गुरुवार, 16 जनवरी 2020
शनिवार, 7 दिसंबर 2019
आठ प्रहर
आठ प्रहर
सूर्य और तारों से रहित दिन-रात की संधि को तत्वदर्शी मुनियों ने
संध्याकाल माना है। हिन्दू धर्म में समय की बहुत ही वृहत्तर धारणा
है। आमतौर पर वर्तमान में सेकंड, मिनट, घंटे, दिन-रात, माह, वर्ष, दशक और शताब्दी तक की ही प्रचलित धारणा है, लेकिन हिन्दू धर्म में एक अणु, तृसरेणु, त्रुटि, वेध, लावा, निमेष, क्षण, काष्ठा, लघु,
दंड, मुहूर्त, प्रहर या याम, दिवस, पक्ष, माह,
ऋतु, अयन, वर्ष (वर्ष के पांच भेद- संवत्सर, परिवत्सर, इद्वत्सर, अनुवत्सर, युगवत्सर), दिव्य वर्ष, युग, महायुग, मन्वंतर, कल्प, अंत में दो कल्प
मिलाकर ब्रह्मा का एक दिन और रात, तक की वृहत्तर समय पद्धति निर्धारित है। हिन्दू
धर्म अनुसार सभी लोकों का समय अलग अलग है। हम यहां जानकारी दे रहे हैं प्रहर की।
आठ प्रहर : हिन्दू धर्मानुसार दिन-रात मिलाकर 24 घंटे में आठ प्रहर
होते हैं। औसतन एक प्रहर तीन घंटे या साढ़े सात घटी का होता है जिसमें दो मुहूर्त
होते हैं। एक प्रहर एक घटी 24 मिनट की होती है। दिन के चार और रात के चार
मिलाकर कुल आठ प्रहर। इसी के आधार पर भारतीय शास्त्रीय संगीत में प्रत्येक राग के
गाने का समय निश्चित है। प्रत्येक राग प्रहर अनुसार निर्मित है।
संध्यावंदन : संध्यावंदन मुख्यत: दो प्रकार के प्रहर में की जाती है:- पूर्वान्ह
और उषा काल। संध्या उसे कहते हैं जहां दिन और रात का मिलन होता हो। संध्यकाल में
ही प्रार्थना या पूजा-आरती की जाती है ,यही नियम है। दिन और
रात के 12 से 4 बजे के बीच प्रार्थना या आरती वर्जित मानी गई है।
आठ प्रहर के नाम : दिन के चार प्रहर- 1.पूर्वान्ह, 2.मध्यान्ह, 3.अपरान्ह और 4.सायंकाल। रात के चार प्रहर- 5.प्रदोष, 6.निशिथ, 7.त्रियामा एवं 8.उषा।
आठ प्रहर : एक प्रहर तीन घंटे का होता है। सूर्योदय के समय
दिन का पहला प्रहर प्रारंभ होता है जिसे पूर्वान्ह कहा जाता है। दिन का दूसरा
प्रहर जब सूरज सिर पर आ जाता है तब तक रहता है जिसे मध्याह्न कहते हैं।
इसके बाद अपरान्ह (दोपहर बाद) का समय शुरू होता है, जो लगभग 4 बजे तक चलता है। 4 बजे बाद दिन अस्त तक
सायंकाल चलता है। फिर क्रमश: प्रदोष, निशिथ एवं उषा काल।
सायंकाल के बाद ही प्रार्थना करना चाहिए।
अष्टयाम : वैष्णव मन्दिरों में आठ प्रहर की सेवा-पूजा का
विधान 'अष्टयाम' कहा जाता है। वल्लभ सम्प्रदाय में मंगला, श्रृंगार, ग्वाल, राजभोग, उत्थापन, भोग, संध्या-आरती तथा शयन
के नाम से ये कीर्तन-सेवाएं हैं। अष्टयाम हिन्दी का अपना विशिष्ट काव्य-रूप जो
रीतिकाल में विशेष विकसित हुआ। इसमें कथा-प्रबन्ध नहीं होता परंतु कृष्ण या नायक
की दिन-रात की चर्या-विधि का सरस वर्णन होता है। यह नियम मध्यकाल में विकसित हुआ
जिसका शास्त्र से कोई संबंध नहीं।
सोमवार, 18 नवंबर 2019
शुक्रवार, 15 नवंबर 2019
दाम्पत्य जीवन का जवाब : कोई और सवाल (जय वर्मा) सात कदम कहानी-संग्रह
दाम्पत्य जीवन का जवाब : कोई और सवाल
