गुरुवार, 3 मार्च 2016

आदिकाल नामकरण और विशेषताएँ


आदिकाल का नामकरण
 ग्रियर्सन चारणकाल (युग)
मिश्रबंधु प्रारंभिक काल
रामचन्द्र शुकल वीरगाथा काल
राहुल सांकृत्यायन सिद्धसामंत काल
हजारी प्रसाद द्विवेदी आदिकाल
महावीर प्रसाद द्विवेदी बीजवपन काल
विश्वनाथ प्रसाद मिश्र वीरकाल
रमाशंकर शुक्ल रसाल आदिकाल
रामकुमार वर्मा संधिकाल एवं चारणकाल
आदिकाल का समय 8वीं सदी ग्रियर्सन, मिश्रबंधु, राहुल सांकृत्यायन, चंद्रधर शर्मा गुलेरी, रामकुमार वर्मा
9वीं सदी श्री जायसवाल
11वीं सदी आचार्य शुक्ल, श्याम सुंदर दास, हजारी प्रसाद द्विवेदी
रासो शब्द की व्युत्पत्ति रासो शब्द का ग्रहण सामान्यता दो रूपों में हुआ- 1. गेयमुक्त परंपरा 2. नृत्यगीत परक परंपरा।
आचार्य शुक्ल ने वीरगाथाओं का परिचय देते हुए कहा इस काल के अधिकांश कवि चारण थे।
 गार्सा द तासी राजसूय
रामचन्द्र शुकल रसायण
हजारी प्रसाद द्विवेदी रासक
नंद दुलारे वाजपेयी रास
नरोत्तम स्वामी रसिक
 रचना उल्लेख (12 ग्रंथ) अपभ्रंश भाषा समय रचना लेखक विशेषता
 सं. 1350 विजयपाल रासो नल्हसिंह भाट  इसमें विजयपाल सिंह और पंग राजा के युद्ध का वर्णन  प्रामाणिकता संदिग्ध
सं. 1375 हम्मीर रासो शारंगधर  प्रामाणिकता संदिग्ध
सं. 1460 कीर्तिलता विद्यापति  अवहट्ट भाषा- मैथिल युक्त विकसित अपभ्रंश है।
सं. 1460 कीर्तिपताला विद्यापति देशी भाषा समय रचना लेखक विशेषता
सं. 1190 खुमान रासो दलपति विजय  इसमें चितौड़ नरेश खुमाण के युद्धों का वर्णन है।  वीरगाथा ग्रंथों में उपलब्ध प्रथम ग्रंथ है।  कर्नल टाड ने इस पुस्तक की चर्चा विस्तार से की है।  प्रामाणिकता संदिग्ध
सं. 1292 बीसलदेव रासो नरपति नाल्ह  चरित काव्य, श्रृंगार प्रधान प्रेम काव्य माना, गेय मुक्तक  इसमें विवाह उपरांत पति-पत्नी के संपर्क में प्रेम दिखाया।
सं. 1225 पृथ्वीराज रासो चन्दवरदाई  डिंगल (राजस्थानी) वीररस के स्थान पर  पिंगल (ब्रजभाषा) श्रृंगार रस के स्थान पर  69 सर्ग जिसे समय कहा  शुक्ल- अप्रामाणिक, हजारी प्रसाद- अर्द्धप्रामाणिक  शहाबुद्दीन गौरी ने चौहान को बंदी बनाया।
सं. 1225 जयचन्द्र प्रकाश भट्ट केदार
 सं. 1230 परमाल रासो जगनिक  परमर्दिदेव का दरबारी कवि था  आल्हा और ऊदल वीरों की गाथा  चार्ल्स इलियट ने आल्हा-ऊदल संबंधी गीतों का संग्रह आल्हा खंड में छपवाया।
सं. 1230 खुसरों की पहेलियाँ अमीर खुसरो (अब्दुल हसन)  फ़ारसी और हिन्दी का गुंफन, निजामुद्दीन औलिया के शिष्य
सं. 1240 जयमयंक जस चंद्रिका मधुर कवि सं. 1460 विद्यापति पदावली विद्यापति  मैथिलि भाषा में लिखी, इन्हें मैथिल कोकिल भी कहा जाता है।  इनकी पदावली पर हाल कवि कृत गाहा सतसई और जयदेव द्वारा रचित गीत गोविंद का प्रभाव देखा जा सकता है।
 सं. 1225 भट्ट केदार जयचंद प्रकाश  संदेश रासक अब्दुर्रहमान  खंडकाव्य, विरह काव्य, दोहा छंद का सुंदर प्रयोग
सं. 1241 भरतेशवर बाहुबलि रास शालिभद्र सूरि  ढोला मारू रा दूहा  एक लोक काव्य है, विरह गीत है। 

