शुक्रवार, 20 दिसंबर 2013

चश्मा बदल गया


चश्मा बदल गया डॉ. नीरज भारद्वाज चश्मा शब्द दिमाग में आते ही बहुत से प्रश्न खडे हो जाते हैं। आखिर किस चश्में की बात की जा रही है। आंखों पर पहनने वाले चश्में की या फिर पहाडी क्षेत्रों में पाए जाने वाले पानी के चश्में की। हमारी नई पीढी के युवा जो नई संस्कृति में जीवन जी रहे हैं। शायद उनमें से बहुत कम चश्में का यह दूसरा अर्थ समझ भी रहे हैं कि नहीं यह एक सोचने की बात है। पहाडी इलाकों में चश्मा शब्द खूब सुनने को मिल जाता है और चश्मों का पानी वहां के लोगों के जीवन का आधार भी होता है। पानी का चश्मा ऐसी जगह को बोलते हैं जहाँ ज़मीन में बनी दरार या छेद से ज़मीन के भीतर के किसी जलाशय का पानी अनायास ही बाहर बहता रहता है। चश्मे अक्सर ऐसे क्षेत्रों में बनते हैं। जहाँ धरती में कई दरारें और कटाव हो जिनमें बारिश, नदियों और झीलों का पानी प्रवेश कर जाए। फिर यह पानी जमीन के अन्दर ही प्राकृतिक नालियों और गुफ़ाओं में सफ़र करता हुआ किसी और जगह से ज़मीन से चश्मे के रूप में उभर आता है। कभी-कभी ज़मीन के अन्दर पानी किसी बड़े जलाशय में होता है, जो दबाव के कारण या पहाड़ी इलाक़ों में ऊंचाई से नीचे आते हुए ज़मीन के ऊपर चश्मों में से फटकर बाहर आता है। चश्में को अलग-अलग नामों से जाना जाता है। कश्मीरी में चश्मे को "नाग" बोलते हैं। कश्मीर में बहुत सी जगहों के नाम में यह आता है जैसे अनंतनाग (यानि वह स्थान जहाँ चश्मे ही चश्मे हों)। प्रकृति चक्र के बदलने के कारण आज चश्में लुप्त होते जा रहे हैं और पहाडी इलोकों में भी पीने के पानी समस्या लोगों के सामने आ रही है। पर्यटक जितना वहां के लोगों के लिए रोजगार बन रहे हैं। वहीं वह प्रकृति को जाने-अनजाने उसे खराब भी कर रहे हैं। यह बात तो हुई पानी के चश्में की अब बात करें आंखों पर लगाने वाले चश्में की जो महानगरीय जीवन में हर चौथे-पांचवें आदमी को लगा हुआ है। अब चश्में केवल नजर के ही नहीं रहे, बल्कि रंगीन चश्में बाजार में अधिक है और उस से भी हैरान करने वाली बात तो यह है कि अब चश्में आपके चहरे के हिसाब से बनने लगे हैं। आपके चहरे पर जो जमेगा वहीं चश्मा खरीदा या बेजा जा रहा है। आजादी से पहले नेता जी का चश्मा, कहने का भाव है कि सुभाषचंद्र बोस जी जो चश्मा लगाते थे वो और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का चश्मा काफी लोकप्रिय रहा। हिंदी में स्वयं प्रकाश जी ने नेता जी का चश्मा नाम से एक अध्याय भी लिखा है, जो बडा ही रोचक है। ऐसा नहीं है कि चश्में पर लिखा पढा नहीं गया है, बल्कि चश्मा तो शुरु से ही शोध का विषय रहा है। चश्में ने केवल लोगों को पढनें में मद्द ही नहीं कि बल्कि उसने दुनिया को रंगीन नजर से देखने का काम भी किया है और दुनिया को बदलने का काम भी किया है। वर्तमान संदर्भ में भारत में अन्ना जी का चश्मा और टोपी दोनों ही लोकप्रिय हुए हैं। उन्होनें लोगों के अंदर जो जाग्रति पैदा कि वह अपने आप में एक सबसे बडा उदाहरण है। हिंदी सिनेमा के एक गाने में अन्ना के जैसा चश्मा लगाकर पंक्ति को जोडकर लोगों के सामने रखा गया है। इस दृष्टि से अन्ना जी का चश्मा भी नहीं भूलाया जा सकता। वह वर्तमान परिस्थिति में परिवर्तन का सबसे बडा उदाहरण रहे हैं। अब आने वाले समय में परिवर्तन का यह चश्मा कौन लगाएगा देखना होगा। क्योंकि चश्में ने देश को हमेशा नई दिशा दी है। समय बदला तो चश्मा भी बदला और लोगों की सोच भी बदली। वर्तमान तक आते-आते चश्मा तो लोगों से इतना घूल मिल गया है कि अब तो चश्में के बिना जीवन यापन करना संभव ही नहीं है। फिल्म देखना है तो थ्रीडी चश्मा लगाकर देखों, फिल्म का मजा ही कुछ और होगा। इतना ही नहीं दुनिया की सबसे बड़ी सर्च इंजन कंपनी गूगल आपके लिए लेकर आई है एक चमत्कारी चश्मा गूगल ग्लास। इसमें आधुनिकता की बहुत सारी खूबियां भरी पडी है। इसमें बिल्ट इन वॉइस रेकग्निशन, ऑन बोर्ड और हैंड्स फ्री विडियो रिकॉर्डिंग की सुविधा है। आप इसके जरिए लाइव विडियो शेयर कर सकते हैं। आप बोलेंगे तस्वीर लो, आप यह चश्मा तस्वीर ले लेगा। आप बोलेंगे मेसेज भेजो और मेसेज तुरंत चला जाएगा। यह आपकी आवाज को सुनकर उसका ट्रांसलेशन कर सकता है। यह मजबूत और हल्का है। इसमें इन बिल्ट सर्च की सुविधा भी मौजूद है। इसमें कई कलर ऑप्शन भी मौजूद हैं। क्या चश्में का अभी और भी कुछ बदला बाकि है यह हमें देखना और सोचना होगा। संचार की यह नई सदी क्या और नया करने जा रही है। इसे आने वाला समय ही बता पाएगा। लेकिन यह जरुर कहा जा सकता है कि मानव का और चश्में का रिश्ता बहुत ही पुराना है, जिसे भूला देना संभव नहीं है। वास्तव में यह समय के साथ मजबुत होता गया है।