डॉ. नीरज भारद्वाज
कहानी व्यक्ति की कल्पना, उत्सुकता एवं
जिज्ञासा के विस्तार के लिए होती है। कहानी हमारे मस्तिष्क में शब्द भंडार,
कल्पनाशीलता और सृजनात्मकता का विकास करती है। विचार करें तो कहानियाँ पढ़ने से
हमें अन्य लोगों के अनुभवों में प्रवेश करने का मौका मिलता है। इससे
हमें कौन, कहाँ और कैसे लिखता है? आदि कितने ही प्रश्नों को जानने का मौका मिलता
है। हीलिंग द माइंड थ्रू द पावन ऑफ स्टोरी में डॉ. लुइस मेहल मेडरोना कहती
हैं- 'कहानियों के जरिए दिमाग बाहरी दुनिया का
नक्शा तैयार करता है। बार-बार एक ही तरह की कहानी से दिमाग उसी नक्शे के अनुसार
प्रतिक्रिया देने लगता है।' कहानी
शब्दजाल नहीं, बल्कि कहानीकार का जीवन-दर्शन कराता है। कहानी विधा में समय के साथ
परिवर्तन हुआ है और होता रहेगा, क्योंकि परिवर्तन प्रकृति का नियम है। कहानियों के
विषय समाज, देशभक्ति, लोकसेवा, प्रेम, जासूसी आदि कितने ही रहे हैं। हर एक
कहानीकार इन विषयों को अपने हिसाब से दिखाता और समझाता है।
हमारे केंद्र में
प्रवासी साहित्यकार जय वर्मा और उनका कहानी-संग्रह सात कदम है। यहाँ केवल उनकी एक
कहानी कोई और सवाल पर चर्चा हो रही है। जय वर्मा ने अपनी कहानियों में
भारतीय और पाश्चात्य दोनों ही संस्कृतियों का मेल बढ़े ही सुंदर ढंग से किया है।
एक सफल साहित्यकार अपनी लेखनी से ही बताता है कि उसके अंदर कितनी प्रतिभा है, साथ
ही उनके पात्र हर एक दृश्य को उजागर कर देते हैं। कहानी-संग्रह के आरंभ में ही
लेखिका लिखती हैं कि- 'कहानीकार की
भूमिका यही है कि वह अपने अंदाज़ से विश्वास के साथ उन अनुभूतियों को एक कलेवर दे,
उन्हें जीवंत करे।' कहानीकार ने
अपनी कहानियों में इस बात का हर समय ख्याल रखा है। कहानी अपने कलेवर के साथ-साथ
पात्रों की संजिदगी से भी जीवित होती है, क्योंकि पात्र ही तो पाठक के मानसपटल पर
अपनी छाप छोड़ता है, जो युगों-योगों तक पाठक के अंदर समाज में जीवित रहता है।
पात्रों का संवाद ही तो सार्थकता को गढ़ता है। लेखिका लिखती हैं कि- 'मेरी कहानियों के किरदार भी कभी त्रस्त
होकर भटकते हैं तो कभी जटिल समस्याओं से पार पाकर अपना अभीष्ट भी प्राप्त करते
हैं। विविधता से भरे संसार में इससे छुटकारा भी तो नहीं।' ऐसा ही पात्र कोई और सवाल कहानी का डोरीन है। डोरीन नारी
पात्र होने के साथ-साथ कहानी की मुख्य पात्र है। पूरी कहानी डोरीन के साथ चलती है।
कहानी का पहली पंक्ति- 'आज डोरीन ने
आजादी की साँस ली!' और कहानी का
समापन भी डोरीन के घर छोड़न से होता है- 'इस समय वह अपने बच्चों, समाज या किसी अंज़ाम के बारे में नहीं सोच रही थी,
बस नये जीवन की तलाश में तेज़ गति से आगे बढ़ती जा रही थी।' (पेज-29)
नायिका
प्रधान इस कहानी में कहानीकार ने एक साथ बहुत सारे बिंदुओं पर प्रकाश डाला है, मूल
रूप से नारी को लेकर। समाज चाहे देशी हो या विदेशी समस्याएँ सभी जगह एक जैसी हैं।
कहानी में नारी-त्रासदी, नारी-मुक्ति, नारी-शोषण, नारी-चरित्र, नारी की गरिमा,