आदिकालीन साहित्य
सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य
सिद्ध साहित्य 8वीं सदी में सिद्धों की सत्ता  बोद्ध धर्म के वज्रयान तत्व का प्रचार-प्रसार करने के लिए जो साहित्य लिखा गया।
 राहुल सांकृत्यायन ने 84 सिद्धों के नामों का उल्लेख किया है।
 राहुल सांकृत्यायन ने पुस्तक हिन्दा काव्य धारा में बौद्ध तथा नाथसिद्ध और जैनियों की अनेक रचनाओं का संकलन किया।
 रा. सं. ने पुरानी हिंदी और अपभ्रंस को एक ही कहा।
 प्रत्येक सिद्ध के नाम के पीछे 'पा' शब्द जुड़ा है।
 सरहपा-827 (दोहाकोश), शबरपा ( चर्यापद) प्रमुख है।
 इन्होंने संधा भाषा शैली में रचनाएँ की है।
 सिद्धों की रचनाएँ चर्यागीति और दोहा-कोश नामों से पुकारी जाता है।
 इसी भाषा-शैली का उपयोग नाथों ने भी किया।
 कबीर आदि निर्गुण संतों की इसी भाषा शैली को उलटबाँसी कहा जाता है।
 धर्मवीर भारती ने सिद्ध साहित्य में उपलब्ध होने वाली अश्लीलता पर आध्यात्मिकता का आरोप करना चाहा है।
 राहुल सांकृत्यायन और हजारी प्रसाद द्विवेदी ने गोरखनाथ का समय 10वीं शताब्दी मानते हैं।
 शुक्ल ने पृथ्वीराज चौहान के समय का बताया है।
 नाथ साम्प्रदाय वज्रयान की परम्परा में शैवमत की क्रोड में पला।
 84 सिद्धों की तरह नव नाथ भी प्रसिद्ध हैं।
 इस परंपरा के प्रत्येक जोगी के नाम के अंत में नाथ शब्द जुड़ा।
 नाथ पंथ में गोरखनाथ शिव के रूप माने जाते हैं।
 गोरखनाथ ने पतंजलि के योग को लेकर हठयोग का प्रवर्तन किया।
 ब्रह्मचर्य का आग्रह किया।
 गोरखनाथ मत्स्येंद्रनाथ या मछंदरनाथ के शिष्य थे।
 इनका सिद्धांत है- जोई-जोई पिंडे सोई ब्रह्मांडे अर्थात् जो शरीर में है, वही ब्रह्मांड में है।
 8वीं-13वीं शताब्दी तक जैन मत के प्रभाव से काव्य गुजरात और दक्षिण में रचा गया। 
महावीर स्वामी ने अपने धर्म का प्रचार लोक कथा के माध्यम से किया
 जैन मत का काव्य अपभ्रंश में लिखा गया।
 स्वयंभू (8वीं शती) की रचनाएँ- पउम चरिउ (पद्म चरित) इसमें राम कथा को आधार बनाया गया है।, इसमें 5 कांड है, बालकांड को विद्याघर कहा, अरण्यकांड और किष्कंधा कांड को नहीं लिया गया।
 डॉ. रामकुमार वर्मा ने इन्हें अपभ्रंश का प्रथम कवि और हिंदी साहित्य का आदि कवि कहा।
 अरिष्टनेमी चरित (टिठजेमी चरिउ) में कृष्ण कथा को आधार बनाया।
 स्वयंभू छन्दम की रचना की।
 स्वयंभू को अपभ्रंश का बाल्मीकी माना जाता है।
 पुष्पदंत (10वीं शती) उपनाम अभिमान मेरु भी है।
 इन्होंने महापुराण की रचना की
 इनकी वृति कृष्ण काव्य में अधिक रही।
 धनपाल –भविसयत (10वीं सती)- इसे सुय पंचमी भी कहा जाता है।, इसमें श्रृंगार, वीर, शांत रस की प्रधानता।  जोइन्द्र- परमात्मा प्रकाश, योगसार
 रामसिंह – पाहुड दोहा (222 दोहे), पाहुड का एक अर्थ अधिकार।
 अन्य रचनाकार- विनयचन्द्र सूरि, हरिभद्र, आदिकालीन साहित्य की प्रवृत्तियाँ (विशेषताएँ) 1. परंपरा तथा नूतनता का समावेश 2. विविधरूपी साहित्य रचना 3. परवर्ती साहित्य तथा साहित्यकारों की आधार भूमि 4. युद्धों का सजीव वर्णन 5. आश्रयदातोओं की प्रशस्ति 6. श्रृंगार रस का चित्रण 7. वीर रस का चित्रण 8. सामान्य जन की उपेक्षा 9. प्रकृति चित्रण 10. संदिग्ध तथा अप्रामाणिक रचनाएँ 11. भाषा-अभिव्यक्ति शैलियाँ

