रविवार, 29 मार्च 2020

समांतर कहानी


समांतर कहानी
आठवें दशक की कहानी में समांतर कहानी का आंदोलन प्रमुख है। विचार करें तो समांतर कहानी का बीजवपन कहें या प्रादुर्भाव सन् 1971-72 में ही हो चुका था।  डॉ. श्रीनिवास शर्मा के अनुसार, 'सारिका के विशेषांक समांतर विशेषांक सन् 1972 में प्रकाशित करके समांतर कहानी आंदोलन का आरंभ किया।'[1] इसके बाद दो सारिका में सन् 1974 से समांतर कहानी के विशेषांकों दौर प्रारंभ हो गया। समयानुसार समांतर कहानी आंदोलन में ने नई गति से लोगों के साथ जुड़ना आरंभ कर दिया। इसके मुख्य रचनाकार कमलेश्वर रहे हैं उनके अतिरिक्त, इब्राहीम शरीफ, रमेश बतरा, कामता नाथ, मधुकर सिंह, जितेंद्र भाटिया, निरूपमा सेवती, हिमांशु जोशी आदि कहानीकारों ने स्पष्ट समर्थन दिया। डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय जी लिखते हैं कि, 'समांतर या समानांतर कहानी का शिगूफ़ा 1974 में कमलेश्वर ने छोड़ा- आम आदमी से जुड़ी हुई कहानी।'[2]
जबकि समांतर कहानी के कुछ पक्षधर इसे आंदोलन नहीं स्वीकारते थे। समांतर कहानीकार रचना एवं सामयिक सत्यों के बीच सामंजस्य की स्थापना करता है। अर्थात् उसका चिंतन एवं लेखन परिवेशानुसार होता है। दूसरे शब्दों में कहें तो जीवन-सत्य और रचना के बीच सामंजस्य। यह कहानी आम आदमी की संपूर्ण लड़ाई को दिशा-निर्देशित करती है। डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय जी लिखते हैं कि, 70 के बाद की कहानी का स्वर अधिक तीखा है। उसमें जिंदगी की हरकत बताई जाती है। दुर्भाग्यवश आम आदमी की तलाश भी एक फार्मूला बन गया है। इसी फार्मूले का दूसरा नाम समानांतर या समांतर कहानी है।'[3] देखा जाए तो समांतर कहानी का केन्द्र बिंदु सामान्य मानव है। यह सामान्य मानव के संघर्षों की पक्षधर है क्योंकि उसका पूर्ण विश्वास है कि एकजुटता ही सामान्य मानव संघर्षों में विजयी होगी। समांतर कहानी के विषय में विद्वानों का यह कथन विशेष ध्यान देने योग्य है, जिसे डॉ. श्रीनिवास शर्मा ने अपनी पुस्तक हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल में लिखा है, 'कमलेश्वर द्वारा प्रचारित-प्रसारित समांतर कहानी एक ऐसा  शीशा था जो, आम आदमी का सहारा लेकर खड़ा किया गया था और जो कमलेश्वर के सारिका के संपादक-पद को छोड़ते ही (सन् 1978) धराशायी हो गया।'[4]
कोई भी साहित्य विधा हो वह अपने समय और परिस्थिति को ध्यान मेंम रखकर ही पाठक के समाने आती है ठीक वैसे ही समांतर कहानी आंदोलन राजनीतिक महत्व को स्वीकारता है। राजनीति में उथल-पुथल का दौर हमेशा जारी रहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए राजनीति में सक्रिय भाग लेते हुए क्रांति हेतु कार्य करना समांतर कहानीकार को रूचिकर प्रतीत होता है। राजनीतिक संघर्षों को वह सांस्कृतिक परिपे्रक्ष्य में अवलोकता है। समांतर कहानी ने भाषित स्तर पर भावुकता का निराकरण करके उसे स्पष्ट, प्रत्यक्ष एवं प्रभावपूर्ण स्वरूप प्रदान किया है। साथ ही इन कहानीकारों की लेखन प्रवृति यह रही है कि शिल्प पर ध्यान ने देकर कहानीकार मानवीय पीड़ा पर ध्यान देता है।


[1]  हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल, डॉ. श्रीनिवास शर्मा, पेज-48
[2]  स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, पेज-99

[3]  स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी साहित्य का इतिहास, डॉ. लक्ष्मीसागर वार्ष्णेय, पेज-99
[4]  हिन्दी साहित्य का आधुनिक काल, डॉ. श्रीनिवास शर्मा, पेज-48

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