहा गया है कि संविधान के लागू होने के 15 वर्ष की अवधि तक सरकारी प्रयोजनों के लिए अंग्रेजी के प्रयोग की छूट रही।
• संविधान की अष्टम अनुसूची में भारत की 18 प्रमुख भाषाओं की स्थान मिला- असमिया, उड़िया, बंगाली, गुजराती, मराठी, उर्दू, कश्मीरी, पंजाबी, हिन्दी, कन्नड़, तेलुगु, तमिल, मलयालम, संस्कृत, सिंधी, मणिपुरी, नेपाली, कोंकणी।
• वर्तमान में यह भाषाएँ 22 हो गई हैं- डोगरी, संथाली, मैथिली, बोडो, 18+4= 22
• संविधान सभा के अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा- आज पहली बार हम अपने संविधान में एक भाषा स्वीकार कर रहे हैं, जो भारत संघ को प्रशासन की भाषा होगी...
  राष्ट्रभाषा • समूचे राष्ट्र को भावात्मक एकता के सूत्र में बांध सकती है। इसे निम्नलिखित नामों से भी जाना जाता है। • National Language, • Lingua franca (लिंग्वा फ्रान्का) • लोकभाषा
  राज्यभाषा • किसी प्रदेश की राज्य सरकार द्वार उस राज्य के अंतर्गत प्रशासनिक कार्यों को संपन्न करने के लिए जिस भाषा का प्रयोग किया जाता है। • राज्य की विधानसभाएँ बहुमत के आधार पर एक भाषा को या अधिक भाषाओं को राज्य भाषा घोषित कर सकती है। • जम्मू कश्मीर – कश्मीरी / डोगरी • त्रिपुरा - बंगला / अंग्रजी • उत्तर प्रदेश - हिन्दी / उर्दू • त्रिपुरा - बंगला / अंग्रेजी • सिक्कीम - नेपाली / अंग्रेजी • गोवा - कोंकणी • गुजरात - गुजराती • महाराष्ट्र - मराठी • पंजाब - पंजाबी • आंध्र प्रदेश - तेलुगु • तमिलनाडु - तमिल • कर्नाटक - कन्नड • केरल - मलयालम • नागालैंड , मेघालय, अरूणाचल प्रदेश, मिजोरम - अंग्रेजी
  मातृभाषा • औपचारिक शिक्षा में मातृभाषा का तात्पर्य किसी क्षेत्र विशेष की भाषा से होता है, जिसके माध्यम से उस क्षेत्र का पढ़ा लिखा समाज विचार-विनिमय करता है।
• घर की बोली को माता की बोली तथा समाज द्वारा स्वीकृत भाषा को मातृभाषा कहते हैं।
 • मातृभाषा बच्चे के ज्ञान के विकास में सहायक है। • मातृभाषा विचार-विनिमय और शिक्षा ग्रहण करने का सर्वश्रेष्ठ माध्यम है।
• मातृभाषा में ही बच्चे का मस्तिष्क सबसे पहले क्रियाशील होता है।
• प्राथमिक स्तर पर शिक्षा का माध्यम मातृभाषा होना चाहिए।
• अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फ़रवरी को मनाया जाता है। 17 नवंबर, 1999 को यूनेस्को ने इसे स्वीकृति दी। • इस दिवस को मनाने का उद्देश्य है कि विश्व में भाषाई एवँ सांस्कृतिक विविधता और बहुभाषिता को बढ़ावा मिले।
• अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस स्मारक, आशफिल्ड पार्क , सिडनी, ऑस्ट्रेलिया ।
 • लिन्ग्गुआपाक्स पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस के अवसर पर प्रतिवर्ष प्रस्तुत किया जाता है।
• विश्व में विगत 40 वर्षों में लगभग 150 अध्ययनों के निष्कर्ष हैं कि मातृभाषा में ही शिक्षा होनी चाहिए।
• इजरायल के 16 विद्वानों ने नोबल पुरस्कार प्राप्त किए है। सभी ने अपनी मातृभाषा हीब्रू में ही कार्य किया है।
• पूर्व राष्ट्रपति डॉ अब्दुल कलाम ने स्वयं के अनुभव के आधार पर कहा है कि ‘‘मैं अच्छा वैज्ञानिक इसलिए बना, क्योंकि मैंने गणित और विज्ञान की शिक्षा मातृभाषा में प्राप्त की (धरमपेठ कॉलेज नागपुर)।’’
• रविन्द्र नाथ ठाकुर ने कहा है:- ‘‘ यदि विज्ञान को जन-सुलभ बनाना है तो मातृभाषा के माध्यम से विज्ञान की शिक्षा दी जानी चाहिए।’’
• महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा हैः-‘‘ बच्चों के मानसिक विकास के लिए मातृभाषा उतनी ही आवश्यक है जितना शारीरिक विकास के लिए माँ का दूध’’
 त्रिभाषा
• त्रिभाषा सूत्र संविधान में नहीं है। सन् 1956 में अखिल भारतीय शिक्षा परिषद् ने इसे मूल रूप में अपनी संस्तुति के रूप में मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में रखा था और मुख्यमंत्रियों ने इसका अनुमोदन भी कर दिया था।
 • 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में इसका समर्थन किया गया था और सन् 1968 में ही पुन: अनुमोदित कर दिया गया था। • सन् 1992 में संसद ने इसके कार्यान्वयन की संस्तुति कर दी थी।
• यह संस्तुति राज्यों के लिए बाध्यता मूलक नहीं थी क्योंकि शिक्षा राज्यों का विषय है।
• सन् 2000 में यह देखा गया कि कुछ राज्यों में हिन्दी और अंग्रेजी के अतिरिक्त इच्छानुसार संस्कृत, अरबी, फ्रेंच, तथा पोर्चुगीज भी पढ़ाई जाती हैं।
• त्रिभाषा सूत्र में 1-शास्त्रीय भाषाएं जैसे संस्कृत, अरबी,फारसी। 2-राष्ट्रीय भाषाएं (22) 3-आधुनिक यूरोपीय भाषाएं हैं (अंग्रेजी) • इन तीनों श्रेणियों में किन्हीं तीन भाषाओं को पढ़ाने का प्रस्ताव है। संस्तुति यह भी है कि हिन्दी भाषी राज्यों में दक्षिण की कोई भाषा पढ़ाई जानी चाहिए। लेकिन ऐसा हो नहीं रहा है।

kavya sastra


काव्यशास्त्र डॉ. नीरज भारद्वाज
काल–विभाजनः- भारतीय काव्यशास्त्र के विकास का इतिहास 500 वर्ष ईसा पूर्व से अठारहवी शताब्दी तक, लगभग दो हजार वर्षों तक फैला हुआ है। विद्वानों ने इस काल का विभाजन विभिन्न तर्कों के आधार पर कई तरह से किया है। लेकिन अधिकांश विद्वानों के अनुसार इसे निम्नलिखित चार भागों में बाँटा गया हैः-
 1. आदिकाल या प्रारंभिक काल-(अज्ञातकाल से छठवीं शताब्दी अर्थात् आचार्य भामह तक।)
 2. रचना काल- छठवीं शताब्दी से आठवीं शताब्दी तक (आचार्य भामह से आचार्य आनन्दवर्धन तक)
 3. निर्णयात्मक काल- आठवीं शताब्दी से दसवीं शताब्दी तक (आचार्य आनन्दवर्धन से आचार्य मम्मट तक)
 4. व्याख्या काल- दसवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक (आचार्य मम्मट से आचार्य विश्वेश्वर पण्डित तक) 1.आदिकाल या प्रारंभिक कालः- इस काल में मुख्य रूप से दो ही आचार्य दिखते हैं- आचार्य भरत और आचार्य भामह, यदि निरुक्तकार महर्षि यास्क या वैय्याकरण महर्षि पाणिनी आदि को छोड़ दिया जाय। क्योंकि इनकी विवेचना केवल उपमा अलंकार तक ही सीमित है। आचार्य भरत का एकमात्र ग्रन्थ नाट्यशास्त्र मिलता है, जिसमें नाटक के विभिन्न अंगों और रसों पर ही विस्तार से विचार किया गया है। काव्यशास्त्र के दृष्टिकोण से नाट्यशास्त्र के केवल 16वें अध्याय में काव्य के गुण-दोषों और अलंकारों पर प्रकाश डाला गया है। इसमें केवल चार अलंकारों, दस गुणों और दस ही दोषों का उल्लेख मिलता है। अतएव इस ग्रंथ में काव्यशास्त्र के बीज मात्र ही दिखायी पड़ते हैं। आचार्य भरत के बाद इस परम्परा में रुद्र आदि आचार्यों के नाम आते है, जिन्होंने नाट्यशास्त्र पर टीकाएँ लिखीं हैं, किन्तु दुर्भाग्य की बात है कि उनके ग्रंथ अनुपलब्ध हैं। यदि व्यापक दृष्टि से देखा जाय तो आचार्य भामह काव्यशास्त्र के प्रथम आचार्य हैं, और उनका काव्यालंकार इस विद्या का प्रथम मुख्य ग्रंथ है। इसमें नाट्यशास्त्र में वर्णित चार अलंकारों के सथान पर 38 अलंकारों का निरूपण किया गया है।
2.रचनात्मक काल- आचार्य भामह से आचार्य आनन्दवर्धन तक 200 वर्षों का यह काल है। इस काल में काव्यशास्त्र मुख्य चार वाद या सम्प्रदाय- अलंकार सम्प्रदाय, रीति सम्प्रदाय, रस सम्प्रदाय और ध्वनि सम्प्रदाय के मूल ग्रंथों का प्रणयन हुआ। सम्प्रदाय सहित उनके आचार्यों का विवरण नीचे दिया जा रहा है-
1. अलंकार सम्प्रदाय- आचार्य भामह, उद्भट और रूद्रट।
2. रीति सम्प्रदाय- आचार्य दण्डी और वामन।
3. रस सम्प्रदाय- आचार्य लोल्लट, शंकुक और भट्टनायक आदि।
4. ध्वनि सम्प्रदाय- आचार्य आनन्दवर्धन। इस काल को काव्यशास्त्र के विकास का काल कहा जा सकता है। इस काल में काव्य के अलंकारों, रीतियों गुणों आदि का निरूपण किया गया । आचार्य भरत के नाट्यशास्त्र में प्रतिपादित ‘रससूत्र’ पर टीकाएं लिखकर आचार्य लोल्लट, शंकुक, भट्टनायक आदि ने रस सिद्धान्त की प्रतिष्ठा की। आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा ध्वनि-सम्प्रदाय की स्थापना की गयी।
3.निर्णयात्मक कालः- इस काल के प्रमुख आचार्य अभिनवगुप्त, कुंतक, महिमभट्ट आदि हैं। आचार्य अभिनवगुप्त ने ध्वन्यालोक पर प्रसिद्ध लोचन टीका लिखी। अन्यथा ध्वनि के आलोक को अर्थात् ध्वन्यालोककार आचार्य आनन्दवर्धन द्वारा प्रतिपादित ध्वनि-सिद्धांत को बिना लोचन (टीका) द्वारा समझना कठिन होता। इसके अतिरिक्त उन्होंने आचार्य भरत द्वारा प्रणीत नाट्यशास्त्र पर भी अभिनव-भारती नामक प्रसिद्ध टीका लिखी। आचार्य कुंतक ने वक्रोक्तिजीवित नामक उत्कृष्ट ग्रंथ लिखकर वक्रोक्ति-सम्प्रदाय की स्थापना की। आचार्य महिमभट्ट नैय्यायिक हैं और इन्होंने व्यक्तिविवेक नामक ग्रंथ लिखा है। इस ग्रंथ में ध्वनि-सिद्धांत का बड़ी कट्टरता से विरोध करते हुए न्यायांतर्गत अनुमान द्वारा सिद्ध करने का प्रयत्न किया गया है।
4.व्याख्या कालः- साहित्यशास्त्र के लिए यह काल बहुत ही महत्वपूर्ण है। यह आचार्य मम्मट से लेकर आचार्य विश्वेश्वर पण्डित तक अर्थात् दसवीं शताब्दी से अठारहवीं शताब्दी तक विस्तृत है। इस काल में अनेक आचार्य हुए हैं। इनमें आचार्य हेमचन्द्र,विश्वनाथ, जयदेव, शारदातनय, शिङ्गभूपाल, भानुदन्त, गौडीय वैष्णव आचार्य रूपगोस्वामी आदि हैं। इसके अतिरिक्त कवि शिक्षा के क्षेत्र में ग्रंथों का निर्माण करने वाले राजशेखर, क्षेमेन्द्र, अमरचन्द्र आदि आचार्यों के नाम उल्लेखनीय हैं। इसी काल में आचार्य क्षेमेन्द्र ने ‘औचित्य विचार चर्चा’ नामक ग्रंथ लिखकर ‘औचित्यवाद’ की स्थापना की। इस काल के आचार्यों के योगदान को देखते हुए विभिन्न सम्प्रदायों के अनुयायी के रूप में उन्हें निम्नवत् प्रदर्शित किया जा सकता हैः-