हिंदी साहित्य का इतिहास लेखन परंपरा


हिन्दी साहित्य का इतिहास सन् रचना और रचनाकार महत्वपूर्ण बिन्दू
1839 पहला भाग 1847 दूसरा भाग
 रचना- 'इस्तवार द ला लितरेत्यूर ऐन्दुई ऐ ऐन्दुस्तानी' दूसरा नाम- हिंदवी और हिन्दुस्तानी साहित्य का इतिहास रचनाकार- गार्सा द तासी 
 इसमें वर्णानाक्रमानुसार हिन्दी-उर्दू के रचनाकारों का परिचय रहा।
 इसमें 738 कवियों-रचनाकारों का परिचय था।
 इसमें 72 हिन्दी के थे।  तासी उर्दू के प्रोफ़ेसर थे।
 फ्रांस की राजधानी पेरिस में लिखा गया।
 यह फ्रैंच भाषा लिखा गाया है।

1848 रचना- तबकातुशुआस या तजकिरा-ई-शुअरा-ई- हिन्दी रचनाकार- मौलवी करीमुद्दीन
  1004 रचाकारों का परिचय  62 हिन्दी रचाकारों को स्थान दिया।  रचाकारों के जन्म-मरण के साथ काव्य-संग्रहों के नाम देने का प्रयास किया गया।  मौलवी ने चंद, खुसरो, कबीर, जायसी, तुलसी के कालक्रम का चिंतन किया।
1878 रचना- शिव सिंह सरोज रचनाकार- शिव सिंह सेंगर 
  इसमें 1003 कवियों का परिचय।  687 कवियों की तिथि दी गई है।  इसकी रचना कालिदास हजारा पर हुई है। (कालिदास त्रिवेदी)

1889 रचना- द मॉर्डन वर्नाक्युलर लिटरेचर ऑफ हिंदुस्तान रचनाकार- सर जार्ज अब्राहम ग्रियर्सन 

 सरोज को आधार बनाया  काल विभाजन का प्रथम प्रयास हुआ।  952 कवियों का परिचय रहा।  इसे पहला सटीक हिन्दी साहित्य का इतिहास कहा जा सकता है।