बुधवार, 4 दिसंबर 2013

देश का क्या हाल है।

देश का क्या हाल है। डॉ. नीरज भारद्वाज हर एक देशवासी को अपने देश से प्रेम होता है और वह हर समय अपने देश के बारे में सोचता रहता है। पत्रकार मन है इसी लिए सवालों का आना-जाना लगा ही रहता है। कई बार तो ऐसे सवाल दिमाग में आते हैं कि उनका जवाब ढूंढ निकालना बडा कठिन लगता है। लेकिन साहित्य तुरंत उनके जवाब दे देता है। इसी लिए पुस्तकों को छोडने का मन ही नहीं करता और उनसे हर समय जुडे रहने का मन करता रहता है। साहित्य अपने आप में एक ऐसा वृक्ष है जिसकी न जडों का पता और न ही उसके फैलाव का पता चल पाता है अर्थात् जितना उसकी गराई में जाओं उतना ही और जानने की कोशिश होती है। एक दिन घुमते फिरते दिमाग में कई सारे सवाल अपने ही आप पैदा हो गए और मैं उनकी खोज में कहीं ओर नहीं, बल्कि अपने ही समाज में निकल पडा और लोगों से बातें करता रहा। लेकिन मन शांत नहीं हुआ और मैं साहित्य के बारे में जानने के लिए 9 से 10 साल के बच्चों से, जो विद्यालय में पढते थे, उनसे जा मिला और उनसे हिंदी के कुछ रचनाकारों के नाम जानना चाहा, तो वह मेरे सवाल से ही घबरा गए। मैंने सोचा शायद आज की पीढी के लिए यह सवाल नया है, क्योंकि ये किताबें कम पढते होंगे और रचनाकारों के बारे में भी कम ही जानते होंगे। एक दो ने रचानाकर का नाम तो बता दिया। लेकिन उनकी रचना के नाम बताते समय अटक गए। तो मैंने सोचा इनसे सिनेमा जगत के कुछ नायक-नायिकाओं के बारे में जान लिया जाए, क्योंकि टेलीविजन तो यह रोज देखते हैं। मैंने फिल्म अभिनेता मनोज कुमार, जो अपने जामाने में भारत कुमार के नाम से विख्यात रहे उनके बारे में जानना चाहा तो सारे बच्चे मेरा मुंह ताकने लगे। मेरा सिर चकराया कि यह कैसे भावी नागरिक है न सिनेमा से जुडे न ही साहित्य से, फिर क्या होगा इस देश का। मेरे साथ चल रहे मित्र ने कहा कि किसी नए हिरो का नाम लो। तो मैंने उससे कहा कि किसी नए रचानाकर का नाम लूं। क्या ये उसके बारे में बता पाएंगे। उन्होंने उत्तर दिया नहीं भाई, तो फिर नए हिरो का नाम क्यों याद किए हुए है। वो भी कातर भरी नजरों से मुझे देखने लगे। मैंने कहा सवाल साहित्य और सिनेमा के बीच का नहीं है। सवाल आज की उस पीढी का है, जो केवल और केवल रोजाना का सोच रही है और अपने तक ही बंध कर रहना चाहती है। वह अपने परिवार, देश और दुनिया से नहीं जुडना चाह रही है, क्योंकि संयुक्त परिवारों का टूटना ही इस नए परिवेश और समाज का कारण है। जहां तक जानकारी की बात है आज का बच्चा इंटरनेट से जुडकर जान तो बहुत कुछ रहा है। लेकिन समझ कुछ नहीं रहा। वह केवल अपना हित चाहता है। इसी लिए सडक के किनारे कितने ही लोग सडक दुर्घटना में किसी की मदद न मिलने के कारण मर जाते हैं। कितने ही लोग धर्म और आस्था के नाम पर ठगे जाते हैं, कितने ही लोग विश्वास के नाम पर विश्वासघात कर उनके बच्चों का शोषण करते हैं और न जाने कितने ही अपराध हो रहे है। इन सभी बातों का जिम्मेदार कोई और नहीं, बल्कि हमारा बदलता समाज और उसकी बदलती सोच ही है। वर्तमान का भारत मेरी दृष्टि से रोजाना के बारे में जानने के लिए ही रह गया है। वह भूत और भविष्य से धीरे-धीरे दूर होता जा रहा है। लेकिन मेरे साहित्यकार मित्र निराश न हो, क्योंकि वही सही मायनों के भारत का सच्चा निर्माण करते हैं। जरुरत है अब ऐसी रचनाओं की जो युवा पीढी में फिर से जान डाल दे।