1. रस सम्प्रदाय- शारदातनय, शिङ्गभूपाल, भानुदन्त, रुपगोस्वामी आदि आचार्य।
2. अलंकार सम्प्रदाय- पण्डितराज जगन्नाथ, विश्वेश्वर पण्डित आदि आचार्य।
3. ध्वनि सम्प्रदाय- मम्मट, रुय्यक, विश्वनाथ, हेमचन्द्र, विद्याधर, विद्यानाथ, जयदेव, अप्पयदीक्षित आदि।
4. औचित्य सम्प्रदाय- आचार्य क्षेमेन्द्र।
5. कवि शिक्षा- राजशेखर, क्षेमेन्द्र, अरिसिंह, अमरचन्द्र, देवेश्वर आदि आचार्य।
कुछ अन्य साहित्यशास्त्र की दो हजार वर्ष की यात्रा के निम्नलिखित तीन पड़ाव मानते हैं-
1. पू्र्वध्वनिक कालः- अज्ञातकाल से आचार्य आनन्दवर्धन तक।
 2. ध्वनिकाल- आचार्य आनन्दवर्धन से आचार्य मम्मट तक।
 3. ध्वन्योत्तर काल- आचार्य मम्मट से पण्डितराज जगन्नाथ तक। उक्त वर्गीकरण के पीछे विद्वानों द्वारा ध्वनि सिद्धांत को इस यात्रा का मील का पत्थर मानना है।
 आचार्य ग्रंथ भरत नाट्यशास्त्र भामह काव्यालंकार दण्डी काव्यादर्श वामन काव्यालंकारसूत्रवृत्ति रूद्रट काव्यालंकार आनंदवर्द्धन ध्वन्यालोक अभिनवगुप्त ध्वन्यालोक की लोचन टीका और अभिनव भारती आचार्य राजशेखर काव्यमीमांशा कुंतक वक्रोक्तिजीवित्तम् महिम भट्ट व्यक्तिविवेक भोजराज सरस्वती कंठाभरण एवं श्रृंगारप्रकाश मम्मट काव्यप्रकाश, अग्निपुराण विश्वनाथ साहित्यदर्पण पंडित जगन्नाथ रसगंगाधर • भारतीय काव्यशास्त्र का विधिवत् चिंतन भरतमुनि के नाट्यशास्त्र से आरंभ होता है। • आचार्य भरत ने स्वयं भी काव्यशास्त्र का स्वतंत्र चिंतन नहीं किया है। उन्होंने व्यवस्थित रूप से नाटक या रूपक का वर्णन किया है। प्रसंगवश काव्यशास्त्र के विषय उनके नाट्यशास्त्र में घुल मिल गए। • वर्तमान समय में उपलब्ध नाट्यशास्त्र में 36 अध्याय तथा 5000 से अधिक श्लोक हैं। • काव्यशास्त्र का कोई भी अध्ययन नाट्यशास्त्र से ही आरंभ होता है। रस, छंद और अलंकार का उद्भव इसी ग्रंथ से है।
• भरतमुनि के रस सूत्र तत्रविभावानुभावव्यभिचारिसंयोगाद्रसनिष्पितः नाट्यशास्त्र के छठे अध्याय में यह सूत्र दिया गया है। • भरतमुनि के रस सूत्र मे रस के अतिरिक्त 5 शब्द हैं- 1.विभाव, 2.अनुभाव, 3. संचारी भाव, 4. संयोग, 5.निष्पत्ति। • भरत के अनुसार संयोग का अर्थ संसर्ग है और निष्पत्ति का अर्थ नवरूप प्राप्ति होता है। • भरतमुनि के अतिरिक्त विद्वानों ने संयोग और निष्पति पर जो विचार प्रकट हुए उनमें भट्टलोल्लट –उत्पत्तिवाद, शंकुक -अनुमतिवाद, भट्टनायक –भुक्तिवाद, अभिनवगुप्त –अभिव्यक्तिवाद कहलाते हैं। • भट्टलोल्लट (उत्पत्तिवाद) के अनुसार संयोग का अर्थ कारण-कार्य-संबंध तथा निष्पत्ति का अर्थ उत्पत्ति है। • लोल्लट ने कारण-कार्य संबंध का उल्लेख तीन संदर्भों में किया- • 1. विभाव और स्थायी भाव में उत्पाद्य-उत्पादक संबंध होता है। 2. अनुभाव और स्थायीभाव में बोधक-बोध्य संबंध होता है। 3. स्थायी भाव और व्यभिचारी भाव में पोष्यं-पोषक संबंध होता है। • इस दृष्टि से लोल्लट ने रस-प्रक्रिया के तीन स्तर बताए 1. उत्पत्ति ( अर्थात् उत्पत्तिवाद- मूल नायक में रस उत्पन्न होने के कारण 2. प्रतीति (अर्थात् आरोपवाद- नट में रस की प्रतीति के कारण) 3. पुष्टि या उपचिति (अर्थात् चमत्कारवाद- प्रेक्षक अर्थात् देखने वाला के हृदय में चमत्कारपूर्ण अनुभूति के कारण) • लोल्लट की दृष्टि भरत की तरह यथार्थवादी है। वह प्रेक्षक के भाव की चर्चा नहीं करते हैं और उसकी आनंदानुभूति की बात कह देते हैं। • शंकुक (अनुमितिवाद) शंकुक का मत अनुमितिवाद कहलाता है। शंकुक ने निष्पत्ति का अर्थ अनुमिति किया है। वे मानते हैं कि रस मूल रूप में मुख्य (रामादि) पात्र में निहित रहता है नट तो उसका अनुकरण करता है। इसीलिए रसनिष्पत्ति अनुकरण है। • स्थायी भाव वास्तव में रामादि अनुकार्य में रहता है और नट इसका अपने कौशल से अनुकरण करता है, जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि नट स्थायी भाव का अनुभव कर रहा है। • स्थायी भाव का यह अनुकरण ही रस कहलाता है। • शंकुक के मत को रस सिद्धांत का पहला दार्शनिक चिंतन कहा जाता है। • भट्टनायक (भुक्तिवाद) इन्होंने संयोगात् का अर्थ भोज्य-भोजक संबंधात् तथा निष्पत्ति का अर्थ भुक्ति किया। • इनके मत का मूल है कि काव्य की संरचना तथा उसके आस्वादन में तीन शक्तियाँ प्रमुख हैं- अभिधा, भावकत्व और भोजकत्व। काव्यरस में प्रथम दो महत्वपूर्ण हैं। • अभिधा व्यापार द्वारा काव्य के अर्थ का बोध होता है। • भावकत्व व्यापार द्वारा विभावादि का साधारणीकरण होता है। • भोजकत्व व्यापरा द्वारा सामाजिक साधारणीकृत विभावादि के पश्चात साधारणीकृत स्थायी भाव का भोग रस रूप में करता है। • भट्टनायक ने ही रस को आस्वाद्य न कहकर आस्वाद बताया तथा साधारणीकरण के सिद्धांत की स्थापना की। • अभिनवगुप्त (अभिव्यक्तिवाद) ये शैवाद्वैत दर्शन या प्रत्यभिज्ञा दर्शन के प्रकांड पंडित थे। इनके अनुसार संयोग का अर्थ व्यंजना और निष्पत्ति का अर्थ अभिव्यक्ति है। • नाटक अथवा काव्य के उपकरणों द्वारा साधारणीकृत होकर देशकाल, स्व-पर, व्यक्तिगत रागद्वेष आदि की चेतना से मुक्त होकर रत्यादि भाव आस्वाद्य अथवा सुखमय प्रतीति के विषय बन जाते हैं। यह आस्वाद्य भाव और उसकी प्रतीति ही रस है। • सफल अभिनय से सहृदय दर्शक तन्मय होते हैं और उन्हें ब्रह्मानन्द सहोदर अखण्ड रस का आनंद प्राप्त होता है। • इनका विवेचन अद्वैतवाद पर आधारित है। वह रस निष्पत्ति को आत्मा के क्षेत्र का विषय मानते हैं। • आचार्य भरत ने रस के आठ भेद माने। • भरत के अनुसार- 1. श्रृंगार रस से हास्य रस, 2. रौद्र रस से करुण रस 3. वीर रस से अद्भुत रस 4. बीभत्स रस से भयानक रस  धनंजय आदि आचार्य चार मौलिक मनः सेवेगों के आधार पर मूल चार रस मानते हैं। चित्त की चार अवस्थाएँ- विकास, विस्तार, विक्षोभ एवं विक्षेप।  आचार्य उद्भट ने अपनी कृति काव्यालंकारसारसंग्रह में शांत रस को जोड़ा और नव रस की स्थापना की।  आचार्य विश्वनाथ ने अपनी कृति साहित्यदर्पण में वात्सल्य रस के बारे में कहा।  एक रसवाद को मानने वाले विचारक भी हैं- 1. भवभूति ने करुण रस को एक मात्र माना है। 2. आचार्य अभिनवगुप्त ने अपनी कृति अभिनव भारती में शांत रस को माना है। 3. आचार्य भोजराज ने श्रृंगार रस को माना है। उन्होंने इसे रस राज भी कहा है। 4. वैष्णव भक्तों ने भक्ति रस माना है। रस के अन्य चिंतक आचार्य धनंजय, धनिक, महिम भट्ट, मम्मट और पंडित जगन्नाथ प्रमुख हैं। • धनंजय और धनिक इस की स्थिति सहृदयगत मानते हैं और स्वीकार करते हैं कि सहृदयगत स्थायीभाव ही रसत्व को प्राप्त होता है। वे केवल व्यंजना को स्वीकार नहीं करते हैं वे भट्ट नायक की भाँति संयोग का अर्थ भाव-भावक संबंध तथा निष्पत्ति का अर्थ भावित होना मानते हैं। • महिम भट्ट भी रस के स्वरूप के विषय में अभिनव के मत का ही समर्थन करते हैं। वह रस की स्थिति सहृदय में मानते हैं परन्तु निष्पत्ति का अर्थ अनुमति और संयोग का अर्थ अनुमाष्य-अनुमाषक संबंध बताते हैं। • मम्मट और जगन्नाथ ने भी अभिनव गुप्त के मत का स्वीकार किया रस के कारण  स्थायी भाव मानव मन की समस्त दशाएँ एवं वृत्तियाँ भाव कही जाती है। आचार्य भरत के मतानुसार- भाव के बिना रस और रस के बिना भाव की स्थिति संभव नहीं है। भाव के दो प्रकार माने जाते हैं- 1. स्थायी भाव, 2. अस्थायी भाव। 1. स्थायी भाव- सहृदय के हृदय में जो मनोविकार वासना रूप में सदैव विद्यमान रहते हैं तथा जिन्हें कोई अन्य भाव दबा नहीं सकता उन्हें स्थायी भाव कहते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो जो स्थिति चिरकाल (लंबे समय तक) बनी रहे। स्थायी भावों की संख्या नौ मानी गई है। रस के भेद क्र.सं. स्थायी भाव रस रंग देवता 1 रति श्रृंगार रस हरा विष्णु 2 हास हास्य रस सफेद शिवगण 3 शोक करूण रस कोरा वस्त्र यम 4 क्रोध रौद्र रस लाल रुद्र 5 उत्साह वीर रस सुनहरा पीला इन्द्र 6 भय भयानक रस काला कामदेव 7 जुगुप्सा बीभत्स रस नीला महाकाल 8 विस्मय अद्भुत रस पीला ब्रहमा 9 निर्वेद शांत रस 2. अस्थायी भाव- जो भाव प्रकृति से अस्थिर होते हैं- रस की परिणति (पूरा होना) तक स्थिर नहीं होते, पानी के बुद-बुदों की भाँति क्षण-क्षण में डूबते-उतराते रहते हैं, उन भावों को संचारी भाव या व्यभिचारी भाव कहते हैं।  विभाव विभाव का अर्थ है- वि- विशेष रूप से, भावयति- जो स्थायी भाव का ज्ञान कराता है, उसे जगाता है। लोक में जो रति (छवि) आदि स्थायी भावों के उद्बोधक होते हैं वे ही काव्य और नाटक में विभाव कहे जाते हैं। जैसे- लोक में सीता आदि को रामचन्द्रादि की रति का उद्बोधक माना है। भर्तृहरि लिखते हैं- काव्य में रामादि विभाव शब्द के द्वारा ही ज्ञात होते हैं साक्षात् उपस्थित नहीं होते किंतु विभावन व्यापार के बल से सामाजिकों को वह सामने खड़े हुए दिखाई देते हैं। o विभाव के दो भेद हैं- 1. आलंबन (सहारा, आश्रय) और 2. उद्दीपन (लक्ष्य साधना, उद्देश्य साधना) o 1. आलंबन- जिसका आश्रय लेकर रसोद्गम होता है वह रामादि नायक आलंबन विभाव नाम से अभिहित होता है। आलंबन विभाव रूप नायक त्यागी, कृति (कार्य करने वाला –कृतज्ञ) होता है। मुख्य रूप से नायक के चार भेद होते हैं- धीरोदात्त, धीरोद्धत, धीर ललित, धीर प्रशांत। o 2. उद्दीपन- जो भाव को उद्दीपत करते हैं वे उद्दीपन विभाव होते हैं। चाँदनी, उद्यान, एकांत स्थन आदि के द्वारा रति (छवि) होता है। प्रत्येक रस के आलंबन एवं उद्दीपन विभाव अलग-अलग होते हैं।  