शुक्रवार, 18 अक्टूबर 2013
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रविवार, 13 अक्टूबर 2013
संस्कृति और संस्कार
रविवार, 29 सितंबर 2013
सोशल मीडिया और हम
सोशल मीडिया और हम
डॉ. नीरज भारद्वाज
वर्तमान में संचार तकनीक एवं माध्यमों में एक अद्भुत व अभूतपूर्व परिवर्तन देखा गया हैं I आज तकनीक ने भौतिक सीमाओं को तोड़कर पूरी दुनिया को एक-सूत्र में पिरो दिया है I इसी के चलते मीडिया का क्षेत्र आज शिक्षा तथा समाज की दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण हो गया हैI आज मीडिया का क्षेत्र केवल पत्रकारिता तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह आधुनिक युग का एक ऐसा सत्य है, जो मानव-जीवन तथा इससे जुड़े लगभग सभी क्षेत्रों से किसी न किसी रूप से जुड़ा हुआ हैI पिछले कुछ समय से मीडिया के क्षेत्र में काम करने की परिकल्पना में भी बड़ा परिवर्तन देखा गया है। जो दिनों दिन बढ ही रहा है।
भारतीय मीडिया के पुराने परिपेक्ष्य पर नजर डाले तो हमें पता चलता है कि हिंदी पत्रकारिता का प्रारंभिक काल भारतीय नवजागरण अथवा पुनर्जागरण का काल था। उस दौरान भारत की राष्ट्रीय, सामाजिक, जातीय तथा भाषायी चेतना जागृत हो रही थी। विचार किया जाए तो इस दौर की पत्रकारिता एक मिशन के तौर पर काम कर रही थी और लोगों के बीच जनजाग्रति का एक साधन थी। वास्तव में उस दौर के सभी पत्रकारों ने पत्रकारिता के क्षेत्र में जो आयाम और आदर्श स्थापित किए, वे आज भी पत्रकारिता की उदीयमान पीढ़ी के लिए मार्गदर्शन का स्त्रोत हैं। लेकिन धीरे-धीरे समाज परिवर्तन, सोच परिवर्तन, साधन परिवर्तन आदि के कारण मीडिया और उसके साधन अपना स्वरुप बदल रहे हैं। आज सोशल मीडिया का युग है। सोशल साइटस ही लोगों से सीधे तौर पर जुडी हैं। वही लोगों को जाग्रत कर उनके विचारों को हवा देकर फैलाने का काम कर रही है।
आज हर तरफ सोशल मीडिया अथवा न्यू-मीडिया के सकारात्मक पक्षों पर कम चर्चा हो रही है, जबकि उसके नकारात्मक पक्षों की अधिक विचार किया जा रहा है। आज लोग सोशल साइटस के माध्यम से अपने विचार प्रकट कर रहे हैं, चाहे वह सरकार के खिलाफ हो या किसी अन्य घटना के प्रति। वास्तव में सोशल मीडिया ने अभी तक विभिन्न आंदोलनों और सामाजिक बहसों को चलाने में युवाओं को एक मंच प्रदान किया है। जिसका उपयोग सरकार की कुनीतियों के विरूद्ध आंदोलनों को खड़ा करने के लिए भी किया गया है। यही सरकार की फिक्र का भी कारण है। सरकार आए दिन सोशल मीडिया पर उंगली उठाती है और यह कहने से नहीं चुकती की सोशल मीडिया को सही ढंग से प्रयोग में लाए नहीं तो इस पर भी लगाम लगा दी जाएगी।