1913 रचना- मिश्र बंधु विनोद रचनाकार- श्याम बिहारी मिश्र, शुकदेव बिहारी मिश्र, गणेश बिहारी मिश्र (मिश्र बंधु) 
 इसमें 4591 कवियों का समावेश है।  काल विभाजन को नया रूप दिया गया।  तीन भागों में हिन्दी साहित्य का इतिहास प्रकाशित हुआ।  हिन्दी नवरत्न इन्हीं तीनों भागों का पूरक है।

1929 रचना- हिन्दी साहित्य का इतिहास रचनाकार- आचार्य रामचन्द्र शुक्ल 
 यह मिश्र बंधु विनोद पर आधारित है।  साहित्य का कालक्रमानुसार विभाजन।  इसमें प्रत्येक कवि की रचना के उदाहरण प्रस्तुत किए गए।  प्रत्येक देश का साहित्य वहाँ की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है।
 1930 रचना- हिन्दी भाषा और इतिहास रचनाकार- डॉ. श्याम सुंदर दास
  1930 रचना- हिन्दी साहित्य का विवेचनात्मक इतिहास रचनाकार- डॉ. सूर्यकान्त शास्त्री
  1930 रचना- हिन्दी भाषा और उसके साहित्य का विकास रचनाकार- अयोध्यासिंह उपाध्याय हरिऔध 
 1931 रचना- हिन्दी साहित्य का इतिहास रचनाकार- डॉ रमाशंकर शुक्ल रसाल
  1938 रचना- हिन्दी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास रचनाकार- डॉ. रामकुमार वर्मा
  1973 रचना- हिन्दी साहित्य का इतिहास संपादक- डॉ. नगेन्द्र
  डॉ. नगेन्द्र दिल्ली विवि में हिन्दी विभागाध्यक्ष रहे।

रीतिकाल

रीतिकाल नामकरण 
 सन् १७०० ई. के आस-पास हिंदी कविता में एक नया मोड़ आया। इसे विशेषत: तात्कालिक दरबारी संस्कृति और संस्कृत साहित्य से उत्तेजना मिली।
  संस्कृत साहित्यशास्त्र के कतिपय अंशों ने उसे शास्त्रीय अनुशासन की ओर प्रवृत्त किया। हिंदी में 'रीति' या 'काव्यरीति' शब्द का प्रयोग काव्यशास्त्र के लिए हुआ था। इसलिए काव्यशास्त्रबद्ध सामान्य सृजनप्रवृत्ति और रस, अलंकार आदि के निरूपक बहुसंख्यक लक्षणग्रंथों को ध्यान में रखते हुए इस समय के काव्य को 'रीतिकाव्य' कहा गया।
 इस काव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों की पुरानी परंपरा के स्पष्ट संकेत संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, फारसी और हिंदी के आदिकाव्य तथा कृष्णकाव्य की शृंगारी प्रवृत्तियों में मिलते हैं।
 इस काल में कई कवि ऐसे हुए हैं जो आचार्य भी थे और जिन्होंने विविध काव्यांगों के लक्षण देने वाले ग्रंथ भी लिखे। इस युग में शृंगार की प्रधानता रही। यह युग मुक्तक-रचना का युग रहा। मुख्यतया कवित्त, सवैये और दोहे इस युग में लिखे गए।
 आचार्य शुक्ल ने इसे रीतिकाल से पुकारा है।
 मिश्रबंधुओं ने अलंकरण प्रियता के कारण इसे अलंकार काल कहा।
 आचार्य विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने इसे श्रृंगार काल कहा है।
 डॉ रामकुमार वर्मा ने इसे कला काल कहा है।
 आचार्य नंद दुलारे वाजपेयी ने इसे मुक्त काल कहा है।
 रीति ग्रंथ केवल मुक्त शैली में ही लिखे जा सकते हैं। अतः मुक्तक नाम भी रीतिकाल से सीधा जुड़ा है।
 पहला वर्ग रीतिबद्ध कवियों का है जिसके प्रतिनिधि केशव, चिंतामणि, भिखारीदास, देव, मतिराम, ग्वाल, कुलपति और पद्माकर आदि हैं।
  इन कवियों ने दोहों में रस, अलंकार और नायिका के लक्षण देकर कवित्त सवैए में प्रेम और सौंदर्य की कलापूर्ण मार्मिक व्यंजना की है।
  संस्कृत साहित्यशास्त्र में निरूपित शास्त्रीय चर्चा का अनुसरण मात्र इनमें अधिक है। पर कुछ ने थोड़ी मौलिकता भी दिखाई है, जैसे भिखारीदास का हिंदी छंदों का निरूपण।
  दूसरा वर्ग रीतिसिद्ध कवियों का है।  इन कवियों ने लक्षण नहीं निरूपित किए, केवल उनके आधार पर काव्यरचना की। बिहारी इनमें सर्वश्रेष्ठ हैं, जिन्होंने दोहों में अपनी "सतसई' प्रस्तुत की। विभिन्न मुद्राओंवाले अत्यंत व्यंजक सौंदर्यचित्रों और प्रेम की भावदशाओं का अनुपम अंकन इनके काव्य में मिलता है। सेनापति, रसनिधि आदि।
 तीसरे वर्ग में रीतिमुक्त कवि आते हैं। घनानंद, बोधा, द्विजदेव, ठाकुर, आलम आदि रीतिमुक्त कवि आते हैं जिन्होंने स्वच्छंद प्रेम की अभिव्यक्ति की है। इनकी रचनाओं में प्रेम की तीव्रता और गहनता की अत्यंत प्रभावशाली व्यंजना हुई है।