अनुभाव – आलंबन, उद्दीपन आदि कारणों से उत्पन्न भावों को बाहर प्रकाशित करने वाले कार्य अनुभाव कहे जाते हैं। वाणी तथा अंग संचालन आदि की जिन क्रियाओं से आलंबन तथा उद्दीपन आदि के कारण आश्रय (पाठक, दर्शक, श्रोता आदि) के हृदय में जाग्रत भावों का साक्षात्कार होता है, वह व्यापार अनुभाव कहलाते हैं। विद्वानों ने अनुभाव के पाँच विभाग किए हैं- o 1. कायिक, 2. वाचिक, 3. मानसिक, 4. आहार्य, 5. सात्त्विक o 1. कायिक- शरीर से संबंधित होने के कारण इन्हें कायिक अनुभाव कहा गया है। o 2. वाचिक- यह वचनोद्गार के रूप में प्रकट होता है। o 3. मानसिक- मन या हृदय की वृत्ति से उत्पन्न शंका, ग्लानि, चिंता आदि का उन्मीलन मानसिक अनुभाव कहलाता है। o 4. आहार्य- मन में उठने वाली भावना के अनुरूप कृत्रिम (भावानुकूल) वेशभूषा की रचना। o 5. सात्त्विक- सात्त्विक अनुभाव अंतःकरण में अंकुरित होने के कारण सात्त्विक कहलाते हैं। सात्त्विक अनुभाव आंतरिक भावों की बाह्य अवस्था है, जो आठ प्रकार की मानी गई है- स्तम्भ, स्वेद, रोमांच, स्वरभंग, कंप, वैवण्य, अश्रु और प्रलभ। संचारी भाव (व्यभिचारी भाव) 1. निर्वेद: यह कम स्वभाव के लोगो में दिखायी देता है। 2. ग्लानि: दुर्बलता की भावना, बीमारियाँ, भूख, उल्टी अन्य निर्धारकों द्वारा उत्पन्न होता है। यह कमज़ोर बातों के साथ प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए। 3. शंका: यह संदेह, चोरी, पापी गतिविधि अन्य निर्धारकों के कारण उत्पन्न होता है। यह मुंह के स्थिर टकटकी सूखेपन के द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए। 4. असुया: ईर्ष्या, घृणा, अन्य लोगों के गुड लक, और धन आदि विभावों द्वारा उत्पन्न होता है। यह दूसरों को दोष-गुणों के विधान निंदा में गलती खोजने का प्रतिनिधित्व करती है। 5. मद: यह शराब और अन्य चीज़ों के पीने के कारण होता है। 6. श्रम: यह लंबी यात्रा से और शारीरिक व्यायाम के परिणाम से उत्पन्न होता है। यह आह भरने से, धीरे-धीरे चलने से, शरीर के हलके मालिश आदि द्वारा इसका प्रतिनिधित्व किया जाता है। 7. आलस्य: यह प्राकृतिक स्वभाव, बीमारी गर्भावस्था आदि जैसे निर्धारकों के कारण होता है। यह दुख, सिर दर्द, आदि द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। 8. दैन्य: यह अवसाद, प्रिय वस्तुओं की गरीबी, चोरी आदि निर्धारकों का परिणाम है। मानसिक असंतुलन, अशुद्ध शरीर आदि द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाता है। 9. चिन्ता: प्रतिबिंब समृद्धि गरीबी आदि के नुकसान की तरह निर्धारकों द्वारा निर्मित होता है। यह गहरी सोच, ध्यान आदि के द्वारा प्रस्तुत किया जाना चाहिए। 10. मोह: व्याकुलता की भावना, भाग्य, भय, घृणा आदि की क्रूर स्ट्रोक द्वारा निर्मित है। यह नुकसान चेतना की, हानि की दृष्टि से आदि नीचे गिरने से प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए। 11. स्मृति: याद सुख और दुख में अनुभवी लग रहा है प्राकृतिक याद करने का है। यह सोच नींद की आसानी हानि, आदि जैसे निर्धारकों के कारण होता है। यह सिर को हिला, नीचे देख, आंख भौंक जुटाने आदि की तरह परिणाम का प्रतिनिधित्व करती है। 12. ध्रृति: यह वेदों में साहस, ज्ञान, दक्षता, धन आदि की तरह निर्धारकों के कारण होता है। यह आनंद का प्रतिनिधित्व करती है। 13. व्रीडा: यह अपमान, पश्चाताप आदि जैसे निर्धारकों द्वारा उत्पन्न होता है। यह चेहरा छुपा सिर झुका, जमीन पर लाइनों ड्राइंग आदि द्वारा किया जाना चाहिए। 14. चपलता: भावना, जुनून, घृणा, प्रतिद्वंद्विता, क्रोध आदि से उत्पन्न होता है। यह कठोर शब्दों, गाली, ताड़ना, हत्या आदि का प्रतिनिधित्व करती है। 15. हर्ष: यह प्रियजनों आदि के साथ बैठक की, इच्छा की प्राप्ति की तरह निर्धारकों के कारण होता है। यह आदि सुंदर शब्दों के लिए आता है, आंखों की चमक द्वारा प्रतिनिधित्व होना चाहिए। 16. आवेग: भावना हवा या लीक में हाथियों की चाल, बारिश, आग, पागल भीड़ द्वारा उत्पादित, घबराहट कहा जाता है। 17. जड़ता: यह सुनवाई और वांछनीय या अवांछनीय वस्तुओं के देखने की तरह निर्धारकों द्वारा निर्मित है। यह आदि मौन रखते हुए जवाब देते नहीं द्वारा प्रतिनिधित्व होना चाहिए। 18. गर्व: यह शासन, महान जन्म, शबाब, शिक्षा आदि जैसे निर्धारकों के कारण होता है। यह तरह ईर्ष्या, अनादर, उपेक्षा आदि द्वारा प्रतिनिधित्व किया है। 19. विषाद: यह काम खत्म करने की असमर्थता, आकस्मिक आपदा की तरह निर्धारकों के कारण होता है, यह साहस के सहयोगी दलों, हानि आदि के लिए देख द्वारा प्रतिनिधित्व किया है। 20. औत्सुक्य: इस अपनों से जुदाई की याद की तरह निर्धारकों की वजह से एक लग रहा है, बगीचे की दृष्टि आदि है। यह नीचे डाली चेहरा, लेटी की इच्छा के साथ सोच, गहरी सांस द्वारा प्रतिनिधित्व होना चाहिए। 21. निद्रा: यह शारीरिक दुर्बलता थकान, नशा, आलस आदि जैसे निर्धारकों द्वारा निर्मित है। यह आदि, आंखों की रोलिंग जम्हाई, आँखों के सिकुड़ने, चेहरे की गंभीरता का प्रतिनिधित्व करती है। 22. अपस्मार: यह पागलपन का एक प्रकार है। यह एक ऐसी बुराई देवता, यक्ष, नागा, राक्षसों आदि के रूप में सुपर मानव शक्तियों की आत्माओं के कब्जे तरह निर्धारकों के कारण होता है। यह कांप चल रहे हैं, नीचे गिरने, पसीना आदि द्वारा प्रतिनिधित्व किया है। 23. सोना: सपने देखने की भावना, इंद्रियों की वस्तुओं का आनंद ले खींच कर जमीन पर या गद्दे पर लेटी या शरीर करार तरह निर्धारकों द्वारा निर्मित है। यह खर्राटों, सुस्ती, लोगों को नींद में बात कर रही द्वारा प्रतिनिधित्व होना चाहिए। 24. जागना: 25. क्रोध: 26. अवहित्था: यह शर्म की बात है, हार, क्रूरता आदि जैसे निर्धारकों द्वारा उत्पन्न होता है। यह बातचीत, अशुद्ध अर्थ आदि के विषय में परिवर्तन द्वारा प्रतिनिधित्व होना चाहिए। 27. उग्रत: यह भावना दूसरों के बीमार बोल का है, राजा को अपराध कर चोरी का पता लगाने जैसे निर्धारकों द्वारा निर्मित है। यह, हत्या गिरफ्तार, धड़कन, आदि द्वारा प्रतिनिधित्व होना चाहिए। 28. मति: यह आश्वासन, वेदों आदि का ज्ञान जैसे निर्धारकों के कारण होता है। यह विकल्प ओर इशारा करते हुए, चेलों समाशोधन संदेह करने के लिए अनुदेश द्वारा प्रतिनिधित्व किया जाना चाहिए, विविधताओं आदि। 29. व्याधि: यह हवा पित्त कफ कांप जोर आदि जैसे निर्धारकों के कारण होता है। यह, के कारण बुखार, कंपन को कांप शरीर के झुकने, नौकरियों के झटकों आदि द्वारा प्रतिनिधित्व किया है। 30. उन्माद: पागलपन की भावना के कारण अपनों से जुदाई की तरह निर्धारकों के लिए उत्पादन किया जाता है, धन की हानि, चोट आदि। 31. मरना (मरण): यह बीमारी के माध्यम से या बुरा चोट से आता है। बीमारी से निर्धारकों के पेट के रोग होते हैं, पेट का दर्द, बुखार, हैजा आदि। यह ढीला शरीर का प्रतिनिधित्व करती है, निष्क्रिय अंग होने के कारण जंगली जानवरों के हमले को, जहर लेने की वजह से हथियार, सांप के काटने को चोट तरह निर्धारकों के कारण होता है। 32. त्रास: 33. वितर्क: भावना विवेचना चिंतन असंभवता आदि जैसे निर्धारकों द्वारा उत्पन्न होता है। यह आइब्रो और सिर आदि की स्थापना चर्चाओं का प्रतिनिधित्व करती है। o आचार्य देव ने छल को 34 वाँ संचारी भाव माना है। काव्य गुण  गुण साहित्य शास्त्र में काव्य शोभा के जनक हैं। प्रसाद, माधुर्य और ओज काव्य के प्रमुख गुण हैं।  प्रसाद गुण हृदय पर वैसा ही प्रभाव डालता है, जैसे सूखे ईधन में अग्नि और स्वच्छजल पर प्रतिबिम्ब।  चित्त को प्रसन्न करने वाला माधुर्य गुण होता है। श्रृंगार, करूण और शांतके उपयुक्त गुण माना जाता है। इसमें सरल, सरस और माधुर्यमयी भाषा प्रयुक्त होती है।  ओज चित्त को उत्तेजित करने वाला गुण है, इसकी उपस्थिति वीर, रौद्र और भयानक रस में होती है। लंबे-लंबे समास और ट वर्ग ध्वनियों के बाहुल्य से इसमें थोड़ी कर्कशता रहती है। वीर रसात्मक रचनाओं में इस गुण की पर्याप्त संभावना रहती है।  शब्दों का अर्थ ग्रहण कराने वाली काव्यशक्तियाँ भी महत्वपूर्ण हैं। अभिधा, लक्षणा और व्यंजना अभिधा  अभिधा शब्द शक्ति सीधा अर्थ बोध कराती है अर्थात् शब्दों के निश्चित अर्थों के अनुसार जो अर्थ प्रकट होता है, उस निश्चित अर्थ को प्रकट करने वाली शक्ति को अभिधा कहते हैं। लक्षणा  लक्षणा से किसी विशिष्ट अर्थ की प्रतीकों के माध्यम से प्रतीति होती है। दूसरे शब्दों में कहें तो जहाँ मुख्यार्थ का बोध होने पर उससे ही संबंधित दूसरा अर्थ रूढि या प्रयोजन के आधार पर लगाया जाता है, वहाँ वह अर्थ लक्ष्यार्थ कहलाता है, जिस शक्ति द्वारा लक्ष्यार्थ ग्रहण किया जाता है उसे लक्षणा कहते हैं। व्यंजना  व्यंजना शब्द शक्ति से व्यंग्यार्थ का बोध होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जब अभिधा और लक्षणा विराम ले लेते हैं तो तीसरी शक्ति कार्य करती है जो व्यंजना कहलाती है। व्यंजना के दो भेद हैं- 1. शाव्दी व्यंजना, 2. आर्थी व्यंजना। छंद  छंद काव्य में शब्दों की उस कलात्मक व्यवस्था को कहते हैं, जो मात्राओं अथवा वर्णों की किसी निश्चित संख्या तथा यति, गति आदि की विशेष क्रम-योजना के अनुसार की जाती है।  छंद के आठ अंग है –  1.पाद, 2. वर्ण, 3. मात्रा, 4. यति, 5. गति, 6. गण, 7. तुक, 8. प्रत्यय।  पाद- एक आघात में उच्चरित होने वाले अंश को पाद अथवा चरण कहते हैं।  वर्ण- स्वर और व्यंजन।  मात्रा- लघु और दीर्घ।  यति- वाक्य की समाप्ति पर तनिक रूकना।  गति- किसी छंद में लय।  गण- छंद में तीन वर्णों के सम्मिलित समूह अथवा मात्राओं के नियत समूह को गण कहते हैं।  तुक- चरणों के अंत में रहने वाली वर्ण-समानता।  