सरकार का सोशल मीडिया के प्रति कडा व्यवहार या ब्यान देना बिलकुल ठीक है, क्योंकि कुछ शरारती तत्व अपनी उट-पटांग हरकतों से देशवासियों को गुमराह करने की कोई कसर नहीं छोडते ऐसे में सरकार यदि कोई ठोस कदम नहीं उठाएगी तो क्या हम ऐसी ही लोगों के हाथों की कठपुतली बन कर रह जाएगें, जो वो सोशल मीडिया के माध्यम से करना चाह रहे हैं।
सोशल मीडिया आम आदमी का मंच है। लेकिन इसे गलत रुप से प्रयोग करके लोग इसको भी बंद कराने में जुटे हैं। एक समय था जब टीवी पर मनोरंजन के कार्यक्रम लोग फ्री में देखते थे और एक आज का समय है कि आप हर एक चैनल देखने के पैसे दे रहे हो, क्या लोगों की समझ में नहीं आ रहा। ये भौतिकवादी युग है यहां किसी की नहीं चलती सभी कुछ बाजार की गिरफ्त में है। सरकार नीतियां बनाती है फिर उन पर अमल होता है और जनता उनके प्रयोग का साधन होती है। यदि सोशल मीडिया के साथ लोग ऐसे ही उट-पटांग काम करते रहे तो हो सकता है भविष्य में आपको अलग-अलग साइट पर काम करने के लिए अलग-अलग पैसे देने होगे। हमें यह ध्यान रखना जरुरी है कि हमारे देश की कितनी जनता आज भी दो वक्त की रोटी खाने में सक्षम नहीं है। फिर वह कैसे इन सभी चीजों से जुडेंगे। टीवी चैनल तो दूर हो ही गए हैं, अब इसे भी दूर कर दो। यह सभी प्रयास केवल बडे लोगों का पेट भरने के लिए है। इस पर सोचना बहुत जरुरी है।
पर्दा है पर्दा
पर्दा है पर्दा
डॉ. नीरज भारद्वाज
पर्दा शब्द सुनते ही आपके और हमारे दिमाग में खिडकी-दरवाजों पर टकने वाले पर्दे आ गए। कुछ के दिमाग में पर्दा है पर्दा गाना याद आ गया। लेकिन यह वो पर्दा नहीं, बल्कि सिनेमाई पर्दा है। सिनेमा को बहुत से लोग बडा पर्दा भी कहते हैं अर्थात् सिनेमा के नायक-नायिकाओं को बडे पर्दे के नायक-नायिका कहा जाता है, तो स्वाभाविक है कि सिनेमा बडा पर्दा हो गया। टीवी को लोग छोटा पर्दा कहते हैं। विचार किया जाए तो आज लोकप्रियता के हिसाब से छोटा पर्दा ही बडा पर्दा हो गया है। एक जमाना था जब फिल्मों में काम करने वाले लोग अर्थात् बडे पर्दे के नायक-नायिका छोटे पर्दे पर कम ही आते थे, आते भी थे तो केवल नाम मात्र के लिए। यदि कोई नायक-नायिका छोटे पर्दे पर आ भी जाते थे, तो यह कह दिया जाता था कि अब इसे बडे पर्दे पर काम नहीं मिला होगा इसीलिए छोटे पर्दे पर आए हैं। कहने का भाव वह उस नायक-नायिका की कडी आलोचना थी।
समय बदला, साधन बदले, मनोरंजन के तौर-तरीके बदले और वर्तमान तक आते-आते परिस्थिति बिलकुल उल्ट दिखाई दे रही है। आज हर एक बडा सुपर स्टार छोटे पर्दे पर आने के लिए बेकरार है। वह छोटे पर्दे पर आकर अपनी फिल्म के बारे में बताता है, उसका प्रचार करता है साथ ही छोटे पर्दे पर दिखना भी चाहता है और टीवी पर प्रसारित होने वाले कार्यक्रमों में हिस्सा भी लेते हैं। आज बडे पर्दे पर दिखाई देने वाले ऐसे कितने ही सितारे हैं, जो एक जमाने में छोटे पर्दे पर ही काम करते थे। लेकिन आज वह कहां से कहां पहुंच गए हैं। यह उनके परिश्रम का ही फल है।