 रीतिकाव्य मुख्यत: मांसल शृंगार का काव्य है। इसमें नर-नारीजीवन के रमणीय पक्षों का सुंदर उद्घाटन हुआ है। अधिक काव्य मुक्तक शैली में है, पर प्रबंधकाव्य भी हैं।
 कवि राजाश्रित होते थे इसलिए इस युग की कविता अधिकतर दरबारी रही जिसके फलस्वरूप इसमें चमत्कारपूर्ण व्यंजना की विशेष मात्रा तो मिलती है परंतु कविता साधारण जनता से विमुख भी हो गई।
 रीतिकाल के अधिकांश कवि दरबारी थे।  केशवदास (ओरछा),  प्रताप सिंह (चरखारी),  बिहारी (जयपुर, आमेर),  मतिराम (बूँदी),  भूषण (पन्ना),  चिंतामणि (नागपुर),  देव (पिहानी),  भिखारीदास (प्रतापगढ़-अवध),  रघुनाथ (काशी),  बेनी (किशनगढ़),  गंग (दिल्ली),  टीकाराम (बड़ौदा),  ग्वाल (पंजाब),  चन्द्रशेखर बाजपेई (पटियाला),  हरनाम (कपूरथला),  कुलपति मिश्र (जयपुर),  नेवाज (पन्ना),  सुरति मिश्र (दिल्ली),  कवीन्द्र उदयनाथ (अमेठी),  ऋषिनाथ (काशी),  रतन कवि (श्रीनगर-गढ़वाल),  बेनी बन्दीजन (अवध),  बेनी प्रवीन (लखनऊ), ब्रह्मदत्त (काशी),  ठाकुर बुन्देलखण्डी (जैतपुर),  बोधा (पन्ना),  गुमान मिश्र (पिहानी) आदि और अनेक कवि तो राजा ही थे, जैसे- महाराज जसवन्त सिंह (तिर्वा), भगवन्त राय खीची, भूपति, रसनिधि (दतिया के जमींदार), महाराज विश्वनाथ, द्विजदेव (महाराज मानसिंह)।