प्रत्यय- छंद की संख्या, भेदो भेद, स्वरूप, शुद्धशुद्धि आदि।  सभी छंदों को दो वर्गों में विभक्त किया जा सकता है-1. वैदिक छंद 2. लौकिक छंद।  वेदों में प्रयुक्त छंद वैदिक छंद कहलाते हैं।  अन्य काव्य-ग्रंथों में प्रयुक्त होने वाले सभी छंद लौकिक छंद है। लौकिक छंद के दो रूप है-1. मात्रिक, 2.वर्णिक।  मात्रिक छंद मात्राओं की नियत संख्या पर आधारित है।  वर्णिक छंद वर्णों की निश्चित संख्या क्रम पर आधारित है।  मात्रिक छंद की तीन श्रेणियाँ है- 1. सममात्रिक छंद (चौपाई) 2. अर्ध सममात्रिक छंद, (दोहा, सोरठा) 3.विषम मात्रिक छंद।  छंद में लघु मात्रा अर्थात् हृस्व मात्रा का चिह्न (।), तथा गुरू अर्थात् दीर्घ मात्रा का चिह्न (s) है।  लघु मात्रा वाले स्वर- अ, इ, उ, ऋ। इनकी एक मात्रा गिनी जाती है।  दीर्घ मात्रा वाले स्वर- आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ इनकी दो मात्राएँ गिनी जाती है। गण का नाम वर्ण-क्रम लक्षण उदाहरण यगण ISS पहला वर्ण लघु, शेष गुरू सुरेखा मगण SSS तीनों गुरू आभारी तगण SSI पहले दो गुरू, फिर लघु साकार रगण SIS गुरू,लघु, गुरू साधना जगण ISI लघु, गुरू, लघु शिकार भगण SII गुरू, दो लघु वाहन नगण III तीनो लघु जलज सगण IIS दो लघु, एक गुरु कविता  यमाताराजभानसलगा- याद करने का नियम। ल- से लघु और ग- से गुरु चौपाई  इसमें चार चरण होते हैं। प्रत्येक चरण सोलह मात्राएँ होती हैं तथा चरण के अंत में लघु मात्रा वाला वर्ण नहीं आता। दो चरण मिलकर एक अर्धाली बनते हैं। ये दोनों चरण प्रायः एक ही पंक्ति में लिखे जाते हैं। पहले दूसरे चरण की तथा तीसरे चौथे चरण की तुक परस्पर मिलती है। तात जनक तनया यह सोई। धनुष जग्य जेहि कारन होई। पूजन गौरि सखीं लै आईं। करत प्रकासु फिरत फुलवाईं। भा निरमल तिन्ह पायँन्ह परसे । पावा रूप रूप के दरसे ॥ मलय-समीर बास तन आई । भा सीतल, गै तपनि बुझाई ॥ न जनौं कौन पौन लेइ आवा । पुन्य-दसा भै पाप गँवावा ॥ ततखन हार बेगि उतिराना । पावा सखिन्ह चंद बिहँसाना ॥ बिगसा कुमुद देखि ससि-रेखा । भै तहँ ओप जहाँ जोइ देखा ॥ पावा रूप रूप जस चहा । ससि-मुख जनु दरपन होइ रहा ॥ नयन जो देखा कवँल भा, निरमल नीर सरीर । हँसत जो देखा हंस भा, दसन-जोति नग हीर ॥ (पद्मावत- जायसी)  उमा राम बिषइक अस मोहा। नभ तम धूम धूरि जिमि सोहा।। बिषय करन सुर जीवसमेता। सकल एक तें एक सचेता।।  पति परित्याग हृदय दुखु भारी। कहइ न निज अपराधबिचारी।।  उमा कहउँ मैं अनुभव अपना । सत हरि भजनु जगत सब सपना ॥  बिनु सतसंग बिबेक न होई। राम कृपा बिनु सुलभ न सोई।।  जौं पै दुष्ट हृदय सोइ होई । मोरें सनमुख आव कि सोई ॥  तात राम नहिं नर भूपाला । भुवनेस्वर कालहु कर काला ॥  लंका निसिचर निकर निवासा । इहाँ कहाँ सज्जन कर बासा ॥ (रामचरित मानस- तुलसी) रोला  यह चार पंक्तियों में लिखा जाने वाला एक सममात्रिक छंद है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में 11, 13 की यति के क्रम में 24 मात्राएँ होती है। पहली-दूसरी तथा तीसरी चौथी पंक्तियों की तुक परस्पर मिलती है।  उदाहरण बाधाओं से नहीं तनिक भी जो घबराये। मृत्यु-पंथ पर बढ़े अधर पर हास बिछाये।  मृत्युभूमि के लिए जिन्होंने प्राण लुटाये। हरिगीतिका  यह चार पंक्तियों में लिखा जाने वाला सममात्रिक छंद है। इसकी प्रत्येक पंक्ति में 16 तथा 12 मात्राओं की यति के क्रम से 28 मात्राएँ होती हैं। पंक्ति के अंत में तुक साम्य होता है।  उदाहरण ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी। अपरस रहत सनेह तगा तैं, नाहिन मन अनुरागी। पुरइनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी। ज्यौं जल माहँ तेल की गागरि, बूँद न ताकौं लागी। प्रीति-नदी मैं पाउँ न बोरयौ, दृष्टि न रूप परागी। सूरदास अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।। दोहा • यह दो पंक्तियों में लिखा जाने वाला एक सममात्रिक छंद है। इसका विषम (प्रथम-तृतीय) चरणों में 13-13 तथा सम (दूसरे-चौथे) चरणो में 11-11 मात्राएँ होती है। • उदाहरण-  जप माला छापा तिलक, सरै न एकौ काम। मन काँचै नाचै वृथा, साँचे राचै राम।।  दुख में सुमरिन सब करे, सुख मे करे न कोय । जो सुख मे सुमरिन करे, दुख काहे को होय ॥ 1 ॥ सोरठा  यह अर्ध सममात्रिक छंद है, जो दो पंक्तियों में लिखा जाता है। इसके पहले व तीसरे (विषम) चरणों में 11-11 मात्राएँ तथा दूसरे व चौथे (सम) चरणों में 13-13 मात्राएँ होती है।  उदाहरण-  लिख कर लोहित लेख, डूब गया है दिन अहा! व्योम-सिंधु सखि देख, तारक बुदबुद दे रहा!!  ओछे को सतसंग, रहिमन तजहु अँगार ज्यों। तातो जारै अंग, सीरो पै कारो पै कारो लगै।।  बंदौ गुरू पद कंज, कृपा सिंधु नर रूप हरि। महा मोह तम पुंज, जासु बचन रविकर निकर।। कवित्त  इसे घनाक्षरी अथवा मनहरण वृत्त भी कहते हैं। यह दण्डक जाति का वर्ण वृत्त है। कवित्त अथवा घनाक्षरी के चार चरणों में से प्रत्येक चरण में 31 वर्ण होते हैं जिसमें प्रायः 8 8 8 7 वर्णों के बाद यति (छंद में कहीं कहीं विराम की आवश्यकता) क्रम रहता है। चरण के अंत में गुरू वर्ण रहता है। लंबा चरण होने के कारण इसे दो पंक्तियों में लिखा जाता है।  उदाहरण- तेज ना रहेगा तेजधारियों का नाम को भी, मंगल मयंक मंद मंद पड़ जायँगे। मीन बिन मारे मर जायँगे सरोवर में, डूब डूब शंकर सरोज सड़ जायँगे।  सुनो कै परम पद, ऊनो कै अनंत मद नूनो कै नदीस नद, इंदिरा झुरै परी। (देव) काव्य • भामह- 'शब्दार्थों सहितौ कविताम् • vkpk;Z okeu us 'jhfrjkRek dkO;L;* dgdj vFkkZr~ jhfr ds vuqlkj jpuk gh dkO; gSA • vkpk;Z dqUrd us ^oØksfDr dkO;thfore~* dgdj dfork dks ifjHkkf"kr fd;k gSA • vkpk;Z fo'oukFk us dgk ^okD;e~ jlkRede~ dkO;e~* vFkkZr~ jl ;qDr okD; gh dkO; gSA • पं. जगन्नाथ- 'रमणीयार्थ प्रतिपादकः शब्दः कविताम्' अर्थात् रमणीय शब्द के अंतर्गत कविता के सभी तत्त्व आते हैं। • vkpk;Z jkepUnz 'kqDy ds erkuqlkj Þftl izdkj vkRek dh eqDrkoLFkk Kkun'kk dgykrh gS] ân; dh blh eqfDr lk/kuk ds fy, euq"; dh ok.kh tks 'kCn&fo/kku djrh vkbZ gS] mls dfork dgrs gSAÞ • पंत- कविता हमारे परिपूर्ण क्षणों की वाणी है। • eSF;w vkuksZYM ds vuqlkj& Þdfork ds ewy esa thou dh vkykspuk gSAÞ • 'kSys dgrs gSa Þdfork dYiuk dh vfHkO;fDr gSAÞ • जॉनसन ने कविता को छंदमयी वाणी माना- Poetry is metrical composition. • कॉलरिज- कविता उत्तमोत्तम क्रमनुविधान है- Poetry is the best words in the best order. • वर्ड्सवर्थ- कविता शांति के क्षणों में स्मरण किये हुए प्रबल मनोवेगों का सहज उच्छलन है- Poetry is the spontaneous overflow of powerful feeling. It takes its origin from emotions recollected in tranquility. • हैडो ने कविता को श्रवण की कला कहा है। प्रबंधकाव्य प्रबंधकाव्य उस रचना को कहते हैं जिसमें क्रमबद्ध रूप से एक ही कथा का वर्णन किया जाता है। इसके पद्य माला में गूँथे गए फूलों की भाँति कथा रूपी सूत्र में बँधे होते हैं। कथा-सूत्र से बाहर निकलने पर पद्यों का आशय स्पष्ट नहीं पाता। उदा- रामचरितमानस, साकेत, पद्मावत आदि। मुक्तक काव्य मुक्तक काव्य में प्रत्येक पद्य स्वतंत्र होता है। अर्थात् एक पद्य का अर्थ जानने के लिए दूसरे पद्य की आवश्यकता नहीं होती। मुक्तक काव्य अपने आप में पूर्ण और स्वतंत्र होते हैं। आचार्य अभिनव गुप्त के अनुसार मुक्तक काव्य पूर्वापर संबंध से मुक्त रहता है फिर भी रसानुभूति में सक्षम होता है। मुक्तक काव्य व्यक्तिगत भावों का चित्रण रहता है। मुक्तक काव्य में प्रेम, व्यंग्य, भक्ति, वीरता अथवा वैराग्य की भी अभिव्यक्ति हो सकती है। उदा- सूरदास के पद, मीरा के पद, बिहारी के दोहे आदि। महाकाव्य सर्वप्रथम संस्कृताचार्य भामह ने महाकाव्य का लक्षण निरूपण किया। महाकाव्य के में नायक के संपूर्ण जीवन का चित्रण किया जाता है। महाकाव्य की रचना सर्गबद्ध रूप में होती है, उसमें नाटक की पंचसंधियों का होना जरूरी होता है। उसके चरित्र महान् होते हैं। अलंकार, रस आदि उसे सौंदर्य प्रदान करते हैं। युद्ध प्रकृति, राजदरबार आदि का वर्णन भी आवश्यक है। अंत में नायक विजयी दिखाया जाता है। खंडकाव्य इसमें नायक के किसी एक अंश का वर्णन किया जाता है। इसमें कथा विस्तार नहीं होता। खंडकाव्य का कथानक प्रायः इतिहास अथवा पुराणों से ही लिया जाता है। खंडकाव्य में पात्रों की संख्या कम होती है। गीतिकाव्य गीत काव्यशास्त्र में कोई अलग विधा नहीं मानी गई। हिंदी गीतिकाव्य का संबद्ध आरंभ से संगीत रहा है। कबीर ने अपने तानपूरा और मीरा ने करताल से अपने गीतों का गा-गाकर जनता को मनोमुग्ध किया है। बाद में भी यही परंपरा राष्ट्रीयकाव्य धारा और वर्तमान तक चली आ रही है। अलंकार  अलंकार शब्द की व्युत्पत्ति को भरत के नाट्यशास्त्र से देखा जाता है।  भरत ने नाट्यशास्त्र में अलंकार शब्द के समानांतर लक्षण शब्द का भी प्रयोग किया है।  उन्होंने काव्य के 36 लक्षणों की चर्चा की है। किन्तु परवर्ती विद्वानों ने अधिकांश लक्षणों को अलंकार के रूप में परिगणित कर लिया है। आगे चलकर अलंकार के लिए चित्र शब्द का भी प्रयोग हुआ है।  भरत ने नाट्यशास्त्र में चार अलंकारों का नामोलेख किया है- उपमा, दीपक, रूपक, यमक।  भामह अलंकार के पहले प्रबल पोषक आचार्य है।  भामह के काव्यशास्त्रीय ग्रंथ का नाम काव्यालंकार है।  भामह अतिश्योक्ति को अलंकार का बीज मानते हैं।  अतिशयोक्ति का अर्थ है लोकातिक्रान्तगोचर वचन अर्थात् जन सामान्य की भाषा से भिन्न उक्ति। यह उक्ति ही वक्रोक्ति है।  