कई बार तो ऐसा लगता कि आज छोटे पर्दे पर आने के लिए सितारो के बीच होड लगी हुई है। इसके कितने ही उदाहरण हमें मिल जाएगें। कलर्स पर आने वाले बिग बॉस कार्यक्रम की बात करें तो एक सीजन में उसमें सलमान खान और संजय दत्त की जोडी ने कमाल किया। अब सलमान खान उसे संभाल रहे हैं। कपिल की कॉमेडी में तो लगभग सभी सितारे आ चुके हैं। चन्नई एक्सप्रेस फिल्म के रिलीज होने से पहले सुपर स्टार एस.आर.के स्टार प्लस के धारावाहिक दीया और बाती हम में आए। इससे पहले वो कौन बनेगा करोडपति में भी अपने दमखम को दिखा चुके हैं। टीवी पर ही प्रसारित होने वाले कार्यक्रम सत्यमेय ज्यते को लेकर आमिर खान आए। बडे पर्दे के सबसे बडे नायक कहलाए जाने वाले सुपर स्टार अमिताभ बच्चन ने तो छोटे पर्दे पर आते ही तहलका मचाया और कौन बनेगा करोडपति के कितने ही सीजन हमारे सामने लेकर आ चुके हैं। सुपर स्टार विनोद खन्ना भी बडे पर्दे से निकलकर छोटे पर्दे पर दिखाई दे चुके हैं। यहां सभी का जिक्र करना संभव नहीं है। लेकिन यह बात तो स्पष्ट है कि ऐसे कितने ही नायक-नायिका हैं, जो बडे पर्दे से छोटे पर्दे पर आते रहे हैं।
विचार करे और समझे तो पर्दा बडा हो या छोटा दोनों का काम एक ही है और वो है लोगों का मनोरंजन करना। आज बढते टीवी चैनलों के युग में मनोरंजन केवल फिल्म तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि वह हर जगह दिखाई देने लगा। आज टीवी पर कितने ही कार्यक्रम ऐसे भी आते हैं, जिनके बारे में एंकर कहता मिलता है कि आप इसे अपने मोबाइल पर भी अपलोड कर सकते हैं। इंटरनेट ने अब मनोरंजन को लोगों के और नजदीक ला दिया है। कहने का भाव यह कि अब मनोरंजन आपकी जेब में ला दिया गया है। एक समय में कवि ने कल्पना कि थी दुनिया मेरी जेब में और इस विषय पर फिल्म भी बनी और शायद गाना भी बना। आज वह बात सार्थक दिखाई पडती है। बडे पर्दे से छोटा पर्दा और अब छोटे से भी छोटा पर्दा अर्थात् मोबाइल पर कार्यक्रमों का लाइव आना और उसे लोकप्रियता मिलनी बाकि है। पर्दा कितना छोटा हो गया यह किसी ने नहीं सोचा होगा। इतना ही नहीं अभी यह कितना ओर छोटा होगा यह देखना अभी बाकि है।
मंगलवार, 24 सितंबर 2013
लेखक
देश और दुनिया दोनों के बारे में सोचना जरुरी है। एक आदर्श लेखन केवल अपने तक नहीं रहता बल्कि वह सभी को साथ लेकर चलने की सोचता है।
सोमवार, 23 सितंबर 2013
हंसना जरुरी है।
हंसना जरुरी है।
डॉ. नीरज भारद्वाज
टेलीविजन पर प्रसारित होने
वाले कार्यक्रम धीरे-धीरे अपना दायरा बढाने में सफल होते नजर आ रहे हैं। जिस दौर
में भारतीय टेलीविजन ने शुरुआत की थी उस समय उसके पास सिर्फ एक ही चैनल था और वह
था दूरदर्शन जिसे डीडी-1 के नाम से जाना जाता रहा है। फिर डीडी-2 और उसके बाद निजी
चैनलों का दौर आ गया। धीरे-धीरे तकनीक बढी और टेलीविजन पर प्रसारित होने वाले