नारी का आत्मसम्मान आदि हैं। कहानी के आरंभ में ही डोरीन जब अपनी माँ से पीटर
जॉनसन के साथ सिविल मेरिज करने की बात करती है तो माँ का इराद तो शादी के विरूध था,
लेकिन संतान के आगे उसकी एक नहीं चली, 'अपने निर्णय पर पुनः विचार करना, बिना पढ़ाई पूरी किये शादी का फैसला उचित
नहीं है।' (पेज-22) इतना ही नहीं कहानी में दाम्पत्य जीवन का रंग अर्थात् पति-पत्नी के बीच
मधुर और कटू दोनों ही रिश्तों को दिखाया गया है। इतना ही नहीं कहानी में पारिवारिक
और आर्थिक स्थिति को भी उजागर किया गया है। मधुर संबंधों की बात करें तो, 'शादी के बाद पीटर और
डोरीन का दाम्पत्य जीवन प्रसन्नता और प्रेम के साथ तेज़ी से बीतने लाग। एक बेटा डेविड
तथा दो बेटियों को डोरीन ने जन्म दिया। बेटियों के नाम लूसी तथा एना
रखे।'
(पेज-23) जहाँ तक परिवार में अलगाव और भय की बात है, उसे भी लेखिका ने दिखाया है, 'पीटर से वह भयभीत
रहती...मॉम हमें डैडी से डर लगता है, अब वे हमें पहले जैसा प्यार नहीं करते।' (पेज-27) जहाँ
तक आर्थिक स्थिति की बात है डोरीन अपने पति के काम में हाथ बटाती थी, 'छोटे से फार्म पर
मुर्गियों के अंडे इक्ट्ठे करके अपने पति की सफेद रंग की चारों तरफ से जंग लगी
मिनी वैन में बाज़ार में बेचने के लिए रख देती।' (पेज-23) इतना ही नहीं बच्चे भी होश संभालते
ही काम में लग जाते हैं। 'डेविड ने चार्नवुड पार्क में ग्रीनकीपर के साथ माली का काम करना आरंभ कर दिया.....
दोनों बेटियाँ लूसी एवं एना दिन में पढ़ाई करती थीं और शाम के समय दोनों बुल-हैड
नाम के एक पब में काम करतीं।' (पेज-27) डोरीन घर बचाने का हर संभव प्रयास करती है। लेकिन पति पीटर के
व्यवहार से तंग आकर वह घर छोड़ने का निश्चय कर लेती है। वह किसी भी कीमत पर अपना
आत्मसम्मान नहीं खोना चाहती है।
विचार
करें तो कहानी अपने छोटे से कलेवर में पारिवारिक पृष्ठभूमि के साथ खड़ी होती है,
जहाँ प्यार, परिवार, सुख, एक दूसरे का हाथ बटाना आदि दिखाया गया। लेकिन धीरे-धीरे
कहानी अलगाव की ओर चली जाती है और जिसका अंत डोरीन के घर छोड़ने पर होता है। कहानी
में आत्मसम्मान, पति-पत्नी का द्वंद्व, आर्थिक तंगी, पारिवारिक घुटन, पुरूष की
बेरूखी, नारी का संघर्ष, चेतना, श्रम, प्रेम, अलगाव, विद्रोह सभी कुछ तो उभरकर आ
गया है। इन सभी बातों से अलग कहानीकार का प्रकृति प्रेम भी कहानी में देखने को
मिलता है, जब जहाँ मौका मिला वह प्रकृति की ओर हो लेती हैं, 'चार्नवुड लेस्टरशायर की छोटी-छोटी पहाड़ियों
के बीच में बसा एक रमणीक और आकर्षक गाँव है।' (पेज-21) ऐसे कई उदाहरण कहानी में हमें मिल
जाते हैं। कहानी की भाषा सहज और सरल रही है, जो पाठक को अपने से बाँधे रखती है।
कहानी नए मानव मूल्यों के साथ उभरी है और वह विश्व फलक पर अपना अलग ही स्थान रखती
है। अभी के लिए इतना ही, आगे फिर कभी, कोई और सवाल हमसे न पूछे।
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