अतिशयोक्ति काव्य में लोकोत्तरता- असाधारणता लाती है और वक्रोक्ति रमणीयता।  भामह ने 2 शब्दालंकार और 36 अर्थालंकार सहित कुल 38 अलंकार माने हैं।  भामह के बाद दण्डी ने काव्य में अलंकारों की स्थिति अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार करते हुए कहा कि काव्य के सौंदर्य कारक धर्मों को अलंकार कहते हैं।  दंडी ने 2 शब्दालंकार और 35 अर्थालंकार सहित कुल 37 अलंकार माने हैं।  आचार्य वामन ने रीति संबंधी अपने जिस मत की स्थापना की है उनका प्रसिद्ध काव्यशास्त्रीय ग्रंथ है-काव्यालंकारसूत्रवृत्ति।  वामन के अनुसार काव्य की आत्मा रीति है। काव्यशोभा के उत्पादक धर्म तो गुण हैं किंतु उस शोभा को उत्कर्ष प्रदान करने वाले धर्म को अलंकार कहा जाता है।  उद्भट के ग्रंथ का नाम है अलंकारसारसंग्रह।  उद्भट ने 4 शब्दालंकार और 37 अर्थालंकार सहित कुल 41 अलंकार माने हैं।  रुद्रट ने काव्यालंकार में अलंकार शब्द को काव्य से जोड़ा।  रूद्रट ने 62 अलंकार माने हैं।  आचार्य कुंतक ने वक्रोक्ति को ही अलंकार कहा है।  आचार्य आनंदवर्धन ने रस के उत्कर्ष हेतु के रूप में अलंकारों को स्वीकर किया है।  जगन्नाथ की दृष्टि में अलंकार काव्य की आत्मा व्यंग्यार्थ में रमणीयता उत्पन्न करने वाले हैं।  आचार्य भोज ने अपने ग्रंथ सरस्वती कांठाभरण में 24 शब्दालंकार, 24 अर्थालंकार, 24 उभयालंकारों सहित 72 भेद किए हैं।  मम्मट ने अलंकारों की संख्या 67 मानी है। इसमें 6 शब्दालंकार, 61 अर्थालंकार माने हैं।  मम्मट अलंकारों को आत्मा का आभूषण स्वीकार करते हैं।  मम्मट ने काव्यप्रकाश के दशम उल्लास में विशेष अलंकार के निरूपण पसंग में अतिशयोक्ति को अलंकारों का प्राण स्वीकार किया है।  आचार्य विश्वनाथ ने साहित्यदर्पण में 7 शब्दालंकार और 75 अर्थालंकार सहित कुल 82 अलंकार माने हैं।  आचार्य वामन ने 2 शब्दालंकार और 29 अर्थालंकार सहित कुल 31 अलंकार माने हैं।  कवि मनः व्यापार के आधार पर अलंकारों को कुछ विचारक पाँच वर्गों में तो कुछ छः वर्गों में रखते हैं-  1. साम्यमूलक- उपमा, रूपक दृष्टांत आदि।  2. अतिशयमूलक- अतिशयोक्ति।  3. औचित्यमूलक- स्वबावोक्ति।  4. वैषम्यमूलक- विरोध, विभावना।  5. वक्रतामूलक,  6. चमत्कारमूलक- यमक, चित्र, मुद्रा आदि। अलंकारों का वर्गीकरण  1. शब्दालंकार 1.1. अनुप्रास (छेकानुप्रास, वृत्यानुप्रास, श्रुत्यानुप्रास, लाटानुप्रास, अंत्यानुप्रास) 1.2. यमक, 1.3. श्लेष, 1.4. वक्रोक्ति (श्लेषाश्रित वक्रोक्ति, काकू आश्रित वक्रोक्ति)  2. अर्थालंकार 2.1. साम्यमूलक (उपमा, रूपक, उत्प्रेक्षा, दृष्टांत, निदर्शना, प्रतिवस्तूपमा), उपमा (पूर्णोपमा, लुप्तोपमा, मालोपमा) रूपक (निरंग रूपक, सांग रूपक, परंपरित रूपक) उत्प्रेक्षा (हेतुत्प्रेक्षा, फलोत्प्रेक्षा) 2.2. वैषम्यमूलक (असंगति, विरोधाभास, विभावना, विशेषोकित, विषम आदि) 2.3. अतिशयमूलक (अतिशयोक्ति, अत्युक्ति) 2.4. वक्रतामूलक ( वक्रता)  3. उभयालंकार।  अलंकार के मूल में अतिशयोक्ति और वक्रोक्ति होती है।  अलंकार काव्य के सहज और अनिवार्य गुण न होकर अस्थिर धर्म हैं।  अलंकार काव्य-सौंदर्य के सर्जक न होकर बर्धक तत्त्व हैं।  अलंकार रसोपकारक तत्त्व हैं अर्थात् वे अंगी न होकर अंग हैं।  सत् काव्य में अलंकार की स्वतंत्र सत्ता अमान्य है।  आचार्य केशव ने अलंकारहीन कविता को नग्न माना है।  देव- अलंकार काव्य में अद्भुत रूप की योजना करते हैं।  पाश्चात्य काव्यशास्त्र में अलंकार के पर्याय मिलते हैं- ट्रोप्स (Tropes), फिगर्स (Figures), ओरनामेण्ट्स (Ornaments)। इन शब्दों का प्रयोग ग्रीक रोमन काव्यशास्त्र में पाया जाता है।  ट्रोप्स (Tropes) का अर्थ है वक्र- इसमें अर्थ की वक्रता प्रमुख होती है।  फिगर्स (Figures) का अर्थ है- रूप एवं आकार तथा  ओरनामेण्ट स्पष्ट ही अलंकार का वाचक है। बिंब  बिंब को अंग्रेजी में इमेज कहते हैं। अर्थात् मूल कल्पना बिंब है।  साहित्य में बिंब वह भाषिक और शैल्पिक उपकरण है, जिसके द्वारा कोई रचनाकार अमूर्त का मूर्तिकरण करता है।  पाश्चात्य विद्वानों का विश्वास है कि प्रत्येक मनुष्य के मन में कुछ इंद्रिय द्वारा अनुभव करने पर हमारे हृदय पर जो प्रभाव पड़ता है और उससे जिस प्रकार की मानस अभिव्यक्ति होती है, उसे बिंब कहते हैं।  डॉ. नगेन्द्र के अनुसार- 1. काव्य-बिंब एक प्रकार का मानसिक बिंब है। 2. काव्य-बिंब का निर्माण शब्दार्थ और कल्पना के द्वारा होता है। 3. काव्य-बिंब के मूल में भाव की सन्निहित आवश्यक है।  काव्य का बिंब मानस की एक सजीव, सुंदर और सरस चित्र है, जिसमें कवि की भावना, अनुभूति और कल्पना मूर्त रूप धारण करती है।  डॉ. नगेन्द्र ने पाँच ज्ञानेंद्रियों के आधार पर पाँच प्रकार के बिंब माने हैं- 1. दृश्य बिंब (आँख), 2. नाद बिंब (कान), 3. गंध बिंब (नाक), 4. स्पर्श बिंब (त्वचा), 5. स्वाद बिंब (जिह्वा)।  प्रो. वासुदेव के अनुसार- 1. धारणात्मक (कवि की कल्पना के सहारे, बात सुनकर, कहानी पढ़कर, गीत सुनकर आदि)। 2. दृश्यात्मक (देखकर किसी दृश्य को देखकर भाव आना और लिखना)। 3. स्वरचित अथवा स्वानुभूत (केवल सुनी-सुनाई बातों के आधार पर जिसे कभी देखा नहीं-स्वर्ग, नरक, कल्पवृक्ष आदि)। प्रतीक  प्रतीक के द्वारा हम काव्य में बाह्य जगत से सामग्री उठाकर उसे नया अर्थ देते हैं।  प्रतीक के द्वारा वस्तुआ जगत के पदार्थों तथा स्थितियों को प्रतीक बनाकर उनके माध्यनम से संवेदनाओं और अनुभूतियों को व्यिक्ता किया जाता है।  दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि प्रतीक द्वारा मूर्त जगत में अर्मूत भावनाओं का निरूपण किया जाता है, इसे देखा नहीं जाता, मात्र महसूस किया जा सकता है। अपने अंतर में ही समझा या विश्लेाषित किया जा सकता है।  19 वीं. शती के अंतिम चरण में तीन फ्रांसीसी कवियों- मालामें, वर्लेन और रिंबों ने प्रतीकवाद स्कूल की स्थापना की जिसको अंतरराष्ट्रीय प्रभाव पड़ा।  पाश्चात्य विद्वान अरबन ने दो प्रकार के प्रतीक माने हैं-1. बाहरी प्रतीक, 2. आंतरिक प्रतीक।  रामचन्द्र शुक्ल ने दो प्रतीक माने हैं- 1. भावात्मक 2. विचारात्मक।  प्रतीकों के दो वर्गीकरण और भी हैं- 1. अगोचर प्रतीक 2. गोचर प्रतीक।  हिन्दी साहित्य में प्रतीक योजना की व्यवस्था आदिकाल से ही दिखाई देती है- मध्यकाल के पद्मावत में रतनसेन- आत्मा, पद्मावती- परमात्मा, हीरामन तोता- गुरु, नागमति-छल- प्रपंच, राघव चेतन- शैतान, और अलाउद्दीन-माया का प्रतीक है।  मिथक  हिंदी में मिथक के लिए पुराण कथा, पुरा कथा, देव कथा, धर्म कथा, पौराणिक प्रसंग आदि अनेक शब्द प्रयुक्त होते हैं।  हिंदी में मिथक शब्द के निर्माता हजारी प्रसाद द्विवेदी हैं।  डॉ नगेन्द्र के अनुसार मिथक का संबंध मिथक से स्थापित किया जाए तो इसका अर्थ हो सकता है सत्य और कल्पना का परस्पर अभिन्न संबंध अथवा अकात्म्य।  फ्रैंच भाषा के मिथ को एक ऐसे विश्वास के अर्थ में लिया जाता है, जिसका न तो कभी अस्तित्व था, न है और न होगा।  एम. एलियड के अनुसार- मिथक धार्मिक कथा है और इसीलिए वह सही इतिहास है क्योंकि विश्व का अस्तित्व उसे सिद्ध करता है।  मिथक का परिवेश अलौकिक तथा धार्मिक होता है उनमें प्रधानता देवी-देवताओं के वृत्त होते हैं, जिनका धार्मिक महत्त्व होता है, जिन्हें तर्कों द्वारा सिद्ध नहीं किया जा सकता।  फ्रायड ने मिथक को स्वप्न का सजाती तथा इच्छापूर्ति का एक विधान माना है। फैंटेसी  फैंटेसी का सामान्य अर्थ है मिथ्या कल्पना। दूसरे शब्दों में कहें तो मिथ्या तथ्यों से भरी हुई कृति ही फैंटेसी कहला सकती है।  मुक्तिबोध के अनुसार- फैंटेसी एक झीना परदा है जिसमें जीवन तथ्य झाँक-झाँक उठते हैं।  फ्रायड ने स्वप्न या दिवास्वप्न का ही नहीं कला और साहित्य का मूल फैंटेसी माना है। सॉनेट  साहित्य भाषाओं की सीमाओं के परे होता है। तमाम विधायें एक भाषा में जन्म लेकर दूसरी भाषाओं के साहित्य में स्थापित हुईं। हिन्दी भाषा साहित्य इससे परे नहीं रहा।  बात छायावाद से शुरू करते हैं। छायावाद काल के काव्य में गीत एवं प्रगीत को प्रमुखता मिली इसीलिए इस काल को प्रगीत काल भी माना जाता है।  इस काल के कवियों ने पश्चिमी स्वच्छंदतावादी काव्य के प्रभाव में प्रगीत शैली को अपनाया। वे सर्वाधिक अंग्रेजी प्रगीत काव्य धारा से प्रभावित थे।  स्वरूप, पाठ्य विशेषताओं और गेयता के आधार पर अंग्रेजी प्रगीत और भारतीय गीत में काफी भिन्नता है। प्रगीत संगीत की लय में नहीं गाए जाते किंतु उनमें पर्याप्त माधुर्य और प्रवाह होता है।  संगीत के विधान के अनुरूप गेय पद रचना, जिसमें काव्य एवं संगीत तत्व का संतुलन रहता है, गीत कहलाती है।  पश्चिमी विद्वान पालग्रेव के अनुसार, ’प्रगीत (लिरिक) की रचना किसी एक ही विचार भावना अथवा परिस्थिति से संबंधित होती है तथा उसकी रचना शैली संक्षिप्त तथा भावरंजित होती है।’  शैली एवं आकार की दृष्टि से प्रगीत के छः स्वरूप हैं- 1. सॉनेट (चतुष्पदी) 2. ओड (संबोधन प्रगीत) 3. एलिजी (शोक प्रगीत) 4. सेटायर (व्यंग्य प्रगीत) 5. रिफ्लेक्टिव (विचारात्मक प्रगीत) 6. डाइडेक्टिव (उपदेशात्मक) सॉनेट  सॉनेट इटैलियन शब्द sonetto का लघु रूप है। यह छोटी धुन के साथ मेण्डोलियन या ल्यूट (एक प्रकार का तार वाद्य) पर गायी जाने वाली कविता है।  सॉनेट का जन्म कहाँ हुआ, इस पर मतभेद हैं। कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि सॉनेट का जन्म ग्रीक सूक्तियों (epigram) से हुआ होगा।  प्राचीन काल में epigram का प्रयोग एक ही विचार या भाव को व्यक्त करने के लिए होता था। कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि इंग्लैण्ड और स्कॉटलैंड में प्रचलित बैले से पहले सॉनेट का अस्तित्व रहा है।  यह भी मान्यता है कि यह सम्बोधिगीत (ode) का ही इटैलियन रूप है।  एक मान्यता कहती है कि इस विधा का जन्म सिसली में हुआ और इसे जैतून के वृक्षों की छॅंटाई करते समय गाया जाता था। इतिहास और स्वरूप  सॉनेट को विशेष रूप से तीन आयामों में देखा-परखा गया है- 1. आकृति की विशिष्टता 2. भाव की विशिष्टता के साथ वैयक्तिक अभिव्यक्ति। 3. सर्वांगपूर्णता, कल्पना, प्रेरणा और माधुर्य। इटली  तेरहवीं शताब्दी के मध्य में सॉनेट का वास्तविक रूप सामने आया। फ्रॉ गुइत्तोन को सॉनेट का प्रणेता माना जाता है। इटली के कवि केपल लॉप्ट ने सॉनेट की खोज के लिए फ्रॉ गुइत्तोन को ‘काव्य साहित्य का कोलम्बस’ कहा है। फ्रॉ गुइत्तोन ने स्थापित किया कि सॉनेट की प्रत्येक पंक्ति में दस मात्रिक ध्वनियाँ होना चाहिए। गुइत्तोन के सॉनेट में कुल चौदह चरण होते हैं जो दो भागों में बॅंटे होते हैं-  1- अष्टपदी- अष्टपदी में पहली से चौथी की, चौथी से पाँचवीं की और पाँचवीं से आठवीं पंक्ति की तुक मिलायी जाती है। इसी तरह दूसरी से तीसरी की, तीसरी से छठवीं की और छठवीं से सातवीं पंक्ति की तुक मिलती है।  हिन्दी प्रगतिशील कवि त्रिलोचन ने पांच सौ से ज्यावदा सॉनेटों की रचना की. 0