  रीतिकाव्य रचना का आरंभ एक संस्कृतज्ञ ने किया। ये थे आचार्य केशवदास, जिनकी सर्वप्रसिद्ध रचनाएँ कविप्रिया, रसिकप्रिया और रामचंद्रिका हैं।
  कविप्रिया में अलंकार और रसिकप्रिया में रस का सोदाहरण निरूपण है। लक्षण दोहों में और उदाहरण कवित्त सवैए में हैं। लक्षण-लक्ष्य-ग्रंथों की यही परंपरा रीतिकाव्य में विकसित हुई।  रामचंद्रिका केशव का प्रबंधकाव्य है जिसमें भक्ति की तन्मयता के स्थान पर एक सजग कलाकार की प्रखर कला चेतना प्रस्फुटित हुई।  केशव के कई दशक बाद चिंतामणि (कवि कुल कल्पतरू) से लेकर अठारहवीं सदी तक हिंदी में रीतिकाव्य का अजस्र स्रोत प्रवाहित हुआ जिसमें नर-नारी-जीवन के रमणीय पक्षों और तत्संबंधी सरस संवेदनाओं की अत्यंत कलात्मक अभिव्यक्ति व्यापक रूप में हुई।  इस समय वीरकाव्य भी लिखा गया। मुगल शासक औरंगजेब की कट्टर सांप्रदायिकता और आक्रामक राजनीति की टकराहट से इस काल में जो विक्षोभ की स्थितियाँ आई उन्होंने कुछ कवियों को वीरकाव्य के सृजन की भी प्रेरणा दी।  ऐसे कवियों में भूषण प्रमुख हैं जिन्होंने रीति शैली को अपनाते हुए भी वीरों के पराक्रम का ओजस्वी वर्णन किया।  शृंगारी काव्य तीन वर्गों में विभाजित किया जाता है।  आचार्य रामचंद्र शुक्ल- वास्तव में श्रृंगार और वीर इन दोनों रसों की कविता इस काल में हुई। प्रधानता श्रृंगार रस की ही रही। इस काल को रस के विचार से कोई श्रृंगार काल कहे तो कह सकता है।  हजारी प्रसाद द्विवेदी- इस समय आर्थिक दृष्टि से समाज में स्पष्ट रूप से दो श्रेणियाँ हो गई –एक तो उत्पादक वर्ग, जिसमें प्रधान रूप से किसान और किसानी से संबंध रखने वाली जातियाँ- बढ़ई, लोहार, कहार, जुलाहा इत्यादि थी और दूसरा वर्ग भोक्ता (राजा, रईस, नवाब आदि) या भोक्तृत्व का सहायक था।  डॉ॰ नगेन्द्र लिखते हैं- "वासना का सागर ऐसे प्रबल वेग से उमड़ रहा था कि शुद्धिवाद सम्राट के सभी निषेध प्रयत्न उसमें बह गये। अमीर-उमराव ने उसके निषेध पत्रों को शराब की सुराही में गर्क कर दिया। विलास के अन्य साधन भी प्रचुर मात्रा में थे।"  ऐहलौकिकता, श्रृंगारिकता, नायिका भेद और अलंकार-प्रियता इस युग की प्रमुख विशेषताएं हैं।  प्रायः सब कवियों ने ब्रज-भाषा को अपनाया है। स्वतंत्र कविता कम लिखी गई, रस, अलंकार वगैरह काव्यांगों के लक्षण लिखते समय उदाहरण के रूप में - विशेषकर श्रृंगार के आलंबनों एवं उद्दीपनों के उदाहरण के रूप में - सरस रचनाएं इस युग में लिखी गईं।  भूषण कवि ने वीर रस की रचनाएं भी दीं। भाव-पक्ष की अपेक्षा कला-पक्ष अधिक समृद्ध रहा। शब्द-शक्ति पर विशेष ध्यान नहीं दिया गया, न नाटयशास्त्र का विवेचन किया गया।