कार्यक्रमों की संख्या में भी बढोत्तरी होनी शुरु हो गई।
टेलीविजन पर पहले सामाजिक कार्यक्रमों से शुरुआत हुई। फिर मनोरंजन के
सभी प्रकार के कार्यक्रम टीवी चैनलों पर दिखाई देने लगे। आज टेलीविजन पर लगभग हर
एक सोच से जुडे व्यक्ति के मतलब के कार्यक्रम आते हैं। टीवी ने महिला, पुरुष,
बच्चा, युवा सभी को सभी के आयु और वर्ग के कार्यक्रम दिये हैं। अब कोई व्यक्ति यह
नहीं कह सकता की टीवी पर ऐसा कार्यक्रम नहीं आता, बल्कि कई बार तो हमारी सोच से
परे हट कर ऐसा कार्यक्रम हमारे सामने आ जाता है, जिस की कल्पना करना भी संभव नहीं
था। लोगों को खाना बनाना, घुमने फिरने के स्थान बताना, बच्चों को पढना,
कार्यक्रमों में हिस्सा लेकर इनाम जितना, हंसी-मजाक, देश-विदेश की सारी जानकारी
आदि आज टीवी कार्यक्रमों के माध्यम से ली जा सकती है या ये कहें कि वे यह सभी
जानकारी दे रहे हैं।
आज के भागते दौडते समय में लोगों के पास समय की कमी है और ऐसे में यदि
कोई आपसे हंसी मजाक की बातें करता है तो यह समझों कि वह हमारे लिए वरदान बन जाती
है। टीवी पर हंसी मजाक के कार्यक्रमों का आना लगा ही रहता है। देख भाई देख
धारावाहिक में शेखर सुमन और उस कार्यक्रम में दिखाए गए परिवार ने टीवी की दुनिया में हंसी मजाक का जो
उदाहरण रखा। वह अपने में एक यादगार पल रहे होंगे। जसपाल भट्टी द्वारा बनाए गए हंसी
मजाक के कितने ही कार्यक्रम टीवी पर लोकप्रिय हुए। समय बदला और फिर हंसी को लेकर रिएयल्टी-शो
सामने आए। विचार किया जाए तो हंसी मजाक का दौर टीवी पर सबसे ज्यादा लोकप्रिय रहा
है। अब पिछले कुछ दिनों से क्लर्स चैनल पर कपिल की कॉमेडी ने सभी कार्यक्रमों को
पछाड दिया है। कपिल के द्वारा कहे जाने वाला शब्द बाबा जी का ठल्लू अपने आप में एक
अलग ही उदाहरण है। कपिल अपने आप में एक ऐसा उदाहरण बन गया है कि टेलीविजन पर हंसी
कि दुनिया की चर्चा हो और उसका नाम न आए तो गलत होगा।
वास्तव में हंसी हमारे जीवन में बडा महत्व रखती है और जो व्यक्ति चाहे
कैसे भी करके हमे तो पल की खुशी देता है तो वह हमारे लिए उस समय भगवान ही होता है,
क्योंकि गम देने के लिए यह समाज कम नहीं है। रोज सुबह उठते ही नई समस्या जन्म ले
लेती है, मंहगाई की मार, बेरोजगारी की लंबी लाईन, राशन दफ्तर में लाईन आदि कितने
ही पल हमारी खुशी को खा जाते हैं। इसीलिए हंसते- हंसते यदि यह जीवन कट जाता है तो
इससे अच्छी बात क्या होगी। आप सभी टीवी पर हंसाने वाले नायक-नायिकाओं का बहुत-बहुत
धन्यवाद, जो आप सभी इस समाज को दे रहे हो, वह वास्तव में ही समाज का एक बहुत बडा
कार्य है। साधु संत यदि धर्मग्रंथों की बात करते हैं तो आप उनसे कम नहीं हो,
क्योंकि समाज के बहुत से पहलु होते हैं। जिसका ख्याल रखना हम सभी की जिम्मेदारी
है।
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