बुधवार, 27 अप्रैल 2016

प्रेमचन्द की कहानियाें की समीक्षा

ठाकुर का कुआँ (प्रेमचंद)
सन् 1932 में प्रकाश में आई प्रेमचंद की कहानी 'ठाकुर का कुआँ' अपने छोटे से कलेवर में बड़ी बात कहती नजर आती है। कहानी ग्रामीण परिवेश मं उबरे जात-पात और ऊँच-नीच के बीच भेद को उजागर करती है। कहानी में दलित जोखू और उसकी पत्नी गंगी मुख्य पात्र है। दलित जोखू दूषित पानी पीने को मजबूर है। जबकि पत्नी उसे वह पानी नहीं पीने देती और हट करके ठाकुर के कुएँ से पानी लेने जाती है। डरी हुई गंगी जैसे ही कुएँ से पानी निकालने लगती है और पानी का घड़ा भरकर कुएँ के ऊपर तक आ जाता है तो ठाकुर का दरवाजा खुलता है जिससे गंगी के हाथ से रस्सी छूट जाती है और घड़ा फूट जाता है। घड़ा गिरते ही वह वहाँ ले दौड़ी घर को आती है तथा जोखू को दूषित पानी पीते देख उसे रोक नहीं पाती है।
दलित विमर्श को लेकर प्रेमचंद की कहानी 1930 में प्रकाशित सद्गति भी है। इनके आलावा भी हिंदी में दलित विमर्श को लेकर बहुत सारी कहानियाँ प्रकाश में आई हैं। प्रसाद की कहानी विरामचिह्न, ओम प्रकाश बाल्मीकि की काहनी अम्मा, यह अंत नहीं, खानाबदोश। ज्ञानरंजन की कहानी मनु आदि।
 प्रेमचंद ग्रामीण परिवेश पर कहानी लिखने वाले रचनाकार रहे हैं उनका मूल उद्देश्य ग्रामिणों की समस्याओं को सभी के सामने लाना रहा है। कहानी में बहुत से बिंदुओं पर विचार किया गया है, जो इस प्रकार है-
1.       जातिगत भेदभाव।
2.       निम्न वर्ग और उच्च वर्ग का भेद।
3.       समाज में असमानता को दिखाना।
4.       कृषक या मजदूर की दशा।
5.       आर्थिक विपन्नता।    
     जमींदारी प्रथा।
ईदगाह
 ‘ईदगाह‘ कहानी में बूढ़ी दादी अमीना बालक हामिद की संवेदनशीलता, उसकी स्वयं की सहजता, बालमन और सामाजिक स्थिति को अपने में समेटे हुए है। कहानी का हामिद मानव मुक्ति के संघर्ष में सहायक बनकर उभरता है। इसलिए ‘ईदगाह‘ का हामिद भी कोरा आदर्श नहीं है, यथार्थ है। कहानी को एक चार वर्षीय अनाथ की बताई गई है, वह अपनी दादी अमिना के साथ रहता है। यही हामिद, कहानी का नायक है, हाल ही में अपने माता-पिता को खो दिया है; उनकी दादी ने उन्हें बताया कि उनके पिता ने पैसे कमाने के लिए छोड़ दिया है और उनकी माँ अल्लाह के लिए सुंदर उपहार लाने के लिए गई है।

कहानी की शुरूआत ईदगाह जाने से शुरू होती है। गाँव के सभी बच्चे ईदगाह के लिए तैयार है। इसलिए तीन पैसे होने पर भी हामिद अपने भाग्य को नहीं कोसता न साथियों को हीन समझता है। दूसरे लड़के सवारी, कैंडीज और खूबसूरत मिट्टी के खिलौने पर अपनी जेब से पैसा खर्च करते हैं, और हमीद को तंग करते हैं जब वह क्षणिक आनंद के लिए पैसे की बर्बादी के रूप में खारिज करते हैं। जबकि उनके दोस्त खुद का आनंद ले रहे हैं। वह केवल इतना कहता है-“खिलौने मिट्टी ही के तो हैं, गिरे तरे चकनाचूर हो जाएँ।“ यह हामिद का अपना आत्मसंघर्ष है। हामिद अपने प्रलोभन पर काबू पाकर दादी रोटियां पकाने के दौरान अपनी उंगलियों को जलती है, उस दृश्य को याद करता है और चिमटा खरीद लेता है। हामिद के दोस्तों ने उन्हें अपनी खरीद के लिए चिढ़ाया, लेकिन हामीद ने खिलौनों के गुणों को अपने चिमटे से कम ही आंका। जब हामिद ने चिमटा अपनी दादी को उपहार में दिए। पहली बार वह उसे मेले में खाने या पीने के लिए कुछ खरीदने के बजाय खरीदारी करने के लिए डांटती है, जब तक हामिद उसे याद नहीं दिलाता कि वह अपनी उंगलियों को रोज कैसे जलाती है। वह इस पर आँसू बहाने लगती है और उसे अपनी दया के लिए आशीर्वाद देती है। यही कहानी का यथार्थ है।
नमक का दारोगा

 नमक का दारोगा कहानी समाज की यथार्थ स्थिति को उद्घाटित करती है। कहानी के नायक मुंशी वंशीधर एक ईमानदार और कर्तव्यपरायण व्यक्ति है, जो समाज में ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की मिशाल कायम करता है। पंडित अलोपीदीन दातागंज के सबसे अधिक अमीर और इज्जतदार व्यक्ति थे। जिनकी राजनीति में भी अच्छी पकड़ थी। अधिकांश अधिकारी उनके अहसान तले दबे हुए थे। अलोपीदीन ने धन के बल पर सभी वर्गों के व्यक्तियों पर अपनी धाक जमा रखी थी। दारोगा मुंशी वंशीधर उसकी नमक की गाड़ियों को पकड़ लेता है और अलोपीदीन को अदालत में गुनाहगार के रूप में प्रस्तुत करता है, लेकिन वकील और प्रशासनिक आधिकारी उसे निर्दोष साबित कर देते हैं, जिसके बाद वंशीधर को नौकरी से बेदखल कर दिया जाता है। इसके उपरांत पंडित अलोपीदीन, वंशीधर के घर जाकर माफी माँगता है और अपने कारोबार में स्थाई मैनेजर बना देता है तथा उसकी  ईमानदारी और कर्त्तव्य निष्ठा के आगे नतमस्तक हो जाता है।
कफन 

प्रेंमचंद की कहानी 'कफन' ऐसे बाप-बेटों की कहानी है, जो बेहद गरीब हैं। जिसमें बाप और बेटा दोनों एक बुझे हुए अलाव के सामने चुपचाप बैठे हुए हैं और अंदर बेटे की जवान बीवी बुधिया प्रसव वेदना से पछाड़ खा रही थी। रह-रहकर उसके मुँह से ऐसी दिल हिला देने वाली आवाज़ निकलती थी कि दोनों कलेजा थाम लेते थे। जाड़ों की रात थी, प्रकृत्ति सन्नाटे में डूबी हुई, सारा गाँव अंधकार में लय हो गया था। जब निसंग भाव से कहता है कि वह बचेगी नहीं तो माधव चिढ़कर उत्तर देता है कि मरना है तो जल्दी ही क्यों नहीं मर जाती, देखकर भी वह क्या कर लेगा। लगता है जैसे कहानी के प्रारंभ में ही बड़े सांकेतिक ढंग से प्रेमचंद इशारा कर रहे हैं और भाव का अँधकार में लय हो जाना मानो पूँजीवादी व्यवस्था का ही प्रगाढ़ होता हुआ अंधेरा है जो सारे मानवीय मूल्यों, सद्भाव और आत्मीयता को रौंदता हुआ निर्मम भाव से बढ़ता जा रहा है। इस औरत ने घर को एक व्यवस्था दी थी, पिसाई करके या घास छीलकर वह इन दोनों बेगैरतों का दोजख (पेट) भरती रही है। और आज ये दोनों इंतजार में है कि वह मर जाये, तो आराम से सोयें। आकाशवृत्ति पर जिंदा रहने वाले बाप-बेटे के लिए भुने हुए आलुओं की कीमत उस मरती हुई औरत से ज्यादा है। उनमें कोई भी इस डर से उसे देखने नहीं जाना चाहता कि उसके जाने पर दूसरा आदमी सारे आलू खा जायेगा।
पूस की रात
प्रेंमचंद ने 'पूस की रात' कहानी  में भारतीय किसान की लाचारी उसके जीवन कड़ला सच तथा उसके रहन-सहन का यथार्थ चित्रण किया है। दूसरे शब्दों में कहें तो कहानी कृषक जीवन, उसकी त्रासदी और यथार्थ को दिखाती नज़र आती है। कहानी का नायक हल्कू एक गरीब किसान है, जो अपनी पत्नी के साथ दिखाया गया है। वह खेती करता है पर आमदानी कुछ भी नहीं थी। उसकी पत्नी खेती करना छोडकर और कहीं मजदूरी करने को कहती थी। हल्कू के लगान के तीर पर दूसरों की खेती थी। खेत के मालिक का बकाया था। हल्कू ने अपनी पत्नी से तीन रुपए माँगे। पत्नी ने देने से इनकार किया, ये तीन रुपिए जाडे की रातों से बचने के लिए, कंबल खरीदने के लिये जमा करके रखे थे। लेकिन जमींदार आकर उन्हें ले जाता है। बाद में पूस की रातें जब आती हैं, तो किसान के पास उससे बचने का कोई साधन नहीं था। वह खेत में अलाव जलाता है तो कभी अपने कुत्ते को गोद में लेकर उससे सर्दी भगाने का काम करता है। लेकिन ठंड़ कम होने का नाम नहीं लेती। रात इतनी बड़ी है कि अब कट भी नहीं रही है। जैसे ही सुबह आँख लगती है तो देखते है कि रात में खेत को नीलगाय बर्बाद कर चुके होते हैं। यह कहानी खेती-किसानी और कृषक जीवन की कठिनाई बयान करती है, साथ ही पयालनवाद पर चोट करती है और लोगों को मजदूरी की ओर ले जाती है। गाँव में जमींदार का रौब दिखाया गया है। लगान, ऋण की मार किसान पर हमेशा बनी रहती है।
पंच परमेश्वर

यह कहानी अलगू चौधरी और जुम्मन सेख दो मित्रों की है। दूसरे दृष्टिकोण से देखें तो यह कहानी दो धर्मों और उनके बीच आपसी विश्वास, प्रेम, रहन-सहन को भी दिखाती है। नाम के अनुसार दोनों एक हिन्दू धर्म के और दूसरा मुस्लिम धर्म के हैं। फिर भी दोनों के बीच काफी गहरी मित्रता है। जुम्मन सेख की एक खाला (मासी) जो दूर के रिश्तेदार में था, परन्तु उस बुढ़िया का कोई और नहीं था। बुढ़िया के पास काफी जमीन जायदाद थी।  जुम्मन का परिवार खाला का विशेष खातिर सम्मान रखते था। जुम्मन अपनी खाला से कह सुनकर कुछ दिनों के बाद जमीं के रजिस्ट्री अपने नाम करवा लिया।
