रविवार, 29 मार्च 2020

जनवादी कहानी और सहज कहानी


जनवादी कहानी
व्यवस्थाओं के बदलते दौर के साथ साहित्यकारों ने भी अपने-अपने मत के अनुसार कहानी कविताओं का दौर जारी रखा और उसी का परिणाम यह हुआ कि जनवादी कहानी प्रकाश में आई। बाकि सभी कहानियों की तरह जनवादी कहानी एक पत्रिका और व्यक्ति पर केन्द्रित नहीं रही। विचार करें तो इसमें सातवें-आठवें दशक में इसराइल, असगर वजाहत, मार्कंडेय, प्रदीप मांडव, नमिता सिंह, सूरज पालीवाल आदि की कहानियों का जो तेवर रहा उसे जनवादी कहा गया है। जब कहानी का नाम ही जनवादी हो गया तो यह समझने में देर नहीं लगेगी की जनवादी आंदोलनकारी कहानीकार आर्थिक सामाजिक शोषण का विरोध करते हैं तथा इसका उत्तरदायी वर्तमान व्यवस्था को देते हैं।

सहज कहानी
सहज कहानी की बात उठाने वाले अमतृ राय हैं वे इसके प्रथम एवं अंतिम प्रवक्ता हैं। अमतृ राय की माने तो वह कहते है कि सहज कहानी से हमारा अभिप्राय इनमें से किसी एक से या दो से या दस से नहीं बल्कि इन सबसे और इनसे अलग और भी बहुत से हैं। क्योंकि सहज कहानी से हमारा अभिप्राय उस मूल कथारस से है, तो कहानी की अपनी खास चीज है और जो बहुत सी नई कही जाने वाली कहानियों में एक सिरे नहीं मिलता। दूसरा उन्होंने इसके बारे में कहा है कि यह न तो कोई नारा है न कोई आंदोलन। इस दृष्टि से विचार करें तो सहज कहानी अकेले कंठ की पुकार बनकर रह गई, इसकी वैचारिकता को कहानीकारों का समर्थन नहीं मिला है। लेकिन इतिहास के पन्नों पर अपना नाम तो लिखवा ही दिया है।

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