रजिस्ट्री के कुछ दिनों के बाद बुढ़िया की खातिर एवं सम्मान में कमी होने लगी। एक दिन ऐसा भी देखने को आया की अब बुढ़िया को खाने और पहनने के भी लाले पर गये और सब ताने देने लगे। रोज-रोज के तानों से तंग आकर बुढिया ने जुम्मन सेख से पंचायत बैठाने की बात कही। जुम्मन सेख को यह विश्वास था की मेरे विरोध में गाँव का कोई भी पंच फैसला नहीं करेंगे।
एक दिन किसी बात की परवाह न करते हुए बुढिया ने जुम्मन के दोस्त अलगू चौधरी के पास पहुँचकर साँस लेकर बोली बेटा तुम ही मेरा पंच बनकर न्याय कर मुझ पर उपकार करो। क्योंकि गाँव का कोई भी व्यक्ति मेरे साथ खड़ा होने को तैयार नहीं है। इस पर अलगू चौधरी ने कहा की तुम तो जानती तो के मैं जुम्मन सेख का परम मित्र हूँ, मैं उनके खिलाफ कैसे बोल सकता हूँ। इसपर बुढिया ने अलगू चौधरी से कहा कि दोस्ती टूटने के भय से इमान की बात नहीं कहोगे, इमान से बढकर क्या कोई दोस्ती होती है। बुढ़िया की यह बात अलगू चौधरी को झकझोर कर रख दिया और अलगू चौधरी ने बुढ़िया को पंच बनने की हाँ भर दी।
अगले ही दिन संध्या समय पीपल वृझ के नीचे पंचायत बुलाई गयी। पंचायत में जुम्मन सेख से पुछा गया की आप पंच किसे मानते हो? इसपर जुम्मन सेख ने कहा की खाला जिसे चाहे उसे पंच चुन ले। तो इसपर बुढिया ने कहा की मैं अलगू चौधरी को अपना पंच चुनती हूँ। वह जो न्याय देगा मुझे मान्य है। यह सुनकर जुम्मन सेख बहुत ही प्रसन्न हुए की न्याय मेरे तरफ ही होगा। परन्तु कहा जाता है की पंच के मुँह से जो न्याय होता है वह स्वयं परमेश्वर का होता है। अलगू चौधरी ने पंच के पद पर बैठकर कहा की बुढिया के जमीन जायदाद से इतना तो अवश्य ही आय होता है जिससे की बुढिया का जीवन अच्छे से चल सके और उसका गुजर-बसर हो सके, इसका मतलब जुम्मन सेख को अपनी खाला को मासिक खर्च देना उचित है और यही पंच की वाणी है। 
जुम्मन सेख यह सब सुनकर दंग रह गया और पंचायत समाप्त हो गई। दोनों मित्रों के बीच दरार पड़ गई। संजोगवश अलगू चौधरी ने खेती के वास्ते एक जोड़ी बैल खरीद कर लाए बैलों को देखने के लिए गाँव के लोग प्रतिदिन आने लगे। संजोग से एक दिन एक बैल की मृत्यु हो गयी। अब मात्र एक बैल बचा। उसे भी अलगू चौधरी ने संभु साहू के हाथ उधर बेच दिया। संभु साहू ने बैल से इतना अधिक काम लिया की बैल एक दिन स्वर्ग सिधार गये। अलगू चौधरी जब संभु साहू से बैल की कीमत मांगते तो बातें टालकर समय बिताने लग जाते। एक दिन अलगू चौधरी की पत्नी संभु साहू के घर जाकर बैल की कीमत मांगी तो उलटे संभु साहू की पत्नी के कही, कम्बक्त ने ऐसा बैल दिया के जिसके चलते हमारा सारा धन चोर लूट ले गये। व्यापार करते समय रास्ते में ही माल से भरी बैलगाड़ी खींचते-खींचते रात में बैल ने अपने प्राण त्याग दिए। जिसके करण रात में चोर सारा धन लूट ले गये। इस तरह से बात काफी आगे बढ़ गयी और उन्होंने कीमत देने से इंकार कर दिया। 
लाचार होकर चौधरी ने पंचायत बुलाई, फिर वही पीपल के पेड़ के नीचे संध्या में पंच लोग न्याय देने के लिए बैठ गये। अलगू चौधरी से पुछा गया भाई आप किसे पंच मानते हो। उसने साफ़ शब्द में कह दिया की संभु साहू जिसे चाहे पंच मान ले इसमें मुझे कोई ऐतराज़ नहीं। संभु साहू ने जुम्मन सेख को ही पंच चुना। अब अलगू चौधरी को लगने लगा की जुम्मन सेख उसके पक्ष में न्याय नहीं देगा। जुम्मन सेख भी इस बात पर उछल पड़ा की अब न्याय मेरे हाथ में है। निश्चय ही अलगू चौधरी से बदला लूँगा। 
परन्तु पंच के पद पर बैठते ही जुम्मन सेख के आत्मा से ऐसे न्याय निकला की सब लोग दंग रह गये। जुम्मन ने सभी बातों को भुलाकर अलगू चौधरी के पक्ष में न्याय दिया की बैल कमजोर या रोग से ग्रसित नहीं था जिससे उसकी मौत हुई बल्कि बैल से संभु साहू ने बैल से इतना कठिन परिश्रम कराया और उसके चारा पानी का भी ध्यान नहीं रखता मात्र बैल से कठिन काम लेने के कारण उनके प्राण निकल गये।  
इसमें सारी लगती संभु साहू की है जिसके कारण बैल मर गया। पंच यही न्याय देता है की संभु साहू को बैल का उचित कीमत देनी होगी। जुम्मन सेख जब पंच के पद पर आशिन हुआ तो उन्हें ऐसा प्रतीत हुआ की वास्तव में पंच के मुख से जो वाणी निकलती है वह स्वयं परमेश्वर के मुख से निकलती है। इसमें थोड़ा भी संदेह नहीं न्याय के बाद दोनों मित्र इस तरह से आपस में मिले की मानो कई साला से सूखे हुए पेड़ों में बसंत आ गया हो। पंचायत हर्षो उल्लास के साथ समाप्त हुआ।
'दो बैलों की कथा'

कहानी 'दो बैलों की कथा'  कहानी हीरा-मोती नाम के बैलों की कहानी है। जो आपस में बेहद प्रेमपूर्ण तरीके से रहते हैं। सभी सुख-दुख साथ झेलते हैं। कहानी में झूरी है, जो दोनों का मालिक है। कहानी में झूरी की पत्नी है, जो हीरा-मोती से प्रेम करती है। कहानी में झूरी का साला गया भी है, जो क्रूर है। वो हीरा-मोती को अपने घर ले जाता है, पर हांड तोड़ मेहनत तो लेता है, खाने को कुछ नहीं देता। दोनों बैल वहाँ से भाग निकलते हैं। रास्ते में सांड से लड़ाई होती है, जिसमें दोनों बैल बाजी मार जाते हैं और तमाम मुश्किलों को झेलते हुए वापस झूरी तक पहुँचते हैं, जो दोनों को गले से लगा लेता है। इस कहानी में प्रेमचंद ने जानवरों की समझदारी और इंसानी प्रेम को दर्शाया गया है। इतना ही नहीं कहानी स्वतंत्रता संग्राम के गरम दल और नरम दल की स्थिति को भी दिखाती है। क्योंकि दोनों बैल इस बात का प्रतीक भी हैं।
प्रेम की होली
प्रेम की होली कहानी होली पर्व के साथ-साथ भारतीय नारी के प्रेम और व्यवस्था को उजागर करती नज़र आती है। कहानी की मुख्य पात्र गंगी जो 17 वर्ष की है, जिसका बाल विवाह हुआ है और तीन साल पहले विधवा भी हो गई है। पिता के घर रहती है और कोई सहारा नहीं है। पिता मैकू महतो के पास रहकर पशुओं, खेत-खलियान और घर का काम करती है। भाई की शादी हो चुकी है। होली के दिन गरीब सिंह जो बुद्धु सिंह ठाकुर का लड़का है, उसकी भेंट गंगी से होती है। यहीं से दोनों के बीच आँखों-आँखों में प्यार शुरू होता है। लेकिन कहता कोई किसी से नहीं है।
     गरीब सिंह एक दिन मैकू महतो से मिला। महतो ने ठाकुर का हाल चाल जाना तथा बीमार दिखाई देने पर बीमारी के बारे में पूछ ही लिया। ठाकुर ने मैकू महतो को अपनी बीमारी के बारे में विस्तार से बताया। दिन बीतते गए और फिर होली आयी। ढोल, भंग और गान हुआ। लेकिन इस बार ठाकुर गरीब सिंह नहीं आया। जब गंगी शाम को छत पर चढ़कर देखा तो दूर चिता जल रही थी, गंगी इसे होलिका दहन समझ रही थी। लेकिन जब पता चलता है कि वह होलिका दहन नहीं, बल्कि गरीब सिंह की चिता जल रही थी, गंगी वहीं ठहर सी जाती है। कहानी का अंत दुखद दिखाकर कहानीकार ने समाज की कई बातों को आत्मसात करके कहने का मन बनाया है। कहानी के बिंदुओं की ओर ध्यान दें तो कई सारी बातें एक साथ उभरकर आती हैं।
1.     बाल विवाह
2.     जातिगत भेदभाव
3.     ग्रामीण जीवन की त्रासदी
4.     ऊँच नीच का भेदभाव
5.     विधवा पुनर्विवाह
6.     असफल प्रेम कहानी
बेटों बाली विधवा
सन् 1932 में प्रकाश में आयी यह कहानी प्रेमचंद के अंतिम दौर की कहानियों में है। यहाँ तक प्रेमचंद की कलम लोगों के दिलो-दिमाग में अपना अलग ही स्थान बना चुकी थी। फूलमती के पति पं. अयोध्यानाथ का निधन हो चुका था, उसके चार बेटे और एक बेटी थी- कामतानाथ, उमानाथ, दीनानाथ, सीतानाथ और बेटी कुमुद। जो शादी के लायक हो गई थी। कामतानाथ दफ्तर में पाँच रूपये पर नौकर था, उमानाथ डॉक्टरी पास कर चुका था, दीनानाथ बी.ए. में फैल होकर पत्रिकाओं में लेख लिखता था, सीतानाथ एम.ए. कर रहा था। पूरी कहानी में चारों भाई पिता की संपत्ति हथियाने और माँ के पास रखे जेवर लेने पर लगे हुए थे। सभी को अपना-अपना हिस्सा चाहिए था। लेकिन कुमुद की शादी के बारे में कोई भी नहीं सोच रहा था।
     कुमुद की शादी 40 वर्ष के एक अधेड़ उम्र के व्यक्ति दीनदयाल के साथ कर दी गई। शादी के बाद माँ कुमुद को खाली हाथ घर से न जाए इसीलिए कुछ पैसे देती है। लेकिन बेटी का हृदय बहुत विशाल है वह माँ को ही उस पैसे को वापस दे देती है।
     कहानी का अंत बड़ा ही दुखद है। माँ और बेटी को दुख देने के कारण कामतानाथ टाईफाईड से मर गया। दीनानाथ को छह महीने की सजा हुई। उमानाथ रिश्वत लेते पकड़ा गया और उसकी सनद छीन गई।
 आलोचना
इस कहानी में प्रेमचंद ने पहले ही पहरे में चारों भाइयों की शादी दिखाई है, जिसका संवाद इस प्रकार है- चारों बहुएँ एक-से-एक बढ़कर आज्ञाकारिणी। जबकि कहानी के मध्य में सीतानाथ के विवाह की बात होती है, जो इस प्रकार है- सीतानाथ सबसे छोटा था। सिर झुकाये भाइयों की स्वार्थ भरी बातें सुन-सुनकर कुछ कहने के लिए उतावला हो रहा था। अपना नाम सुनते ही बोला- मेरे विवाह की आप लोग चिन्ता न करें।
कहानी के बिंदुओं पर बात करें तो-
1.     वृद्ध समासाय
2.     पारिवारिक कलह (संघर्ष)
3.     अनमेल विवाह
4.     ग्रामीण जीवन
5.     रीति-रिवाज
6.     नैतिक मूल्यों को दृष्टिगत करना
घासवाली
घासवाली एक रोचक प्रेम कहानी है। प्रेम के अलग ही स्वरूप को दिखलाती यह कहानी पतिव्रता धर्म को निभाती भी दिखाई देती है। कहानी में मुलिया को दलित जाति का दिखाया गया है। मुलिया के सुंदर शरीर के साथ-साथ अच्छे व्यवहार को भी दिखाया गया है। मुलिया का पति महावीर नेक और सच्चा व्यक्ति, जो ताँगा चलाने का काम करता है। कहानी में लेखक ने दिखाने का प्रयास किया है कि निम्न जाति में सुंदरता और वहाँ भी गरीबी तो वह कैसे लोगों के लिए अभिशाप बन जाता है। लेकिन सुंदर मन हो तो सभी कुछ बदल जाता है। मुलिया का अपना कोई खेत नहीं है वह इधर-उधर से घास खोदती है और उसे बाज़ार में बेचने जाती है तो लोग उस पर बुरी नज़र रखते हैं। बुरी नज़र रखने वालों में ठाकुर चैनसिंह भी है, जो एक दिन मुलिया का हाथ पकड़ लेता है। मुलिया के व्यंग्य बाणों और समझदार संवाद को सुनकर ठाकुर का हृदय परिवर्तन हो जाता है।
     एक दिन मुलिया बाज़ार में घास बेचने गई थी और लोग उसके बारे में कुछ अच्छा तो कुछ बुरा कह रहे थे। यह बात चैनसिंह ने सुनी। घर जाकर चैनसिंह ने मुलिया के पति महावीर को बुलाता है और मुलिया को कभी बाज़ार घास न बैचने के लिए कहता है साथ ही साथ महावीर को अपने खेतों में काम करने के लिए भी कहता है। इतना ही नहीं रोजाना एक रूपया फ्री में घर से ले जाने के लिए कहता है, जो की घोड़े का कर्ज उतारने के लिए है। लेकिन यह बात मुलिया को पता न चले इसके लिए वह महावीर को कह देता है।
     एक दिन मुलिया चैनसिंह के पीछे-पीछे दौड़े आती है, यह वही जगह होती है जब पहली बार चैनसिंह ने मुलिया का हाथ पकड़ा था। मुलिया चैनसिंह को महावीर को कही सारी बात बता देती है। ठाकुर कहता है कि मैंने तो महावीर को यह सभी कुछ बताने के लिए नहीं कहा था, अब तुम्हें पता ही चल गया तो क्या। मुलिया सारी बात बताकर चली जाती है। चैनसिंह उसे दूर से निहारता रहता है।
कहानी के महत्वपूर्ण तथ्य
1.     नारी चित्रण
2.     व्यक्तित्व का बदलता स्वरूप
3.     ग्रामीण जीवन (ऋण या कर्ज समस्या)
4.     प्रेम में विश्वास
5.     सामाजिक चित्रण
जुलूस
जुलूस देश-भक्ति से प्रेरित कहानी है। इसमें लेखक ने स्वतंत्रता से पूर्व की अंग्रेजों द्वारा भारतीयों के आंदोलनों के दबाए जाने की कहानी है। साथ ही साथ हृदय परिवर्तन की भी कहानी है, क्योंकि अंग्रेजी फौज या सेना में भारतीय लोग ही रहते थे, सिर्फ अधिकारी अंग्रेज होते थे। ऐसे ही बीरबल सिंह जो दरोगा के पद पर है और अपने घोड़े पर बैठकर जुलूस को रोकने जाते हैं। अपने फर्ज और ईमान के आगे वह अपनी ड्यूटी करते हैं। लेकिन इब्राहिम के सिर पर दारोगा का बेटन लगने से उसकी मौत हो गई। जन आक्रोश शांत हुआ कितने ही लोग घायल हुए। दारोगा बीरबल सिंह का अंग्रेजों की नज़र में नाम हुआ। लेकिन अपने ही लोगों से हार गए। पत्नी मिट्ठन बाई ने बीरबल सिंह के इस काम की आलोचना की और उन्हें ऐसा न करने की बात कही।
     इब्राहिम की मौत ने बीरबल सिंह का हृदय परिवर्तन कर दिया। इब्राहिम के घर पर मिट्ठन शोक सभा में जाती हैं, जहाँ उसे अपने पति को भी आते देखा। बीरबल सिंह का यह हृदय परिवर्तन दिखाता है कि स्वतंत्रता सभी के हृदय में थी। पर फर्ज के हाथों कभी-कभी अपने ही लोगों पर हथियार चलाना पड़ता था।
कहानी के बिंदु-
1.     स्वतंत्रता आंदोलन की कहानी
2.     हृदय परिवर्तन
3.     सच्ची देश-भक्ति
4.     धर्म और जाति का मेल
5.     फर्ज, ईमान और आत्मीयता की कहानी

बलिदान
सन् 1918 में प्रकाश में आयी बलिदान कहानी कृषक जीवन उसकी त्रासदी, ऋण, लगान, मजदूरी, गरीबी, जमींदारी आदि के आत्याचार की कहानी है। कहानी में हरखू किसान के पास पाँच बीघा जमीन है और दो बैल। उसी में बोता खाता था। परिवार नहीं था, अकेला रहता था, अचानक ज्वर आया और उसी में चल बसा। गिरधारी और उसकी पत्नी सुभागी ने हरखू के क्रियाकर्म में और ब्राह्मणों के भोज में पैसा लगाया। जिससे वह ज्यादा ही कर्ज में डूब गया। हरखू के मरते ही जमीन पर हक गिरधारी का होना चाहिए था। लेकिन लाला ओंकारनाथ ने गिरधारी से हरखु की जमीन के लिए नजराना माँगा और आठ रूपये बीधे के हिसाब से जोतने को कहा। गिरधारी पहले ही कर्ज में था। अब वह यह पैसे कैसे देता।
     लाला ओंकारनाथ ने पैसे अधिक के लालच में जमीन कालिदीन, जो गाँव का मुखिया था उसे दे दी। एक दिन तुलसी बनिया गिरधारी के घर उधार के पैसे माँगने आया अब न जमीन न काम ऐसे में बैल बेचने के सिवाय कोई दूसरा रास्ता न था। गिरधारी ने बैल बेचकर कर्ज चुकता किया। लेकिन इस सदमें को वह सह न सका और दुनिया से चल बसा।
     गिरधारी का बड़ा बेटा ईंट के भट्टे पर काम करने लगा। सुभागी दूसरे गाँव में रहने लगी, क्योंकि मजदूर का बेटा और बहू हैं, जो उस समय बुरा माना जाता था। गिरधारी की आत्मा खेतों में मँडराती रहती है, कोई खेत में जाने की हिम्मत नहीं करता। खेत खाली पड़े हैं।
कहानी के बिंदु-
1.     कर्ज और ऋण की समस्या
2.     जमींदार का अत्याचार
3.     रीति-रिवाजों पर कुठाराघात
4.     कृषक जीवन
5.     गरीबी में घुटता-मरता इंसान
सुजान भगत
     सन् 1927 में प्रकाश में आयी कहानी सुनाज भगत पारिवारिक जिम्मेदारी, आत्मविश्वास, वृद्ध का सम्मान, रीति-रिवाज, सामाजिक जीवन आदि कितने ही विषयों को लेकर हमारे समाने खड़ी होती है। कहानी में सुजान महत्तो किसानी करता है और भगवत भजन में अपना जीवन बिताता है। बेटों की शादी हो गई, अब खेत में कम भजन में समय अधिक लगाना चाहता है, सुजान की पत्नी बुलाकी भी पति सेवा और द्वार पर आए किसी भक्त, साधु, संत को खाली हाथ न जाने देती थी। घर की व्यवस्थाएँ बदली तो काम बेटों-बहुओं के हाथ में चला गया था, जिससे हमेशा सुजान और बुलाकी को डर बना रहता था। एक दिन बड़े लड़के भोला ने माँ के द्वारा भिखारी को दाल दान करते हुए देख लिया और भड़क गया। मेहनत को ऐसी ही मत उड़ाओ वाक्य को सुनकर माँ जस की तस बनी रह गई।
     सुजान भगत ने दोबारा कमर कसी और सुबह जल्दी उठना शुरू किया, बैलों को लेकर खेत में जाना शुरू किया। दिन-रात मेहनत कर खेतों को सुधार दिया और खेत सोना उगलने लगे। हर बार से अब की बार दस मन अनाज ज्यादा हुआ। अनाज घर पर ही पहुँचा था  तभी द्वार पर भिक्षुक आया और सुजान भगत ने दिल खोलकर उसे जितना तुम उठा सकते हो उतना ले जाओ कहकर दान दिया। अब उसे कोई रोकने वाला नहीं था। सुजान भगत दान करने में पीछे न था। बेटा बैठा-बैठा देख रहा था। लेकिन कह कुछ नहीं सकता है, मेहनत रंग लाई थी, दान बढ़ाकर देता है, साधु-संतों का आशीर्वाद था, दया धर्म का मूल है और सेवा से बड़ा कोई धर्म नहीं है।
कहानी के बिंदु-
1.     कृषक जीवन
2.     पारिवारिक संघर्ष
3.     मानव की मेहनत
4.     वृद्ध सम्मान
5.     दान-पुण्य का महत्त्व





प्रेमचन्द की कहानियाँ
1. सांसारिक प्रेम और देश प्रेम-1908 नायक-मैजिनी और मैग्डलीन के पवित्र प्रेम की कहानी।
2. दुनिया का सबसे अनमोल रत्न- 1908 नायक-दिलफिगार, दिलफरेब की प्रेम कहानी।
3. शेख मखमूर- 1908 देश प्रेम की कहानी है इसमें नायक शेख मखमूर अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त करता है। 4. शोक का पुरुस्कार- 1908 पति-पत्नी और प्रेमिका की कहानी है, इसमें कथावाचक और उसकी पत्नी कुमुदिनी तथा प्रेमिका लीला के जीवन का प्रेम है।
5. यह मेरी मातृभूमि- 1908 मातृभूमि के प्रति प्रेम दिखाया गया है।
6. पाप का अग्निकुंड- 1910 धर्मसिंह द्वारा गाय की हत्या करने और ब्रजविलासीनी द्वारा हत्या का बदला लेने पर आधारित है
 7. शाप- 1910 बर्लिन (जर्मनी) के एक विश्व यात्री द्वारा भारत यात्रा के संस्मरण के रूप में लिखी गई है।
8. शिकार- 1910 नायक- कुँवर सिंह पत्नी वसुधा जो अपने पति के प्राणों की रक्षा शेर का शिकार करके करती है।
9. रानी सारंधा- 1910 मुगलों और राजपुतों के बीच लड़ाई की कहानी है।
10. बड़े घर की बेडी-1910 नायक- श्रीकंठ पत्नी-आनंदी, देवर लाल बिहारी। पारिवारिक कहानी है।
11. राजा हरदौल- 1911 नायक- जुझार सिंह-पत्नी कुलीना और भाई छत्रशाल। पत्नी पर छत्रशाल के साथ शंका होने पर छत्रशाल मौत को गले लगा लेता है।
12. आखरी मंजिल-1911 प्रेम कहानी है।
13. गरीब की हाय-1911 मुख्तार सिंह द्वारा गरीब औरत का सभी कुछ छीन लेना और औरत का पागल होना दिखाया गया है।
14. आल्हा 1912 आल्हा और ऊदल दो भाइयों के पराक्रम की कहानी है।
15. ममता- 1912 कहानी में रामरक्षा दास और गिरधारी लाल दो मित्रों की है।
16. नसीहतों का दफ्तर 1912 नायक- अक्षय, पत्नी हेमवती, पति द्वारा हर बात पर नसीहत देने की कहानी है। 17. अमावस्या की रात्री-1913 पं. देवदत की पत्नी गिरजा बीमार होती है, अमावस्या की रात होती है पत्नी मर जाती है।
18. धर्म संकट-1913 नायक- रूपचंद और प्रेमिका कामिनी जिसकी शादी हो गई है। कामिनी के कहने पर एक दिन दोनों मिलते हैं।
19. शंख नाद- 1913 मानु चौधरी के तीन पुत्र बितान, शान और गुमान। गुमान की शादी हो जाती है और वह कुछ नहीं कमाता बेटे को पिटता है तो उसके अंदर शंखनाद होती है।
20. नमक का दरोगा- 1913 पं. अलोपीदीन(पैसे वाला) की नमक की गाड़ियाँ पकडी जाती है तो वंशीधर उसे किसी कीमत पर नहीं छोड़ता। वंशीधर की नौकरी चली गई।
21. खून सफेद-1914 किसान जादोराय का बेटा साधो पादरी हो जाता है।
22. शिकारी राजकुमार-1914
23. परीक्षा-1914 हिंदी में प्रकाशित होने वाली पहली कहानी। देवगढ़ के दीवान सुजानसिंह के द्वारा दीवान की खोज। पं. जानकीनाथ का दीवान बनना
24. पछतावा-1914 कहानी पं. दर्गानाथ की ईमानदारी को दिखाती है।
25. विस्मृति-1915 भाई-बहन के प्रेम की कहानी
26. बेटी का धन-1915 सुक्खु अपनी बेटी के गहने झगडू साहू के पास रखता है।
27. दो भाई-1916 केदार और माधव दो भाई हैं केदार की पत्नी चंपा दोनों को अलग कर देती है।
28. सज्जनता का दंड़-1916 सरदार शिव सिंह न तो लूटते है और न लूटने देते हैं।
29. पंच परमेश्वर-1916 अलगू और जुम्मन दो मित्रों की कहानी है।
30. धोखा-1916 गायक और हरिश्चन्द्र दोनों एक है, प्रभा प्रेमी एवं पति के द्वंद्व से निकलती है।